होलिका दहन 2026: भद्रा काल और चंद्र ग्रहण के साये के बीच कब करें होलिका दहन?, ये है सही तिथि व मुहूर्त

सनातन धर्म में होली के पर्व का विशेष महत्व है। ये पर्व बसन्त ऋतु में मनाया जाता है। ये पर्व इस साल  फाल्गुन मास- शुक्ल-पक्ष, चतुर्दशी/पूर्णिमा को यानी 2 मार्च दिन- सोमवार को पड़ रहा है। इस दिन अश्वलेशा/मघा-नक्षत्र में होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात्रि 11ः53 से 12ः50 तक भद्रा के पुच्छ में होगा। होलिका पर्व पर 17ः18 से 04ः56 बजे तक भद्रा का साया रहेगा।

खग्रास चंद्रग्रहण 2026

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भगवान शंकर पर चढ़ेगा गुलाब

काशी महावीर पंचांग के अनुसार तीन मार्च को होली के दिन चन्द्र ग्रहण के बाद काशी की परम्परा को मानते हुए भगवान शंकर पर गुलाब चढ़ाया जायेगा। इसके बाद सर्वत्र होलिकोत्सव रंगोत्सव, बसन्तोत्सव होलिका विभूति धारण चार मार्च को प्रातः 8 बजे बुधवार को होना शुभ होगा।

पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक असुर था, जो बेहद अहंकारी था, वह खुद को ही ईश्वर मानता था। ऐसे में उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर पाबन्दी लगा रखी थी और खुद की पूजा करवाता था। हिरण्यकश्यप के एक पुत्र था, जिसका नाम प्रहलाद था। वह नारायण भक्त था।

प्रह्लाद हमेशा नारायण की भक्ति में लीन रहता था। पुत्र के इस बर्ताव से हिरण्यकश्यप बहुत नाराज रहता था और तरह-तरह की यातना देकर उसकी ईश्वर के प्रति भक्ति को खत्म करना चाहता था, लेकिन प्रहलाद पर इसका कोई असर नहीं होता था। अंत में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद को नष्ट करने के लिए कहा।

दरअसल,  होलिका को वरदान प्राप्त था कि, वह आग से नहीं जलेगी, इसलिए होलिका, प्रहलाद को भस्म करने के लिए उसे गोद में लेकर आग में बैठ गयी, लेकिन वह अपने इस मकसद में कामयाब नहीं हो सकी। भगवान ने भक्त प्रहलाद की रक्षा की और होलिका को आग में जलाकर भस्म कर दिया। हमेशा आसुरीय शक्ति का दमन होता है और अच्छाई की विजय होती है।

वैज्ञानिक मान्यता

दूसरा वैज्ञानिक मान्यता मौसम में बदलाव की है। धीरे-धीरे सर्दी खत्म होती है और गर्मी आने लगती लगती है, जिससे वातावरण में बैक्टीरिया और मच्छरों की संख्या में इजाफा होता है। इस बैक्टीरिया को खत्म करने के लिए होलिका पर्व का होना काफी महत्वपूर्ण होता है। होलिका दहन के दौरान आग की परिक्रमा करने से शरीर में मौजूद बैक्टीरिया खत्म होने लगते हैं।

रंग थैरेपी

वैज्ञानिकों का एक मत यह भी है कि होली रंगों का पर्व है और रंग हमारे जीवन में कई रोगों से रंगथैरेपी में कारगर सिद्ध हुए हैं।

नारंगी रंग: यह रंग उत्साह को बढ़ाकर फेफड़ों को मजबूत बनाता है, आस्थमा, ब्रोनकाइटिसस्ट और किड़नी इन्फेक्सन के मामलों में अधिक उपयोगी साबित होता है।
नीला रंग: यह ठंड रंग का प्रतीक है उच्च रक्तचाप को कम करने में मददगार साबित होता है। सिरदर्द, सूजन, सर्दी, खांसी के उपचार में इसकी थैरेपी का प्रयोग किया जाता है।
पीला रंग: यह रंग मानसिक उत्तेजना के साथ नर्वस सिस्टम को मजबूत बनाता है। पेट खराब, खाज, खुजली में पीला रंग फाइदेमन्द होता है।
लाल रंग: लाल रंग गर्म प्रकृति का होने के कारण दर्द में अधिक फायदेमंद हैं। अनिद्रा, कमजोरी और रक्त से जुड़े रोगों में राहत देता
है।

 

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