गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान, शाहबाज सरकार के सामने हैं ये तीन चुनौतियां

इस्लामाबाद। पाकिस्तान इन दिनों अपने इतिहास के सबसे गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश पर कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया है कि अर्थशास्त्री और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान लगातार चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन शहबाज शरीफ की सरकार के पास इस संकट से निकलने का कोई ठोस रास्ता अभी तक नजर नहीं आ रहा। ताजा आंकड़ों पर गौर करें, तो पाकिस्तान की केंद्र सरकार का कुल कर्ज 81.93 ट्रिलियन रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा न सिर्फ पाकिस्तान के इतिहास में सबसे ऊंचा है, बल्कि यह देश की बिगड़ती आर्थिक सेहत की भी कहानी बयां कर रहा है।

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 रोजमर्रा की जरूरत के लिए कर्ज

पाकिस्तान के वित्तीय आंकड़े जितने डरावने हैं, उतनी ही तेजी से ये बढ़ भी रहे हैं। महज अप्रैल 2025 के एक महीने में पाकिस्तान की केंद्र सरकार ने 1.4 ट्रिलियन रुपए का अतिरिक्त कर्ज लिया। यानी महज 30 दिनों में देश के कर्ज में इतनी बड़ी रकम जुड़ गई जो कई छोटे देशों के पूरे सालाना बजट से भी ज्यादा है।

Pakistan faces economic devastation

एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह बढ़ोतरी घरेलू और विदेशी दोनों स्रोतों से हुई है। घरेलू मोर्चे पर सरकार ने देश के भीतर से ही भारी मात्रा में कर्ज उठाया है, जबकि विदेशी स्तर पर भी नए कर्ज लिए गए। इससे साफ होता है कि, पाकिस्तान सरकार को अपने रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए भी कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। यह स्थिति किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक संकेत होती है।

10 महीने में 4 ट्रिलियन रुपए बढ़ा कर्ज

अगर सिर्फ एक महीने के आंकड़े चौंकाने वाले लगते हैं, तो पूरे साल की तस्वीर कितनी भयावह होगी इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं। चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों में पाकिस्तान की केंद्र सरकार का कर्ज 4 ट्रिलियन रुपए से भी ज्यादा बढ़ा है।

इस कुल बढ़ोतरी में घरेलू कर्ज की हिस्सेदारी 3.6 ट्रिलियन रुपए से अधिक रही, जबकि विदेशी कर्ज में 400 बिलियन रुपए से ज्यादा की वृद्धि हुई यानी पाकिस्तान हर महीने औसतन 400 अरब रुपए से ज्यादा का नया कर्ज ले रहा है। यह आंकड़ा बताता है कि देश की आर्थिक मशीनरी कर्ज के बिना एक दिन भी नहीं चल सकती। सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह से लेकर बुनियादी सरकारी सेवाओं तक, सब कुछ उधार के पैसों से हो रहा है।

 कर्ज चुकाने के लिए ले रहा कर्ज

पाकिस्तान की असली समस्या यह नहीं है कि, उसने कर्ज लिया, बल्कि समस्या यह है कि, वह कर्ज चुकाने के लिए भी कर्ज ले रहा है। रिपोर्ट में इस खतरनाक चक्र का जिक्र किया गया है, जिसमें सरकार पुराने कर्ज की किस्तें और ब्याज चुकाने के लिए नए कर्ज ले रही है, और यह सिलसिला आज से नहीं बल्कि लंबे समय से लगातार चल रहा है।

Pakistan faces economic devastation

सरकारें आईं और गईं, लेकिन किसी ने भी इस समस्या की तरफ ध्यान नहीं दिया। किसी ने भी कर्जे लेने के सिलसिले अपर लगाम नहीं लगाई बल्कि उसने भी कर्ज में दिलचस्पी ही दिखाई। चाहे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार रही हो, पाकिस्तान मुस्लिम लीग की, या फिर इमरान खान की पीटीआई की, हर सरकार ने मौजूदा संकट से निपटने के लिए कर्ज का रास्ता चुना। नतीजा यह है कि, आज पाकिस्तान एक ऐसे आर्थिक दलदल में फंस गया है जिससे निकलना मुश्किल हो गया है।

