
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर एक बार फिर असमंजस की स्थिति बनती जा रही है। खबर है कि, ग्राम प्रधानों को एक बार फिर छह महीने का अतिरिक्त कार्यकाल मिलने के प्रबल आसार बन गए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट बताई जा रही है, जो अब तक तैयार नहीं हो सकी है। संभावना है कि, आयोग यह रिपोर्ट नवंबर-दिसंबर तक शासन को सौंप सकता है। इसके अलावा प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव भी इस पूरे घटनाक्रम को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों और प्रशासनिक हलकों में यह लगभग तय माना जा रहा है कि, पंचायत चुनाव एक बार फिर टलेंगे, जिसके लिए राज्य सरकार को प्रधानों का कार्यकाल आगे बढ़ाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचेगा।
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अप्रैल 2026 में होने थे चुनाव
गौरतलब है कि, उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव मूल रूप से अप्रैल 2026 में संपन्न होने प्रस्तावित थे, लेकिन विभिन्न प्रशासनिक और कानूनी अड़चनों की वजह से समय पर यह चुनाव नहीं कराए जा सके। इसके परिणामस्वरूप 26 मई को राज्य सरकार ने ग्राम प्रधानों के कार्यकाल को छह महीने के लिए आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था।

सरकार के इस निर्णय के अनुसार यह विस्तारित अवधि नवंबर माह में समाप्त होने वाली है, लेकिन अब जिस तरह से पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने में देरी हो रही है और साथ ही विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी जोर पकड़ रही हैं, ऐसे में यह लगभग साफ हो गया है कि, प्रधानों को एक बार फिर छह महीने का अतिरिक्त कार्यकाल दिया जाएगा।
प्रशासक नियुक्ति को हाई कोर्ट ने बताया था असंवैधानिक
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि, जब राज्य सरकार ने पहले प्रधानों का मूल कार्यकाल समाप्त होने के बाद उनकी जगह प्रशासकों की नियुक्ति की थी, तब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस कदम को असंवैधानिक करार दिया था। अदालत के इस रुख के बाद सरकार के सामने प्रशासनिक दृष्टि से कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो गई थीं, जिसके चलते बाद में सरकार को मौजूदा प्रधानों को ही अतिरिक्त कार्यकाल देकर व्यवस्था बनाए रखनी पड़ी।
26 मई को समाप्त हुआ था कार्यकाल
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का नियमित कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया था। कार्यकाल समाप्त होने के तत्काल बाद राज्य सरकार ने प्रधानों को ही अगले छह महीनों के लिए प्रशासक के तौर पर नियुक्त कर दिया। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रशासकों की कार्यावधि 27 मई 2026 से आरंभ होकर अधिकतम छह महीने तक निर्धारित की गई है। हालांकि, इस दौरान प्रशासकों के अधिकार सीमित रखे गए हैं।
नियमानुसार प्रशासक इस अवधि में केवल दैनिक प्रशासनिक कार्य ही संभाल सकते हैं, जबकि किसी भी बड़े नीतिगत फैसले को लागू करने के लिए उन्हें संबंधित जिलाधिकारी से पूर्व मंजूरी लेनी अनिवार्य होगी। इस व्यवस्था के चलते प्रशासकों को आगे और कौन-कौन से अधिकार मिलेंगे, इसे लेकर प्रशासनिक स्तर पर अभी भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। बहरहाल, राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह लगभग तय माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव अब इस वर्ष नहीं बल्कि अगले साल ही आयोजित हो पाएंगे।
आरक्षण तय करने के लिए नई प्रक्रिया शुरू
इस बीच योगी सरकार ने प्रदेश में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की तैयारियों को लेकर एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य जैसे विभिन्न पदों पर आरक्षण की व्यवस्था तय करने के लिए एक नई प्रक्रिया अपनाई है। इसके तहत प्रदेश के सभी जिलों से ग्राम पंचायतवार आधार पर 14 विभिन्न बिंदुओं पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। सरकार का कहना है कि इन्हीं रिपोर्टों के विश्लेषण के आधार पर अंततः आरक्षण की व्यवस्था तय की जाएगी, ताकि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमानुसार संपन्न हो सके।
पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका अहम
गौरतलब है कि आरक्षण की उचित व्यवस्था तय करने के मकसद से राज्य सरकार ने पहले ही पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। यह आयोग अलग-अलग जिलों से प्राप्त आंकड़ों और रिपोर्टों का अध्ययन कर अपनी अनुशंसा तैयार करेगा। सूत्रों के अनुसार आयोग द्वारा यह पूरी रिपोर्ट नवंबर-दिसंबर माह तक शासन को सौंपे जाने की उम्मीद है। यही वजह है कि जब तक आयोग की रिपोर्ट प्राप्त नहीं होती, तब तक चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना प्रशासनिक रूप से संभव नहीं होगा।
क्या होगी आगे की प्रक्रिया
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक जैसे ही सभी जिलों से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट शासन को प्राप्त हो जाएगी, उसके उपरांत आरक्षण से संबंधित अंतिम सूची राज्य शासन की ओर से औपचारिक रूप से जारी की जाएगी।
इस सूची के प्रकाशन के बाद आम जनता और संबंधित पक्षों से आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी, ताकि यदि किसी वर्ग या क्षेत्र को इस व्यवस्था पर कोई एतराज हो तो उसे समय रहते दर्ज कराया जा सके। इन आपत्तियों के समुचित निस्तारण के बाद ही चुनाव आयोग की ओर से पंचायत चुनाव को लेकर औपचारिक अधिसूचना जारी होने की संभावना जताई जा रही है।
चुनाव में और होगी देरी
कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर स्थिति अब भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। एक तरफ आरक्षण प्रक्रिया को पूरी तरह वैधानिक और पारदर्शी तरीके से पूरा करने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव बना रही हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन तमाम कारणों को देखते हुए सरकार के पास प्रधानों को एक और छह महीने का कार्यकाल देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचता। हालांकि इस पूरे मामले में अंतिम फैसला आयोग की रिपोर्ट और सरकार की आगामी रणनीति पर ही निर्भर करेगा, जिस पर आने वाले दिनों में स्पष्टता आने की उम्मीद है।
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