
सनातन धर्म में समय की गणना केवल कैलेंडर की तारीखों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रहों की चाल, नक्षत्रों की स्थिति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह पर भी आधारित है। इसी गणना के क्रम में आज यानी 14 मार्च की देर रात एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय घटना घटने जा रही है। ग्रहों के राजा सूर्य देव अपनी वर्तमान राशि कुंभ से निकलकर देवगुरु बृहस्पति की राशि मीन में प्रवेश करेंगे। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का गुरु की राशियों धनु या मीन में प्रवेश करना खरमास के नाम से जाना जाता है। आज रात एक बजकर आठ मिनट पर खरमास शुरू हो जायेगा। इसी के साथ मांगलिक और शुभ कार्यों पर एक महीने के लिए विराम लग जाएगा।
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इन सनातन कार्यों पर लगी पाबंदी
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार खरमास की इस अवधि को सांसारिक सुखों, उत्सवों और नए व्यापारिक प्रतिष्ठानों के लिए अशुभ या वर्जित माना गया है। हालांकि, इसे अशुभ’ कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा, क्योंकि आध्यात्मिक दृष्टि से यह मास अत्यंत पवित्र और ऊर्जादायक होता है।
ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि, जब सूर्य अपने गुरु बृहस्पति की राशि में सेवा भाव से प्रवेश करते हैं, तो वे अपनी उग्रता और शासन करने की शक्ति को त्याग देते हैं। चूंकि किसी भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, जनेऊ या गृह प्रवेश के सफल और सुखद होने के लिए सूर्य का तेज और गुरु का आशीर्वाद मिलना अनिवार्य है, इसलिए इस दौरान इन शक्तियों के मृदु होने के कारण नए कार्यों का शुभारंभ फलदायी नहीं माना जाता।

इस वर्ष खरमास की शुरुआत को लेकर लोगों में तिथि का थोड़ा संशय है, जिसे समझना आवश्यक है। सूर्य का गोचर 14 मार्च की रात को हो रहा है, लेकिन चूंकि यह समय मध्यरात्रि के बाद का है, इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 15 मार्च की तारीख लग जाएगी। अतः शास्त्रीय रूप से खरमास का प्रभाव 15 मार्च की सुबह से दिखाई देगा और यह पूरे एक महीने तक चलता हुआ 14 अप्रैल को समाप्त होगा। 14 अप्रैल को जब सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में प्रवेश करेंगे, तब जाकर मेष संक्रांति के साथ पुनः मांगलिक कार्यों के द्वार खुलेंगे। तब तक के लिए विवाह की शहनाइयां शांत रहेंगी और नए घरों की नींव रखने जैसे कार्यों को रोक दिया जाएगा।
ये हैं वैज्ञानिक कारण
खरमास के दौरान वर्जित किए गए कार्यों के पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक और ज्योतिषीय कारण छिपे हैं। विवाह जैसे संस्कार के लिए शुक्र और गुरु का उदय होना तथा सूर्य का बलवान होना आवश्यक है। खरमास में सूर्य के कमजोर पड़ने से दांपत्य जीवन में कलह, सामंजस्य की कमी और स्वास्थ्य संबंधी बाधाएं आने की आशंका बनी रहती है। यही कारण है कि हिंदू समाज में इस एक महीने के दौरान सगाई या पाणिग्रहण संस्कार जैसे आयोजन नहीं किए जाते। इसी तरह, गृह प्रवेश के लिए भी यह समय वर्जित है। माना जाता है कि खरमास में नए घर में निवास शुरू करने से परिवार में मानसिक अशांति और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है। संपत्ति की खरीद-फरोख्त या नए वाहन के स्वागत को भी इस समय टालना ही बुद्धिमानी माना गया है, क्योंकि गुरु की शुभता के बिना किया गया निवेश अक्सर विवादों या हानि का कारण बन जाता है।
मुंडन और नामकरण जैसे महत्वपूर्ण संस्कारों पर भी इस अवधि में रोक रहती है। सनातन परंपरा में माना जाता है कि बालक के पहले संस्कार उसकी शारीरिक और मानसिक बनावट पर गहरा प्रभाव डालते हैं और सूर्य की मंद स्थिति इन संस्कारों के सकारात्मक प्रभाव को कम कर सकती है। इसके अतिरिक्त, यदि कोई व्यक्ति नया व्यवसाय शुरू करने की योजना बना रहा है, तो उसे भी 14 अप्रैल तक प्रतीक्षा करने की सलाह दी जाती है। व्यापार के लिए बुद्ध और सूर्य का सामंजस्य जरूरी है, जो खरमास की अवधि में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं खरमास को
लेकिन क्या खरमास केवल निषेध का महीना है? बिल्कुल नहीं। वास्तव में, यह मास मनुष्य को अंतर्मुखी होने और अपनी आत्मा के करीब जाने का संदेश देता है। जब बाहरी दुनिया के उत्सव थम जाते हैं, तब आंतरिक जगत की यात्रा शुरू होती है। शास्त्रों में खरमास को पुरुषोत्तम मास के समान ही पुण्यदायी बताया गया है, बशर्ते इस समय का उपयोग सही दिशा में किया जाए। इस दौरान ब्रह्म मुहूर्त में जागना और पवित्र नदियों में स्नान करना दैहिक और दैविक कष्टों से मुक्ति दिलाता है। विशेष रूप से सूर्य देव की उपासना इस महीने का मुख्य केंद्र होती है। ‘ओम घृणि सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप या आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर की नकारात्मकता का नाश होता है और संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।

दान-पुण्य की दृष्टि से भी खरमास का महत्व अतुलनीय है। इस महीने में किए गए गुप्त दान, अन्न दान और वस्त्र दान का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है। मान्यता है कि, जो व्यक्ति खरमास के दौरान निस्वार्थ भाव से दीन-दुखियों की सेवा करता है, उस पर भगवान विष्णु की असीम कृपा बरसती है। पितरों के तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए भी यह समय उत्तम माना गया है। गया या अन्य तीर्थ स्थानों पर जाकर पूर्वजों के निमित्त किए गए कार्य उन्हें मोक्ष की ओर ले जाते हैं और वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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