
माले/नई दिल्ली। दक्षिण एशिया में एक बार फिर सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ) को पुनर्जीवित करने की मांग तेज हो गई है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने हाल ही में कहा था कि, उनका देश इस क्षेत्रीय संगठन की गतिविधियों को दोबारा से शुरू कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार है। मुइज्जू ने ये भी कहा कि, मालदीव सार्क के साथ शुरू से जुड़ा है या यूं कहें कि, ये संस्थापक देशों में से एक है। इस संगठन ने दक्षिण एशिया के विकास में अहम योगदान दिया है, लेकिन पिछले करीब एक दशक से ये ठप पड़ा हुआ है।
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भारत नहीं दे रहा तवज्जो
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मुइज्जू अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जो इस मंच को दोबारा से एक्टिव करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद वहां का नेतृत्व ने भी बार-बार सार्क की बहाली की मांग कर रहा है। चाहे मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार रही हो या अब सत्ता में आई तारिक रहमान सरकार, दोनों इस मंच को पुनर्जीवित करने पर जोर दे रहे हैं। नेपाल भी इनके साथ सुर में सुर मिला चुका है, लेकिन भारत की तरफ से इन तमाम अपीलों को अब तक कोई खास तवज्जो नहीं मिली है।

क्षेत्रीय मामलों के जानकार हैप्पीमोन जैकब का आकलन है कि, सार्क के दोबारा एक्टिव होने से नई दिल्ली की स्थिति और मजबूत होगी, लेकिन व्यवहार में इसका सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान को मिलने की आशंका है। पाकिस्तान लंबे समय से चाहता रहा है कि भारत के बराबर उसे भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तवज्जो मिले, जबकि भारत उसे किसी तरह की छूट देने के मूड में नहीं नजर आ रहा है।
भारत स्थायी दुश्मन- असीम मुनीर
यहां ये भी ध्यान देने वाली बात है कि, मुइज्जू, यूनुस और तारिक रहमान इन तीनों नेताओं का झुकाव कहीं न कहीं पाकिस्तान की तरफ माना जाताहै। दूसरी तरफ पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर भारत को लेकर सख्त बयान दे चुके हैं और उसे स्थायी दुश्मन तक करार दे चुके हैं। ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि, भारत ऐसे पड़ोसी को किसी मंच पर रियायत क्यों देगा।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि, नई दिल्ली की पड़ोस-नीति दोहरी चुनौती से घिरी है। एक तरफ अगर भारत क्षेत्र में जितना ज्यादा सक्रिय होकर जुड़ता है, वहां के लोगों में उतनी ही नाराजगी बढ़ती दिखती है, चाहे वह जायज हो या नहीं। दूसरी तरफ अगर भारत पीछे हटता है, तो उसे भू-राजनीतिक रूप से नुकसान झेलना पड़ता है, क्योंकि इस खालीपन को भरने के लिए चीन तुरंत आगे बढ़ जाता है।
भारत के लिए बड़ी दुविधा
भारत की सबसे बड़ी उलझन यह है कि, पड़ोस पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने से उसकी वैश्विक महत्वकांक्षाएं प्रभावित होती हैं, जबकि चीन दक्षिण एशिया में लगातर अपनी पैठ बढ़ा रहा है। साथ ही अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति भी भारत की सोच से पूरी तरह मेल नहीं खाती। इन्हीं वजहों से कुछ रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि, भारत के पास सार्क को फिर सक्रिय करने पर विचार करने के तार्किक आधार मौजूद हैं।
आपको बता दें कि, भारत आर्थिक और भौगोलिक दोनों रूप में सार्क क्षेत्र का सबसे बड़ा देश है, जिससे उसे पड़ोसी देशों में स्वाभाविक प्रभाव हासिल है। जानकार बताते हैं कि, भले ही इससे पाकिस्तान के साथ रिश्तों में कोई खास सुधार न हो, लेकिन क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित किया जा सकता है।
कई मजबूत मंचों से जुड़ा है भारत
