
अक्सर कहा जाता है कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी, लेकिन स्वास्थ्य के मामले में यह कहावत कानों पर सबसे सटीक बैठती है। हम अक्सर छोटी-मोटी खुजली या मामूली दर्द को यह कहकर टाल देते हैं कि शायद कान में पानी चला गया होगा या ‘मैल जम गया होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कान की एक छोटी सी अनदेखी आपको ताउम्र के सन्नाटे या फिर संतुलन खोने जैसी गंभीर बीमारियों की ओर धकेल सकती है?
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विशेषज्ञों का मानना है कि कान केवल सुनने का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये हमारे मस्तिष्क की कार्यक्षमता और शरीर के संतुलन के मुख्य केंद्र हैं। कहा जा है कि, कान से जुड़े शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करना भविष्य में इलाज को न केवल जटिल बनाता है, बल्कि कई बार अपरिवर्तनीय क्षति का कारण भी बन जाता है।
कान में लगातार दर्द और भारीपन

कान में होने वाला हल्का दर्द या भारीपन अक्सर किसी बड़े आने वाले खतरे का संकेत होता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि, अगर आपको कान बंद होने जैसा महसूस हो रहा है या हल्का लेकिन लगातार खिंचाव वाला दर्द है, तो इसे मामूली समझने की गलती न करें। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जैसे कि…
- मैल का जमना: ज्यादा मैल जमा होने से सुनने में दिक्कत और दबाव महसूस होता है।
- संक्रमण: फंगल या बैक्टीरियल संक्रमण, जो नमी के कारण तेजी से पनपते हैं।
- मिडल ईयर इंफेक्शन: यह कान के मध्य भाग में सूजन या तरल पदार्थ भरने के कारण होता है।
- डायबिटीज के मरीजों को चेतावनी
मधुमेह से जूझ रहे लोगों के लिए कान का संक्रमण जानलेवा भी हो सकता है। ऐसे मरीजों में ‘मैलिग्नेंट ओटिटिस एक्सटर्ना’ नामक गंभीर बीमारी का खतरा रहता है। यह एक ऐसा संक्रमण है जो कान की नली से शुरू होकर सिर की हड्डियों तक फैल सकता है।
सुनने की क्षमता में बदलाव
सुनने की शक्ति का अचानक या धीरे-धीरे कम होना एक अलार्म की तरह है। यदि आपको निम्नलिखित स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, तो तुरंत हियरिंग टेस्ट कराएं।
- लोगों से बात दोहराने के लिए कहना।
- टीवी या मोबाइल की आवाज सामान्य से अधिक रखना।
- भीड़भाड़ वाली जगह पर बातचीत समझने में कठिनाई होना।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि, बुजुर्गों को साल में कम से कम एक बार कान की जांच जरूर करानी चाहिए। हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी और डायबिटीज जैसी बीमारियां सीधे तौर पर सुनने की नसों को प्रभावित करती हैं। कई बार कान के पर्दे में छेद या मध्य कान में पानी भरने के कारण भी यह समस्या होती है, जिसे समय रहते सर्जरी या दवाओं से ठीक किया जा सकता है।
टिनिटस
क्या आपको कभी ऐसा महसूस होता है कि आपके कानों में कोई सीटी बज रही है या भनभनाहट हो रही है, जबकि बाहर सब शांत है? चिकित्सा विज्ञान में इसे ‘टिनिटस कहा जाता है। यह समस्या इनर ईयर की गड़बड़ी, नसों के नुकसान या लंबे समय तक तेज शोर के संपर्क में रहने से होती है। कभी-कभी यह उच्च रक्तचाप या रक्त संचार की समस्याओं का भी संकेत होता है। टिनिटस को नजरअंदाज करने से एकाग्रता में कमी और अनिद्रा जैसी मानसिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
संतुलन का बिगड़ना और चक्कर आना
कई लोग सिर घूमने या चक्कर आने को कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन इसका सीधा संबंध आपके कान के अंदरूनी हिस्से से हो सकता है। हमारा इनर ईयर शरीर का संतुलन बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होता है।
वेस्टिब्युलर न्यूराइटिस
- बिनाइन पैरोक्सिस्मल पोजीशनल वर्टिगो: सिर हिलाने पर अचानक तेज चक्कर आना।
- लैबिरिन्थाइटिस: कान के अंदरूनी हिस्से में संक्रमण, जिससे मतली और चक्कर आते हैं।
- यदि आपको अचानक संतुलन बिगड़ने का अहसास हो, तो यह वर्टिगो की समस्या हो सकती है जिसका इलाज ईएनटी विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।
कान से स्राव और बाहरी वस्तुएं

कान से पानी, पस या बदबूदार गंदगी आना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कान के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है। यह कान के पर्दे में संक्रमण या छेद की निशानी हो सकती है।
इसके अलावा, बच्चों के मामले में स्थिति और भी संवेदनशील हो जाती है। बच्चे अक्सर खेलते समय कान में छोटी मोती, दाल के दाने या खिलौने के टुकड़े डाल लेते हैं। हेल्थ चिकित्सक सख्त हिदायत देते हैं कि, घर पर इसे निकालने की कोशिश बिल्कुल न करें। चिमटी या पिन के इस्तेमाल से वह वस्तु और अंदर जा सकती है या पर्दा फट सकता है।
कैसे करें बचाव
- न करें बड्स का इस्तेमाल: कान अपने आप साफ होने की क्षमता रखते हैं। बड्स या नुकीली चीजें कान के पर्दे को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
- शोर से दूरी: हेडफोन का इस्तेमाल कम करें और ’60/60 नियम’ अपनाएं यानी 60% वॉल्यूम पर अधिकतम 60 मिनट।
- नियमित जांच: विशेष रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोग और डायबिटीज के मरीज नियमित जांच कराएं।
- स्वयं चिकित्सा से बचें: बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी तेल या ड्रॉप कान में न डालें।
कानों की समस्या केवल सुनने तक सीमित नहीं है। यह आपके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। एक छोटा सा टेस्ट और समय पर लिया गया परामर्श आपको बहरेपन और गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से बचा सकता है।
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