विदा हुआ मानसून: 13 फीसदी कम बारिश से सूखे जैसे हालात, अब सर्दियों में उम्मीद

2001 के बाद चौथी सबसे कमजोर बारिश

नई दिल्ली। देश से मानसून विदा हो चुका है, लेकिन इस बार वह किसानों और आम लोगों को निराश करके गया है। जून से सितंबर के बीच सामान्य से करीब 13 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। ये स्थिति सूखे की श्रेणी में गिनी जताई है। मौसम विभाग का कहना है कि,  2001 के बाद ये चौथी सबसे कम मानसूनी बारिश है। अब सर्दियों के मानसून से कुछ इलाकों को राहत की उम्मीद है, लेकिन पूरे देश के लिए तस्वीर एक जैसी नहीं है।

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कहां-कहां से लौटा मानसून

मौसम विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पूरी दिल्ली से मानसून की वापसी हो चुकी है। उत्तर प्रदेश और गुजरात के कुछ हिस्सों से भी बारिश का यह मौसम विदा ले चुका है। जून से सितंबर के बीच के इस दौर को दक्षिण-पश्चिम मानसून का सीजन कहा जाता है। इसी अवधि की बारिश देश की खेती, जलाशयों और पेयजल आपूर्ति के लिए सबसे अहम मानी जाती है।

13 फीसदी कम हुई बारिश

आंकड़ों पर गौर करें, तो इस बार देश में लगभग 13 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। मौसम विज्ञान की भाषा में इतनी कम बारिश होने को सूखा माना जाता है।

Monsoon

2001 के बाद से यह चौथी सबसे कम मौसमी बारिश है, जबकि 1901 से अब तक के रिकॉर्ड में यह 13वीं सबसे कम बारिश है। यानी एक सदी से अधिक के इतिहास में भी यह साल कमजोर मानसून वाले वर्षों में गिना जाएगा।

759.4 मिलीमीटर बारिश हुई रिकॉर्ड

आईएमडी के अनुसार, जून से सितंबर के बीच देश में दीर्घावधि औसत (एलपीए) की 87.4 फीसदी बारिश हुई। एलपीए वह पैमाना है, जिसके आधार पर हर साल की बारिश को सामान्य, कम या अधिक आंका जाता है। इस मानसून में कुल 759.4 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जबकि सामान्य तौर पर इस अवधि में 868.6 मिलीमीटर पानी बरसता है। दोनों आंकड़ों का अंतर साफ तौर पर बताता है कि बादल इस बार अपने सामान्य हिसाब से पीछे रह गए।

पूर्वानुमान से भी कम हुई बारिश

मौसम विभाग ने इस साल मानसून को लेकर जो अनुमान जताए थे, हकीकत में उससे कम बारिश दर्ज की गई। विभाग ने 13 अप्रैल को अपने पूर्वानुमान में एलपीए की 92 फीसदी बारिश की संभावना जताई थी। इसके बाद 29 मई को जारी संशोधित अनुमान में यह आंकड़ा घटाकर 90 फीसदी किया गया, जिसमें चार फीसदी की मॉडल त्रुटि की गुंजाइश रखी गई थी। अंतिम आंकड़ा 87.4 फीसदी रहा, जो दोनों अनुमानों से नीचे है।

अल नीनो की वजह से पड़ा सूखा

आईएमडी ने अपने मासिक पूर्वानुमान में बारिश की इस कमी का एक प्रमुख कारण अल नीनो की स्थिति को बताया है। उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में जून के महीने में अल नीनो की स्थिति उभरी थी और उसके बाद से यह लगातार मजबूत होती गई। अल नीनो प्रशांत महासागर के समुद्री सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी की घटना है, जिसका असर भारतीय मानसून पर पड़ता है। विभाग का कहना है कि, फिलहाल अल नीनो की स्थिति मजबूत बनी हुई है और इसके मार्च 2027 तक बने रहने की संभावना है।

पंजाब और प्रायद्वीपीय भारत पर सबसे ज्यादा मार

गर्मियों के मानसून के दौरान पंजाब और प्रायद्वीपीय भारत को भारी बारिश की कमी का सामना करना पड़ा। इसके चलते इन इलाकों के कई जिलों में सूखे जैसे हालात देखने को मिले। कम बारिश का सीधा असर खेतों, भूजल स्तर और जलाशयों पर पड़ता है, इसलिए इन क्षेत्रों के लिए आने वाले महीनों की बारिश खास मायने रखती है।

अब उत्तर-पूर्वी मानसून से उम्मीद

मौसम विभाग का कहना है कि, इस बार सर्दियों में स्थिति कुछ बेहतर रहने की उम्मीद है। 15 से 21 अक्टूबर के बीच उत्तर-पूर्वी मानसून दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में दस्तक देगा।

Monsoon

आईएमडी ने अक्टूबर से दिसंबर की अवधि में तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा, केरल और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में ‘सामान्य’ बारिश का अनुमान जताया है। इन इलाकों के लिए यह राहत की खबर हो सकती है, लेकिन विभाग ने यह भी साफ किया है कि सर्दियों का यह मानसून केवल कुछ ही क्षेत्रों में खुशियां लेकर आएगा।

 अक्टूबर से दिसंबर के बीच बदल सकता है मौसम का मिजाज

अक्टूबर से दिसंबर के दौरान देश के बाकी हिस्सों में ‘सामान्य से कम’ बारिश की संभावना जताई गई है। हालांकि इस आम तस्वीर में कुछ अपवाद भी हैं। उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों, जिनमें पंजाब और हरियाणा के कुछ इलाके, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं, वहां सामान्य से अधिक बारिश होने की संभावना है। इसी तरह प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिणी हिस्सों में भी सामान्य से अधिक बारिश का अनुमान है। यानी मौसम का मिजाज अक्टूबर से दिसंबर के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग दिखाई देगा।

 सर्दियों में परेशान करेगी बारिश

कुल मिलाकर तस्वीर मिली-जुली है। गर्मियों के मानसून ने जहां निराश किया, वहीं सर्दियों की बारिश से कुछ इलाकों को राहत की उम्मीद बंधी है। मगर अल नीनो के मार्च 2027 तक बने रहने की आशंका को देखते हुए मौसम के मिजाज पर नजर रखना जरूरी होगा,  जिन इलाकों में इस बार सूखे जैसे हालात बने, वहां अगले कुछ महीनों की बारिश यह तय करेगी कि राहत कितनी मिलती है। फिलहाल मौसम विभाग के अनुमान उम्मीद तो जगाते हैं, पर यह उम्मीद पूरे देश के लिए एक जैसी नहीं है।

 

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