लखनऊ की जर्जर इमारतों को जमींदोज करेगा LDA, तैयार हो चुका है पूरा खाका

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अब एक बहुत बड़ा बदलाव होने वाला है। दरअसल, शहर के बीचों-बीच स्थित दशकों पुरानी वे इमारतें, जो कभी लखनऊ की पहचान हुआ करती थीं लेकिन अब जर्जर हो चुकी हैं और अवैध कब्जों का अड्डा बन चुकी हैं, जल्द ही जमींदोज कर दी जाएंगी। इसके लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने रोडमैप तैयार कर लिया है।

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‘शहरी पुनर्विकास नीति 2026’ के तहत होगा काम

एलडीए ने ‘उत्तर प्रदेश शहरी पुनर्विकास नीति 2026’ के तहत शहर के कायाकल्प की एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की है। इस महायोजना के जरिए न केवल पुराने जर्जर ढांचों को ढहाया जाएगा, बल्कि उनकी जगह अत्याधुनिक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स और व्यवस्थित आवासीय भवनों का निर्माण किया जाएगा। एलडीए का यह कदम राजधानी को स्मार्ट सिटी की तर्ज पर और अधिक व्यवस्थित और आधुनिक बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।

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लखनऊ विकास प्राधिकरण पिछले कई वर्षों से शहर के विभिन्न हिस्सों में स्थित अपनी पुरानी और खस्ताहाल संपत्तियों के पुनर्विकास पर विचार कर रहा था। हालांकि, अब तक किसी ठोस और अधिकृत नीति के अभाव में यह प्रस्ताव फाइलों में ही दबा रहा। सबसे बड़ी चुनौती अवैध कब्जों को खाली कराने और वहां रह रहे आवंटियों को संतुष्ट करने की थी, लेकिन अब उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘शहरी पुनर्विकास नीति 2026’ को मंजूरी दिए जाने के बाद एलडीए के हाथ मजबूत हो गए हैं।

इस नई नीति ने प्राधिकरण को एक कानूनी ढांचा प्रदान किया है, जिसके आधार पर अब संपत्तियों का नए सिरे से मूल्यांकन और निर्माण किया जा सकेगा। इस योजना को गति देने के लिए एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने कमर कस ली है और आगामी सात मई को एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई है, जिसमें इस कायाकल्प की अंतिम रणनीति और समयसीमा निर्धारित की जाएगी।

एलडीए ने बनाई विशेष कार्ययोजना

पुनर्विकास की इस डगर में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव जन-सहमति का है। नई नीति के प्रावधानों के अनुसार, एलडीए किसी भी भवन या कॉम्प्लेक्स को तब तक नहीं तोड़ सकता जब तक कि वहां के कुल आवंटियों में से कम से कम 60 प्रतिशत लोग इसके लिए लिखित में अपनी सहमति न दे दें। प्राधिकरण के लिए यह कार्य चुनौतीपूर्ण है क्योंकि कई पुरानी इमारतों में लोग दशकों से रह रहे हैं या व्यापार कर रहे हैं।

इस बाधा को दूर करने के लिए एलडीए ने एक विशेष कार्ययोजना बनाई है, जिसके तहत सबसे पहले मौके पर जाकर विस्तृत सर्वे किया जाएगा। सर्वे के माध्यम से न केवल आवंटियों की संख्या स्पष्ट होगी, बल्कि उनकी समस्याओं और अपेक्षाओं को भी समझा जाएगा। इसके बाद डिजाइन और ड्राइंग तैयार की जाएगी ताकि आवंटियों को यह दिखाया जा सके कि, नई इमारत में उन्हें पहले से बेहतर और आधुनिक सुविधाएं मिलेंगी।

एलडीए ने तय किया है कि, वह केवल कागजों पर काम करने के बजाय सीधे आवंटियों के बीच जाएगा। कैलाश कुंज जैसे प्रमुख क्षेत्रों में विशेष कैंप लगाए जाएंगे, जहां अधिकारियों की टीम लोगों को पुनर्विकास नीति के फायदों के बारे में जागरूक करेगी। इन कैंपों का उद्देश्य आवंटियों के मन से विस्थापन के डर को खत्म करना और उन्हें नए कॉम्प्लेक्स में मिलने वाले मालिकाना हक के बारे में स्पष्ट जानकारी देना है।

