
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जमीनी स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले पंचायत चुनाव 2026 को लेकर कानूनी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग और प्रदेश सरकार के रुख पर कड़ा संज्ञान लिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि, क्या संवैधानिक समय सीमा के भीतर चुनाव प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी? यह मामला न केवल प्रशासनिक तैयारियों पर सवाल उठाता है, बल्कि उत्तर प्रदेश के लाखों मतदाताओं और भावी प्रत्याशियों की उम्मीदों से भी जुड़ा है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 25 मार्च की तारीख तय की है।
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याची में अनुच्छेद 243E का दिया हवाला
इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह मामला याचिकाकर्ता इम्तियाज हुसैन की तरफ से दाखिल किया गया है और उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव ‘ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत’ चुनाव को समय पर संपन्न कराने की मांग की गई है।

याची के अधिवक्ता ने कोर्ट के समक्ष भारत के संविधान के अनुच्छेद 243E का हवाला देते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु रखा। दलील में कहा गया कि, संविधान के अनुसार किसी भी पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से अधिकतम 5 वर्ष तक ही हो सकता है। अनुच्छेद में स्पष्ट रूप से इससे अधिक नहीं वाक्यांश का प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ यह है कि मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नई पंचायतों के गठन की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि, प्रतिवादी यानी राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार चुनाव संपन्न कराने के लिए एक विस्तृत और समय-बद्ध कार्यक्रम कोर्ट के रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करें।
याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने आयोग से पूछा है कि क्या वह तय संवैधानिक ढांचे के भीतर चुनाव कराने में सक्षम है?अदालत ने विशेष रूप से 19 फरवरी की मौजूदा अधिसूचना का संदर्भ देते हुए आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। कोर्ट का तर्क है कि, तथ्यों और नियमों के अनुसार, समस्त चुनाव प्रक्रिया 26 मई को या उससे पहले ही संपन्न हो जानी चाहिए। कोर्ट ने आयोग से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि, क्या प्रशासनिक और मशीनरी स्तर पर ऐसी तैयारियां हैं कि मई के अंतिम सप्ताह तक उत्तर प्रदेश को नई पंचायतें मिल सकें।
चुनाव आयोग ने दी ये दलील
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग के वकील ने अपना पक्ष रखते हुए गेंद राज्य सरकार के पाले में डालने की कोशिश की। आयोग की ओर से दलील दी गई कि, यूपी पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12-BB के प्रावधानों के अनुसार, चुनाव की तारीखों का निर्धारण करना प्राथमिक रूप से राज्य सरकार का दायित्व है।आयोग के अनुसार, राज्य सरकार को निर्वाचन आयोग के साथ परामर्श करके प्रधानों के आम चुनाव या उपचुनाव की तिथि तय करने वाली अधिसूचना जारी करनी होती है। इस दलील के माध्यम से यह संकेत देने का प्रयास किया गया कि, जब तक सरकार की तरफ से हरी झंडी और तारीखों की अधिसूचना नहीं आती, आयोग अपनी अंतिम तैयारी को अमली जामा नहीं पहना सकता।
अप्रैल में जारी करनी होगी वोटर लिस्ट

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में पंचायत चुनाव संपन्न कराना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। इसमें करोड़ों मतदाता, लाखों पोलिंग बूथ और विशाल पुलिस बल की आवश्यकता होती है। कोर्ट की सख्ती के बाद अब राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच समन्वय की गति बढ़ने की उम्मीद है।यदि चुनाव 26 मई तक संपन्न कराने हैं, तो सबसे पहले सीटों का परिसीमन और आरक्षण सूची समय पर जारी करनी होगी। इसके साथ ही नए मतदाताओं को जोड़ने और त्रुटियां सुधारने का कार्य युद्ध स्तर पर करना होगा। अप्रैल के शुरुआती हफ्तों तक अधिसूचना जारी होनी आवश्यक है ताकि मई तक मतदान के सभी चरण पूरे किये जा सकें।
25 मार्च को होगी आगली सुनवाई
इलाहाबाद हाई कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को करेगा। इस दिन राज्य निर्वाचन आयोग को कोर्ट को यह बताना होगा कि उनका विस्तृत प्लान क्या है। क्या वे 26 मई की डेडलाइन का पालन कर पाएंगे या उन्हें और समय की आवश्यकता है?कानूनी जानकारों का मानना है कि, कोर्ट इस मामले में बेहद सख्त रुख अपना सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक अनिवार्यताओं से जुड़ा विषय है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में इस खबर के बाद से ही चुनावी सुगबुगाहट तेज हो गई है और संभावित उम्मीदवार अब हाई कोर्ट के अगले आदेश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
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