
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले जातिगत राजनीति एक बार फिर से गरमा गई है। हाल ही में उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आरक्षण व्यवस्था का विरोध कर रहे युवाओं के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसी दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मनुस्मृति के मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी को घेरते हुए तीखा हमला बोला था। इन दोनों घटनाक्रमों ने प्रदेश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। क्या भाजपा को अपने परंपरागत कोर वोटर सवर्ण समुदाय की चिंता सता रही है? और चुनाव से पहले जातीय संतुलन बनाए रखने के लिए पार्टी की रणनीति क्या होगी?
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आरक्षण और मनुस्मृति के मुद्दे पर तेज हुई सियासत
राज्य में आरक्षण व्यवस्था के विरोध में शुरू हुई इस मुहिम ने सियासी हलकों में खलबली मचा दी है। इस अभियान का नेतृत्व हर्ष दुबे और अजीत भारती जैसे युवा चेहरे कर रहे हैं, जिनके नेतृत्व में युवाओं ने कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी किये। इसी क्रम में हर्ष दुबे ने अपने कुछ साथियों के साथ उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसने राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा बटोरी। हालांकि, इसके तुरंत बाद अजीत भारती समेत कुछ अन्य युवाओं ने आरोप लगाया कि, यह प्रेस कॉन्फ्रेंस स्वतंत्र इच्छा से नहीं, बल्कि दबाव में करवाई गई थी। इस आरोप ने पूरे प्रकरण को और उलझा दिया।

इसी बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान मनुस्मृति की सोच और पुरुष प्रधान मानसिकता को लेकर तीखी टिप्पणी की थी। इस बयान पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पलटवार करते हुए कहा कि, राहुल गांधी को पहले देश की परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को समझने की जरूरत है। इस पूरे विवाद के बाद समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने भाजपा से आरक्षण के मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
2024 के लोकसभा नतीजों ने बढ़ा दी है चिंता
भाजपा की इस फ़िक्र की वजह 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों में देखी जा रही हैं। उस चुनाव में संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दे विपक्ष के पक्ष में गए थे, जिसका सीधा असर नतीजों पर दिखा। उत्तर प्रदेश में भाजपा को 33 सीटें मिलीं और पूरे एनडीए गठबंधन को 37 सीटें हासिल हुईं, जबकि समाजवादी पार्टी अकेले 37 सीटें जीतने में सफल रही। पूरे I.N.D.I.A. गठबंधन ने 43 सीटों पर कब्जा जमाया। इन नतीजों के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए दलित और ओबीसी वर्गों तक अपनी पहुंच बढ़ाने पर विशेष जोर दिया। इसके तहत संत रविदास यात्रा जैसे कई बड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए और पार्टी संगठन में ओबीसी नेताओं के प्रतिनिधित्व को भी बढ़ाया गया।
UGC से नाराज हैं स्वर्ण
इस बीच एक और मुद्दे ने भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। यूजीसी अधिनियम को लेकर सवर्ण और दलित-पिछड़े वर्गों के बीच स्पष्ट मतभेद देखने को मिला। सवर्ण समुदाय के लोगों ने इस अधिनियम का खुलकर विरोध दर्ज कराया। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अंतरिम रोक लगा दी। इस पूरे प्रकरण ने भाजपा के सामने एक असमंजस की स्थिति पैदा कर दी कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर वह किस पक्ष के साथ खड़ी नजर आए।
इसके अलावा शंकराचार्य से जुड़े विवाद और अलंकार रस्तोगी के इस्तीफे जैसी घटनाओं ने भी पार्टी के लिए स्थिति और जटिल बना दी। विपक्षी दल लगातार भाजपा पर ब्राह्मण समुदाय के अपमान से जुड़े आरोप भी लगाते रहे हैं। इन सभी घटनाक्रमों के बीच आरक्षण को लेकर हो रहे ताजा विरोध और समर्थन ने भाजपा के सामने जातीय संतुलन बनाए रखने की चुनौती को एक बार फिर सामने ला दिया है।
क्यों परेशान है भाजपा
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमान के, मुताबिक उत्तर प्रदेश में सवर्ण मतदाताओं की कुल आबादी करीब 20 प्रतिशत है। इसमें लगभग 9 से 10 प्रतिशत ब्राह्मण समुदाय से, 7 प्रतिशत क्षत्रिय समुदाय से, और शेष 2-2 प्रतिशत वैश्य, कायस्थ, भूमिहार तथा अन्य उप-जातियों से आते हैं। प्रदेश की करीब 100 विधानसभा सीटों पर इस वर्ग का उल्लेखनीय प्रभाव माना जाता है, जबकि 40 से 50 सीटें ऐसी हैं जहां सवर्ण मतदाता सीधे तौर पर हार-जीत का फैसला करने की स्थिति में होते हैं।
इतना ही नहीं, यह वर्ग अन्य जातियों के मतदान व्यवहार को भी प्रभावित करने में सक्षम माना जाता है। भाजपा की चिंता इसलिए भी ज्यादा गहरी मानी जा रही है क्योंकि यह वर्ग पार्टी का परंपरागत कोर वोट बैंक रहा है, और आमतौर पर माना जाता है कि करीब 70 से 80 प्रतिशत सवर्ण मतदाता भाजपा के पक्ष में ही मतदान करते हैं।
संतुलन साधने की कोशिश में भाजपा
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर लगातार इस बात पर मंथन चल रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले जाति आधारित राजनीति के इस उभरते समीकरण का समाधान कैसे निकाला जाए। भाजपा नेतृत्व की मौजूदा कोशिश यह दिखाई दे रही है कि एक ओर ओबीसी और दलित समुदायों को साधा जाए, तो दूसरी ओर उसका परंपरागत सवर्ण वोट बैंक भी उससे दूर न जाए। इसी रणनीति के तहत पार्टी दलितों और ओबीसी को पूरा सम्मान देने के साथ-साथ सवर्ण समुदाय के साथ भी मजबूती से खड़े दिखने का प्रयास कर रही है।
इसके अलावा भाजपा की एक और कोशिश यह भी नजर आ रही है कि मनुस्मृति के मुद्दे को सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर पूरी बहस को जातीय खांचे से बाहर निकालकर एक धार्मिक-सांस्कृतिक स्वरूप दिया जाए। इस रणनीति के जरिए पार्टी यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि यह मुद्दा किसी खास जाति विशेष का न होकर पूरे समाज की परंपरा और अस्मिता से जुड़ा है।
एक बार फिर केंद्र में जातीय समीकरण
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की सियासत में जातीय समीकरण एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं। भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह अपने विस्तारित सामाजिक आधार ओबीसी और दलित मतदाताओं को बनाए रखते हुए अपने परंपरागत कोर वोटर सवर्ण समुदाय को भी संतुष्ट रखे। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी इस नाजुक संतुलन को किस तरह साधती है और विपक्षी दल इस मुद्दे को चुनावी बहस में किस हद तक भुनाने में कामयाब होते हैं।
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