प्रथमेश कुमार संभाल रहे कमान

इसी तरह गोमतीनगर स्थित उजाला मार्केट का भी गहन सर्वे किया जाना है। यहां की योजना इसे एक एकल व्यावसायिक भूखंड के रूप में विकसित करने की है, जिससे क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों को नई ऊंचाई मिल सके। नंदा खेड़ा कॉम्प्लेक्स के मामले में एलडीए ने एक अलग रुख अपनाया है। यहां के आवंटियों को उनके पैसे वापस करने की योजना है ताकि इस पूरे भूखंड को एक बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट के रूप में स्वतंत्र रूप से विकसित किया जा सके।

नीति को लागू करने से पहले एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार स्वयं कमान संभाल रहे हैं। तिलक नगर, कंचन मार्केट और पेपर मिल कॉलोनी जैसी महत्वपूर्ण जगहों का वीसी खुद निरीक्षण करेंगे। इस भौतिक सत्यापन का उद्देश्य यह देखना है कि इमारतों की वास्तविक स्थिति कितनी जर्जर है और वहां कितने प्रतिशत हिस्से पर अवैध कब्जा हो चुका है।

निरीक्षण के बाद ही यह तय किया जाएगा कि, किन क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर पहले ढहाया जाना है। प्राधिकरण का मानना है कि भौतिक निरीक्षण से आवंटियों में विश्वास पैदा होगा और अवैध कब्जाधारियों पर दबाव बनेगा, जिन स्थानों पर अवैध कब्जे अधिक हैं, वहां पुलिस बल और प्रशासन की मदद से खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी, ताकि नए निर्माण के लिए रास्ता साफ हो सके।

इन कांप्लेक्स पर गिर सकती है गाज

पुनर्विकास की इस सूची में लखनऊ के कई महत्वपूर्ण और व्यस्ततम इलाके शामिल हैं। अलीगंज सेक्टर-जी कॉम्प्लेक्स और अयोध्या रोड स्थित कैलाश कुंज कॉम्प्लेक्स इस सूची में सबसे ऊपर हैं। इसके अलावा कानपुर रोड स्थित ईडब्ल्यूएस भवन सेक्टर-जी, जो लंबे समय से मरम्मत के अभाव में असुरक्षित घोषित हो चुका है, उसे भी तोड़ा जाएगा।

अवध चौराहे पर स्थित पुराना कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स और हुसैनगंज का विकास दीप कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स, जो कभी शहर की शान हुआ करते थे, अब नए स्वरूप में नजर आएंगे। तालकाटोरा रोड स्थित नंदखेड़ा कॉम्प्लेक्स और विवेक खंड की उजाला मार्केट को भी पूरी तरह से नया रूप देने की तैयारी है। इन सभी स्थानों पर नए कॉम्प्लेक्स बनने से न केवल एलडीए की आय बढ़ेगी, बल्कि शहर की ट्रैफिक और पार्किंग की समस्याओं का भी समाधान होगा।

एलडीए के विजन के अनुसार, नए बनने वाले कॉम्प्लेक्स केवल कंक्रीट के ढांचे नहीं होंगे, बल्कि वे अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस होंगे। इनमें मल्टीलेवल पार्किंग, बेहतर फायर फाइटिंग सिस्टम, लिफ्ट, एस्केलेटर और हरित क्षेत्र का विशेष ध्यान रखा जाएगा। अक्सर पुरानी इमारतों में पार्किंग और आग से बचाव के इंतजाम नहीं होते, जिससे वहां जान-माल का खतरा बना रहता है।

कड़ाई से होगा सुरक्षा मानकों का पालन

नई नीति के तहत बनने वाले भवनों में सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन किया जाएगा। एलडीए वीसी प्रथमेश कुमार का स्पष्ट कहना है कि इस नीति का प्राथमिक उद्देश्य उन लोगों को बेहतर जीवन और व्यापारिक माहौल देना है जो वर्तमान में खंडहरनुमा और असुरक्षित इमारतों में काम कर रहे हैं। यह कायाकल्प न केवल लखनऊ की खूबसूरती बढ़ाएगा बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी तेज करेगा।

 

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