चुनाव आयोग के फैसलों पर उठे सवाल, SIR पर जल्द सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इस मामले में एक और जनहित याचिका दाखिल कर दी गई है। याचिका में मांग की गई है कि, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड की जांच विशेष जांच दल यानी एसआईटी से कराई जाये। इसी बीच शीर्ष अदालत ने SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) से जुड़े मामले को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर रजामंदी दे दी है।

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क्या है नई याचिका में

यह याचिका राकेश कुमार सिंह उर्फ राकेश सिंह ने दाखिल की है। यह उन दो अवमानना याचिकाओं से अलग है, जो इस विवाद में पहले से अदालत के सामने हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि,  मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना भारत निर्वाचन आयोग के नाम पर कई फैसले लिए।

Gyanesh Kumar

याचिकाकर्ता के मुताबिक, आयोग तीन सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था है, जिसके फैसले सर्वसम्मति से होने चाहिए। मतभेद की स्थिति में बहुमत के फैसले का पालन होना चाहिए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि, बहु-सदस्यीय संस्था के रूप में आयोग को मिली शक्तियों का इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के अधिनियम की धारा 18 में तय सामूहिक निर्णय की प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया।

याचिका में लगे ये आरोप

याचिका में कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें सत्ता के लगातार केंद्रीकरण की बात कही गई है। आरोप है कि, एजेंडा और बैठकों के कार्यवृत्त में देरी हुई या वे तैयार ही नहीं किए गए। मतदाता सूची की प्रक्रियाओं में बदलाव किए गए और दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना अपीलें दायर की गईं।

ये आरोप भी हैं याचिका में

  • कानूनी रूप से जरूरी ‘फॉर्म 6’ में एकतरफा बदलाव किया गया।
  • ECINet के जरिए मतदाता सूची के डेटा और IT नियंत्रण का केंद्रीकरण किया गया।
  • निर्वाचन पंजीयन अधिकारियों (ERO) की पहुंच पर पाबंदियां लगाई गईं।
  • पश्चिम बंगाल में दोनों आयुक्तों को सूचित किए बिना आयोग के नाम पर 16.10 लाख अपीलें दायर की गईं।
  • याचिका के अनुसार ये आरोप उन लिखित आपत्तियों और असहमतियों पर आधारित हैं, जो कथित तौर पर नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 मौकों पर संधू और जोशी ने दर्ज कराई थीं।

कौन-कौन से रिकॉर्ड मांगे गए

याचिकाकर्ता ने आयोग के मूल रिकॉर्ड अदालत में पेश करने की मांग की है। इनमें बैठकों के मिनट्स, एजेंडा, मंजूरियां, फाइल नोटिंग और IT-एक्सेस रिकॉर्ड शामिल हैं। साथ ही मतदाता सूची, फॉर्म-6, ERONet/ECINet और पश्चिम बंगाल के ट्रिब्यूनल के सामने अपील से जुड़े ऑडिट भी मांगे गए हैं।

कोर्ट से क्या राहत मांगी गई

याचिका में कई राहतों की मांग की गई है

  • आयोग की मंजूरी के बिना लिए गए कथित फैसलों को रद्द किया जाए।
  • फॉर्म-6 में जुलाई 2026 में किए गए बदलाव और कुछ अन्य कार्रवाइयों को निरस्त किया जाए।
  • कानूनी फॉर्म-6 और मतदाता सूची तक विकेंद्रीकृत पहुंच बहाल की जाए।
  • ECINet/ERONet के रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं और उनकी फोरेंसिक जांच कराई जाए।
  • फॉर्म-6 में आगे और बदलावों पर रोक लगे।
  • रिकॉर्ड में अगर बिना अनुमति के फैसले लेने का खुलासा हो, तो स्वतंत्र न्यायिक जांच या SIT का गठन हो।
  • याचिका में यह निर्देश देने की भी मांग है कि कार्रवाई लंबित रहने तक मुख्य चुनाव आयुक्त को कामकाज से रोका जाए।
  • याचिकाकर्ता ने कोर्ट के समक्ष ये भी गुहार लगाई है कि, आयोग की संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल बहु-सदस्यीय संस्था ही करे।
  • आयोग के सभी संचार, आदेश, निर्देश और अपीलें धारा 18 के तहत सर्वसम्मति या बहुमत से लिए गए फैसलों के आधार पर ही जारी हों।

आयोग का पक्ष

इन आरोपों पर चुनाव आयोग का कहना है कि, आंतरिक नोट और मतभेद उसके कामकाज का हिस्सा हैं। यानी आयोग के भीतर अलग-अलग राय का होना अपने आप में गलत नहीं है। इस मामले में अदालत के सामने आयोग का विस्तृत पक्ष आना अभी बाकी है।

SIR मामले में जल्द सुनवाई को SC तैयार

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने SIR से जुड़े मामले को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के सामने मामले का उल्लेख किया और तत्काल सुनवाई की मांग की।

विकास सिंह ने आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि, अगर आयोग ने सर्वसम्मति से फैसला नहीं लिया, तो यह गंभीर मुद्दा है। उन्होंने दलील दी कि बहु-सदस्यीय आयोग बनाने का उद्देश्य ही यह था कि फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से हों। कानून में भी इसका प्रावधान है।

उन्होंने कहा कि आयोग ने जिस तरह काम किया है, उससे यह गंभीर संदेह पैदा होता है कि SIR की पूरी प्रक्रिया पर आयोग का कोई फैसला था भी या नहीं। विकास सिंह ने यह भी याद दिलाया कि अदालत ने भी इस आधार पर निर्णय दिया है कि यह आयोग का फैसला है। ऐसे में अगर आयोग ने सर्वसम्मति से निर्णय नहीं लिया था, तो यह गंभीर मसला है। इसी आधार पर उन्होंने मामले की तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया।

अब सुप्रीम कोर्ट पर नजर

अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है। SIR मामले की सुनवाई की तारीख तय होने के बाद यह साफ होगा कि अदालत इन आरोपों को किस तरह देखती है। नई याचिका पर अदालत रिकॉर्ड तलब करती है या नहीं, और SIT या न्यायिक जांच जैसी मांगों पर क्या रुख अपनाती है, यह भी आने वाली सुनवाइयों में तय होगा।

 

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