ईरान-यूएस डील तो हो गई, लेकिन होर्मुज पर शांति कब तक रहेगी? बड़ा सवाल

वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चली आ रही दुश्मनी को समाप्त करने की दिशा में हुए समझौते की घोषणा ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उनके जन्मदिन पर एक बड़ा राजनीतिक और कूटनीतिक तोहफा दिया है। हालांकि, यह समझौता अभी भी कई अनिश्चितताओं और संदेहों से घिरा हुआ है, जिससे इसकी सफलता और दीर्घकालिक स्थिरता पर सवालिया निशान लगे हुए हैं। समझौते की घोषणा करते हुए ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में कहा कि, होर्मुज़ स्ट्रेट अब कमर्शियल जहाजों के लिए पूरी तरह खुल जाएगा और अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगा।

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ट्रंप ने लिखा- तेल को बहने दो…

उन्होंने रविवार को सोशल ट्रुथ पर लिखा, तेल को निर्बाध बहने दो!” इस वाक्यांश के जरिए उन्होंने वैश्विक ऊर्जा बाजार में सामान्य स्थिति बहाल करने का संकेत दिया। ट्रंप ने दावा किया कि, पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों की नाकामियों के विपरीत उन्होंने एक ‘बेहतरीन समझौता’ हासिल किया है, जो पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में शांति और सुरक्षा स्थापित करेगा।

Donald Trump - Mojtaba Khamenei

आपको बता दें कि, ट्रंप की यह शैली नई नहीं है। वे अक्सर बड़े-बड़े दावे करते हैं। पिछले साल गाजा युद्ध समाप्त करने वाले समझौते के समय भी उन्होंने हमेशा के लिए शांति और ईमान, उम्मीद तथा ईश्वरीय शुरुआत जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था, लेकिन जमीनी हकीकत उन दावों से काफी अलग रही। ऐसे में इस नए समझौते पर भी संदेह स्वाभाविक है।

कूटनीतिक समझौतों की सफलता या असफलता अक्सर बारीक शर्तों, क्रियान्वयन तंत्र और पार्टियों की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। फिलहाल इन ब्योरों की उपलब्धता बेहद सीमित है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा, यह समझौता मध्य पूर्व की बुनियादी संरचना को अगले 50 सालों तक बदल सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि, समझौते में स्पष्ट रूप से शामिल है कि, ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा और अमेरिका इसके पालन की निगरानी और पुष्टि कर सकेगा।

ईरान ने जारी किया बयान

वेंस का यह बयान अमेरिकी प्रशासन की आत्मविश्वासपूर्ण स्थिति को दर्शाता है, लेकिन विशेषज्ञ इसे अत्यधिक आशावादी मानते हैं।समझौते के कई महत्वपूर्ण पहलू अभी आगे की बातचीत और मौजूदा युद्धविराम को 60 दिन बढ़ाने की अवधि के दौरान होने वाली तकनीकी वार्ताओं में तय किए जाएंगे।

दशकों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने के प्रयासों से एक बात साफ हुई है कि किसी भी समझौते में पूर्ण गारंटी नहीं होती। चाहे अमेरिका इस समझौता ज्ञापन  पर कितना भी भरोसा जताए, ईरान की प्रतिबद्धताओं की व्याख्या और क्रियान्वयन हमेशा विवादास्पद रहा है।

ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने रविवार को एक बयान जारी कर साफ किया कि, अंतिम बातचीत को तब तक टाल दिया जाएगा, जब तक समझौता ज्ञापन के तहत दूसरे पक्ष की प्रतिबद्धताएं पूरी तरह लागू नहीं हो जातीं। ईरान इन प्रतिबद्धताओं की क्या व्याख्या करता है, यह इस समझौते के भविष्य को तय करेगा। यदि दोनों पक्षों के बीच व्याख्या में बड़ा अंतर रहा, तो समझौता जल्दी ही टूट सकता है। ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि, होर्मुज़ स्ट्रेट से तेल की आवाजाही युद्ध से पहले के सामान्य स्तर पर तुरंत नहीं लौट पाएगी।

टूट भी सकता है संघर्ष?

बड़ी संख्या में फंसे तेल टैंकरों को निकालना, संभावित बारूदी सुरंगों को साफ करना और तेल उत्पादन तथा आपूर्ति श्रृंखला को बहाल करना कई सप्ताहों का काम है। आधिकारिक हस्ताक्षर अभी कई दिन दूर हैं। इस बीच दोनों देशों के पास महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बनाने का समय है, लेकिन टूटने का खतरा भी पूरी तरह से मिटा नहीं है।

यह संघर्ष शुरू से ही तीन पक्षों वाला रहा है। ट्रंप ने वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए इंटरव्यू में माना कि, वे इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बेहद नाराज थे। इस सप्ताहांत लेबनान में इजरायल द्वारा किए गए हमले को ट्रंप ने समझौते के अंतिम चरण को पटरी से उतारने वाला कदम बताया। उनका मानना था कि, इस कदम से ईरान समझौते से पीछे हट सकता था।

Donald Trump - Mojtaba Khamenei

खैर समझौता सफल हुआ और उसकी सार्वजनिक घोषणा की जा चुकी है, लेकिन अगर इजरायल लेबनान में नए सैन्य अभियान शुरू करता है, तो ईरान फिर से होर्मुज़ स्ट्रेट बंद करने का फैसला ले सकता है, जिसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। उपराष्ट्रपति वेंस ने भी स्वीकार किया कि, इस युद्ध ने ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और आर्थिक दबाव के जरिए कई आम अमेरिकियों को परेशान किया है। उन्होंने अमेरिकी जनता के लिए संदेश दिया, धन्यवाद और वादा किया कि ईंधन की कीमतें जल्द ही कम होना शुरू हो जाएंगी। तेल की कीमतों में गिरावट की गति और उससे मिलने वाली राहत की मात्रा नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले रिपब्लिकन पार्टी पर बढ़ते दबाव को तय करेगी।

ट्रंप के सामने कई चुनौतियां

हालिया पोल्स के अनुसार, ट्रंप और उनकी पार्टी को जनता की बढ़ती नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। यूगोव सर्वे में पाया गया कि 63 प्रतिशत अमेरिकी अर्थव्यवस्था संभालने के उनके तरीके से असंतुष्ट हैं, जबकि 57 प्रतिशत का मानना है कि अर्थव्यवस्था और बिगड़ रही है। इस समझौते से उत्पन्न कुछ आर्थिक दबाव कम जरूर हो सकता है, भले ही वह पूरी तरह समाप्त न हो। यदि पेट्रोल की कीमतें वास्तव में गिरती हैं तो यह आम अमेरिकियों के लिए सकारात्मक संकेत होगा कि हालात सुधर रहे हैं। यह जंग शुरू होने से पहले की स्थिति की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।

ट्रंप के बड़े लक्ष्य अभी पूरे नहीं हुए हैं। घरेलू मोर्चे पर उन्हें अभी भी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। फिर भी, यह घोषणा उनके लिए जन्मदिन का एक यादगार उपहार साबित हुई है। अब देखना यह है कि, यह समझौता कागजी घोषणा बनकर रह जाता है या वास्तविक शांति और आर्थिक स्थिरता ला पाता है। दोनों पक्षों की सद्भावना, सख्त निगरानी तंत्र और क्षेत्रीय अन्य शक्तियों के सहयोग पर इसकी सफलता निर्भर करेगी।

 

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