बदहाल हो चुकी हैं बुनियादी सुविधाएं

कर्ज के बढ़ते बोझ का सबसे बड़ा नुकसान पाकिस्तान की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। जब सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा कर्ज की किस्तें और ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है, तो स्वाभाविक रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी ढांचे और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए पैसे नहीं बचते।

पाकिस्तान में पहले से ही स्कूलों की दुर्दशा, अस्पतालों में दवाओं की कमी और सड़कों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। अब जब कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी और बढ़ गई है तो इन क्षेत्रों में सुधार की उम्मीद और भी धुंधली हो गई है। आम पाकिस्तानी नागरिक महंगाई, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से पहले से ही परेशान है और कर्ज का यह बढ़ता बोझ उसकी तकलीफों को और गहरा कर रहा है।

पाकिस्तान की आर्थिक परेशानियां सिर्फ घरेलू नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हालात उसके लिए अनुकूल नहीं हैं। पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से पाकिस्तान का आयात बिल भारी हो गया है क्योंकि पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है।

विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ रहा दबाव

इससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। पहले से ही कमजोर पाकिस्तानी रुपया और डॉलर की किल्लत के बीच महंगे तेल का आयात करना पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी मार साबित हो रहा है। जब विदेशी मुद्रा भंडार घटता है तो विदेशी कर्ज चुकाना और मुश्किल हो जाता है और यह समस्या एक नए संकट को जन्म देती है।

इन मोर्चों पर करना होगा काम

विशेषज्ञों का मानना है कि, पाकिस्तान को इस संकट से निकलने के लिए तीन मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।

पहला: राजस्व बढ़ाना होगा। पाकिस्तान का टैक्स-जीडीपी अनुपात दक्षिण एशिया में सबसे कम है। देश की एक बड़ी आबादी टैक्स के दायरे से बाहर है। कृषि क्षेत्र, जो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, काफी हद तक टैक्स से मुक्त है। जब तक सरकार अपना राजस्व नहीं बढ़ाएगी, तब तक कर्ज पर निर्भरता कम नहीं होगी।

दूसरा:  सरकारी खर्चों पर कड़ा नियंत्रण जरूरी है। पाकिस्तान में सरकारी तंत्र बेहद बड़ा और खर्चीला है। फिजूल के खर्चों में कटौती किए बिना बजट घाटे को कम करना संभव नहीं है।

तीसरा: और सबसे अहम, संरचनात्मक सुधार करने होंगे। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बुनियादी कमजोरियों को दूर किए बिना ऊपरी स्तर पर किए गए बदलाव टिकाऊ नहीं होंगे। निर्यात बढ़ाना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और उद्योगों को मजबूत करना इस दिशा में जरूरी कदम हैं।

IMF की शर्तें नहीं पूरी कर पा रहा पाकिस्तान

शहबाज शरीफ की सरकार के सामने यह सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के साथ पाकिस्तान का कार्यक्रम चल रहा है, लेकिन आईएमएफ की शर्तें पूरी करना और देश की जनता को राहत देना, दोनों एक साथ साधना आसान नहीं है।

Pakistan faces economic devastation

आईएमएफ सब्सिडी कम करने और टैक्स बढ़ाने पर जोर देता है, जो पहले से महंगाई की मार झेल रही जनता के लिए और कठिन हो जाता है। 81.93 ट्रिलियन रुपए का यह कर्ज सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह पाकिस्तान के उस आर्थिक भविष्य की तस्वीर है जो अगर अभी नहीं संभाला गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए और भी भारी बोझ बन जाएगा।

 

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