अब पेपर लीक करने वालों की खैर नहीं, 10 करोड़ जुर्माना और 10 साल तक की जेल!

नई दिल्ली। देशभर में पेपर लीक और नकल जैसी घटनाओं पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार अब एक और सख्त कदम उठाने जा रही है। जी हां सरकार इस मानसून सत्र में सोमवार को लोकसभा में एक महत्वपूर्ण संशोधन बिल पेश करने जा रही है, जिसका मकसद मौजूदा कानून को और अधिक सख्त बनाना है। इस विधेयक का नाम है सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक-2026।

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कैबिनेट दे चुका है मंजूरी

गौरतलब है कि, इस संशोधन विधेयक को केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने 24 जुलाई को अपनी मंजूरी दे दी थी। अब इसे 27 जुलाई यानी आज संसद के निचले सदन के पटल पर रखा जाएगा।

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सरकार की योजना इसी दिन इस पर चर्चा कराकर इसे पारित कराने की भी है, हालांकि, संसदीय परंपरा में किसी विधेयक को एक ही दिन के भीतर पेश करके पारित कर दिया जाना अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि, विपक्ष इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है क्या वह इस पर चर्चा करके पास करने में अपनी सहमति देगा या कोई पेंच फंसायेगा और नये संशोधन की मांग करेगा।

क्यों पड़ी नए कानून की जरूरत?

बीते कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकारी भर्ती परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं जिससे लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य को प्रभावित किया, बल्कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए। इसी को देखते हुए 2024 में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम लाया गया था, लेकिन अब सरकार का मानना है कि, मौजूदा कानून में सजा और जांच से जुड़े प्रावधानों को और कठोर बनाने की जरूरत है, ताकि अपराधियों में कानून का डर पैदा हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

पुराने और नए कानून में अंतर

अगर मौजूदा 2024 के कानून की बात करें, तो इसमें सामान्य मामलों में तीन से पांच साल तक की सजा प्रावधान है। वहीं, अगर मामला संगठित अपराध यानी किसी गिरोह द्वारा सुनियोजित तरीके से पेपर लीक कराने से जुड़ा हो, तो सजा पांच से दस साल तक बढ़ जाती है। जुर्माने की बात करें तो ऐसे मामलों में न्यूनतम एक करोड़ रुपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।

नए संशोधन विधेयक में इन प्रावधानों को और सख्त किया गया है। सामान्य मामलों में अब दोषी को कम से कम पांच साल और अधिकतम दस साल तक की जेल हो सकती है, साथ ही पचास लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जाएगा। वहीं, जो लोग या गिरोह संगठित रूप से पेपर लीक या परीक्षा में धांधली करते पाए जाएंगे, उनके लिए सजा और भी कड़ी रखी गई है। इस नये कानून में कम से कम सात साल की जेल और दस करोड़ रुपये तक का भारी-भरकम जुर्माने का प्रावधान है। इस तरह देखा जाए, तो नया कानून पुराने कानून की तुलना में सजा और जुर्माने दोनों ही मामलों में कहीं अधिक कठोर है।

जांच और सुनवाई की डेडलाइन

विधेयक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि, इसमें जांच और सुनवाई, दोनों के लिए एक डेडलाइन तय की गई है। प्रस्ताव के मुताबिक, पेपर लीक या परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल से जुड़े किसी भी मामले की जांच अब दो महीने के भीतर पूरी करनी अनिवार्य होगी। इसके बाद चार्जशीट दाखिल होने के तीन महीने के भीतर पूरे ट्रायल का निपटारा करना होगा। यानी जांच से लेकर अदालती फैसले तक की पूरी प्रक्रिया अब पहले से कहीं तेज गति से पूरी की जा सकेगी, जिससे दोषियों को जल्द से जल्द सजा दिलाई जा सके।

हर राज्य में बनेंगी फास्ट ट्रैक कोर्ट

तेज सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए विधेयक में यह प्रावधान भी किया गया है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह अधिकार दिया जाएगा कि, वे किसी भी सत्र न्यायालय को विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के रूप में अधिसूचित कर सकें। इन विशेष अदालतों में पेपर लीक से जुड़े मामलों की रोजाना सुनवाई होगी, ताकि मामले लंबे समय तक लंबित न रहें। इसके अतिरिक्त, जरूरत पड़ने पर केंद्र सरकार को किसी विशेष मामले की गहराई से जांच के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित करने का अधिकार भी दिया जाएगा।

परीक्षा प्रक्रिया में भी होगा बदलाव

नये प्रावधान को सिर्फ सजा और सुनवाई तक ही सीमित नहीं रखा गया है। इसमें परीक्षाओं के आयोजन की पूरी प्रक्रिया को लेकर भी नई गाइडलाइंस भी दी गई हैं। इसके तहत परीक्षा केंद्रों का पहले से ऑडिट करना, उम्मीदवारों की बायोमेट्रिक पहचान सुनिश्चित करना, केंद्रों पर सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त रखना, सीटों का उचित आवंटन करना, प्रश्नपत्र तैयार करने और उसे अपलोड करने की प्रक्रिया को सुरक्षित बनाना, परीक्षा के दौरान सतर्क निगरानी रखना, परीक्षा के बाद की गतिविधियों को व्यवस्थित करना और दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए स्क्राइब यानी सहायक लेखक उपलब्ध कराने जैसे इंतजाम शामिल हैं।

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इसके साथ ही विधेयक में साफ तौर पर 15 प्रकार की गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इनमें प्रश्नपत्र लीक करना, ओएमआर शीट के साथ छेड़छाड़ करना, फर्जी वेबसाइट के जरिए अभ्यर्थियों को गुमराह करना, नकली एडमिट कार्ड जारी करना और परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी अन्य तरह की धोखाधड़ी करना शामिल है। यानी अब सिर्फ पेपर लीक ही नहीं, बल्कि परीक्षा से जुड़ी हर स्तर की गड़बड़ी को कानूनी दायरे में लाने की कोशिश की गई है।

सरकार का मकसद

सरकार का कहना है कि, इस संशोधन विधेयक के पीछे मुख्य मकसद देश की परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को और मजबूत बनाना है। सरकार की दलील है कि जब तक सजा का प्रावधान सख्त नहीं होगा और मामलों की सुनवाई तेजी से नहीं होगी, तब तक अपराधियों में कानून का डर पैदा नहीं होगा। यही वजह है कि जांच और ट्रायल, दोनों के लिए ही अब स्पष्ट समयसीमा तय की गई है।

राजनीतिक हलकों में गरमाया है मुद्दा

गौरतलब है कि पेपर लीक को लेकर हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली समेत हर राज्य में छात्र सड़क पर उतर आये थे और जोर दार प्रदर्शन हुआ था। छात्रों के गुस्से को देखते ही मोदी सरकार के 12 सालों के कार्यकाल में ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी मंत्री को मजबूरन या यूं कहें की दबाव में आकर इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भी पेपर लीक का मुद्दा राजनीतिक हलकों में गरमाया हुआ है। ऐसे में यह देखना बाकी है कि आज संसद में इस विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष सरकार को किन-किन मुद्दों पर घेरने की कोशिश करता है, और क्या यह विधेयक बिना किसी बड़े विरोध के आज ही पारित हो पाता है या नहीं।

 

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