हालांकि, भारत की वैश्विक कूटनीति पहले से ही कई मजबूत मंचों पर टिकी है। क्वाड, जी-20 और जी-7 (अतिथि के रूप में) में उसकी सक्रिय भागीदारी है। पश्चिम एशिया में I2U2 (भारत, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका) और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) नई दिल्ली को भू-राजनीतिक और आर्थिक विस्तार के नए अवसर दे रहे हैं। ग्यारह देशों वाला ब्रिक्स समूह भी भारत की वैश्विक भागीदारी को और व्यापक बना चुका है। दक्षिण एशिया में सार्क का व्यावहारिक विकल्प फिलहाल बिम्सटेक ही रह गया है।
पाकिस्तान क्यों बेताब है
पाकिस्तान के लिए सार्क की अहमियत काफी ज्यादा है, क्योंकि शंघाई सहयोग संगठन के अलावा वह किसी बड़े वैश्विक या क्षेत्रीय समूह से नहीं जुड़ा है। वह बंगाल की खाड़ी केंद्रित संगठन बिम्सटेक का भी सदस्य नहीं है जबकि भारत, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका और थाईलैंड इसमें शामिल हैं। सार्क के सदस्य देशों में शामिल सिर्फ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मालदीव ही बिम्सटेक से बाहर हैं। उन्हें इसमें जगह नहीं दी गई है।

पाकिस्तान चाहता है कि, सार्क बहाल ही जाये ताकि कूटनीतिक मंच पर भारत के समकक्ष खड़े होने का मौका उसे भी मिलने लगे। यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि, पाकिस्तान लंबे समय से इस मंच का इस्तेमाल भारत के साथ अपने द्विपक्षीय विवाद उठाने और खुद को पीड़ित के रूप में पेश करने के लिए करता रहा है।
पाकिस्तान लगा सकता है अडंगा
चूंकि सार्क सर्वसम्मति के आधार पर काम करता है, यानी किसी भी फैसले के लिए सभी सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। पाकिस्तान इस व्यवस्था का फायदा उठाकर भारत की बड़ी क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार योजनाओं को पहले भी रोक चुका है। ऐसे में आशंका है कि, सार्क यदि फिर से एक्टिव होता है तो पाकिस्तान आगे भी ऐसा कर सकता है।
पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान वैश्विक मंच पर काफी हद तक अलग-थलग रहा है। ट्रंप प्रशासन के दौर में उसकी अहमियत कुछ बढ़ी जरूर है, लेकिन इस्लामाबाद में हमेशा ये डर बना रहता है कि, सत्ता परिवर्तन के बाद कहीं वह फिर हाशिये पर न आ जाये। ऐसे में सार्क उसके लिए वैश्विक अलगाव से बचने का एक जरिया बन सकता है।
भारत की स्पष्ट नीति
पाकिस्तान को लेकर भारत की मौजूदा नीति एकदम स्पष्ट है। आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत का साफ कहना है कि, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर लगाम नहीं लगाता, भारत उसके साथ किसी भी द्विपक्षीय या क्षेत्रीय मंच पर बैठने को तैयार नहीं है। इसके अलावा भारत के पास अब सार्क से कहीं अधिक प्रभावी और आगे बढ़ते हुए क्षेत्रीय व वैश्विक मंच मौजूद हैं।
बिम्सटेक और बीबीआईएन (बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल) जैसे मंच पाकिस्तान को दरकिनार किये हुए हैं और भारत को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़े हुए हैं, जबकि क्वाड, ब्रिक्स, I2U2 और IMEC भारत की वैश्विक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल बैठते हैं। इसके अलावा सार्क के सक्रिय रहते हुए पाकिस्तान पहले भी सार्क मोटर वाहन समझौते जैसी भारतीय पहलों में अड़ंगा लगा चुका है। यही वजह है कि भारत अब पाकिस्तान की रुकावट डालने वाली रणनीति में और समय गंवाना नहीं चाहता।
कुल मिलाकर, मालदीव, बांग्लादेश और नेपाल भले ही सार्क की बहाली के लिए दबाव बना रहे हों, लेकिन भारत की प्राथमिकता सूची में यह मंच फिलहाल सबसे नीचे ही नजर आता है। भारत इसे बहाल करने के मूड में बिलकुल भी नहीं नजर आ रहा है।
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