KGMU में कैंसर दवाओं के घोटाले की जांच का दायरा बढ़ा, ये विभाग को आए रडार पर

लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के यूरोलॉजी विभाग में कैंसर की महंगी दवाओं से जुड़े कथित घोटाले के मामले ने विश्वविद्यालय प्रशासन को हिला दिया है। इस मामले के सामने आने के बाद प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए जांच का दायरा काफी बढ़ा दिया है। अब जांच केवल यूरोलॉजी विभाग तक सीमित नहीं रहा गई है, बल्कि कैंसर मरीजों के इलाज से जुड़े कुल सात विभागों में दवाओं की खरीद, वितरण और मरीजों के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।

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पूरी हुई तीन विभागों की जां

विश्वविद्यालय प्रशासन ने ये कदम पारदर्शिता सुनिश्चित करने और सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से उठाया है। रिपोर्ट है कि, जांच के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी गठित की है। इस कमेटी ने अब तक तीन प्रमुख विभागों जनरल सर्जरी, गैस्ट्रो सर्जरी और रेडियोथेरेपी की जांच लगभग पूरी कर ली है। कमेटी के सदस्य इन विभागों से संबंधित दस्तावेजों, रिकॉर्ड और मरीजों की जानकारी का गहन अध्ययन कर रहे हैं।

KGMU

सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, कमेटी की रिपोर्ट बुधवार शाम तक कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद को सौंप दी जाएगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। बाकी विभागों की जांच भी शीघ्र पूरी करने की तैयारी चल रही है।

 कैसर मरीजों का ब्यौरा मांगा

कमेटी ने इन तीनों विभागों से कैंसर मरीजों का पूरा ब्यौरा मांगा था। इसमें असाध्य रोग योजना समेत राज्य सरकार की अन्य स्वास्थ्य योजनाओं समेत केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत पंजीकृत मरीजों की विस्तृत जानकारी शामिल है। जांच टीम विशेष रूप से उन मरीजों के रिकॉर्ड को खंगाल रही है जिन्हें पांच हजार रुपये से अधिक कीमत वाली कैंसर की दवाएं दी गई थीं।

टीम UHID नंबर, इलाज से जुड़े सभी दस्तावेज, दवाओं की खरीदारी के बिल, स्टॉक रजिस्टर और उपयोग संबंधी जानकारी का मिलान कर रही है। यह जांच सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है कि, अस्पताल में उपलब्ध मुफ्त या सस्ती दवाओं के बजाय मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं क्यों लिखी गईं। साथ ही, योजना के तहत कितनी दवाएं मंगाई गईं, कितनी वास्तव में मरीजों को दी गईं और कितनी दवाओं का दुरुपयोग हुआ इन सभी पहलुओं पर गौर किया जा रहा है।

मरीजों से संपर्क किया

जांच को और अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए टीम ने कुछ मरीजों या उनके परिजनों से फोन पर संपर्क भी किया। उनसे पूछा गया कि, उन्हें कौन-कौन सी दवाएं दी गईं, इलाज की पूरी प्रक्रिया कैसी रही, कैंसर का इलाज शुरू करने से पहले कौन-कौन सी जांचें कराई गईं और क्या वे अस्पताल की दवाओं से संतुष्ट थे। इस पूछताछ का मुख्य मकसद यह पता लगाना है कि, सरकारी योजनाओं के तहत उपलब्ध सुविधाओं का सही और पारदर्शी तरीके से उपयोग हुआ या नहीं। कई मामलों में यह भी देखा जा रहा है कि, क्या दवाओं की खरीद और वितरण में कोई अनियमितता बरती गई।

यूरोलॉजी विभाग से खुला था मामला

मामला यूरोलॉजी विभाग से शुरू हुआ था, जहां कैंसर की महंगी दवाओं की खरीद और उनके वितरण में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं पाई गईं। सूत्र बताते हैं कि, कुछ दवाएं बाजार मूल्य से काफी महंगी दरों पर खरीदी गईं या फिर मरीजों को दी जाने वाली दवाओं की मात्रा और वास्तविक उपयोग में अंतर पाया गया। इस खुलासे के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने तुरंत संज्ञान लिया और पूरे कैंसर इलाज तंत्र की जांच का फैसला किया।

कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए दवाएं जीवन रक्षक होती हैं। इनकी उपलब्धता और सही वितरण सीधे मरीजों की जान से जुड़ा मुद्दा है। यदि सरकारी योजनाओं के तहत आवंटित धन का दुरुपयोग होता है तो न केवल मरीजों को नुकसान पहुंचता है बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल उठते हैं। केजीएमयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में इस तरह की घटना बेहद गंभीर मानी जा रही है।

 इन सवालों के जवाब ढूढ़ रही कमेटी

  • क्या मरीजों को अस्पताल स्टोर में उपलब्ध दवाओं के बजाय बाहर से महंगी दवाएं प्रेस्क्राइब की गईं?
  • सरकारी योजनाओं के तहत मंगाई गई दवाओं का सही हिसाब-किताब रखा गया या नहीं?
  • क्या कुछ दवाओं की खरीद में ओवर-इनवॉइसिंग या फर्जी बिलिंग की गई?
  • मरीजों के UHID रिकॉर्ड और वास्तविक इलाज में कितना अंतर है?

इन सभी पहलुओं की जांच के बाद अगर कोई अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों और चिकित्सकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। विश्वविद्यालय प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि तीन विभागों की जांच लगभग पूरी हो चुकी है। रिपोर्ट कुलपति को सौंपे जाने के बाद शेष विभागों मेडिकल ऑन्कोलॉजी, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, न्यूक्लियर मेडिसिन आदि की जांच भी तेजी से पूरी की जाएगी।

खरीद प्राक्रिया को पारदर्शी बनाने की जरूरत

यह जांच केवल एक घोटाले तक सीमित नहीं है। यह केजीएमयू जैसे बड़े मेडिकल विश्वविद्यालय में स्वास्थ्य सेवाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और मरीज-केंद्रित व्यवस्था को मजबूत करने का अवसर भी है। लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में केजीएमयू कैंसर मरीजों के लिए प्रमुख केंद्र है। यहां रोज सैकड़ों मरीज इलाज के लिए आते हैं। यदि दवाओं में अनियमितता है तो गरीब और मध्यम वर्ग के मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे महंगी दवाएं खरीदने में असमर्थ होते हैं। प्रशासन को इस जांच के बाद लंबे समय के लिए कुछ सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए।

KGMU

जैसे दवाओं की खरीद प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाना, स्टॉक मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर लागू करना, मरीजों को दी जाने वाली दवाओं का रियल-टाइम ट्रैकिंग सिस्टम विकसित करना और नियमित ऑडिट सुनिश्चित करना। मरीजों के हितों की रक्षा करना किसी भी स्वास्थ्य संस्थान की प्राथमिक जिम्मेदारी है। केजीएमयू प्रशासन द्वारा शुरू की गई यह व्यापक जांच उम्मीद जगाती है कि दोषियों पर कार्रवाई होगी और भविष्य में ऐसे घोटाले दोहराए नहीं जाएंगे।

कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद के नेतृत्व में विश्वविद्यालय इस चुनौती का सामना कर रहा है और पूरे मामले को जल्द से जल्द निपटाने का प्रयास कर रहा है।

 

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