
रियाद। दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में भारत के लिए एक नया और चिंताजनक मोड़ सामने आता हुआ दिखाई दे रहा है। एक रिपोर्ट में तुर्की के मीडिया प्रतिष्ठानों के हवाले से यह दावा किया गया है कि, बांग्लादेश को भी तथाकथित ‘इस्लामिक नाटो’ गठबंधन में शामिल करने की प्लानिंग की जा रही है। अगर यह आशंका सच साबित होती है, तो यह नई दिल्ली को चिंता करने की जरूरत है। इसी बीच ढाका में सऊदी अरब के राजदूत ने बांग्लादेश के शीर्ष नेतृत्व तारिक रहमान से मुलाकात की है और उन्हें सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की ओर से सऊदी अरब आने का औपचारिक निमंत्रण सौंपा है।
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क्या है बड़ा सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि, क्या सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान का गुट मिलकर बांग्लादेश को अपने साथ जोड़ने और उसे ‘इस्लामिक नाटो’ में शामिल करने की रणनीति पर काम कर रहा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि, अगर बांग्लादेश वाकई इस धड़े की तरफ झुकता है, तो इसका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र और रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसके साथ ही बंगाल की खाड़ी में भारत के हितों को लेकर भी गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
गौरतलब है कि, चीन पहले से ही इस पूरे क्षेत्र में अपनी उपस्थिति और प्रभाव बढ़ाने में जुटा हुआ है। ऐसे में यदि बांग्लादेश तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों को बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में सक्रिय होने का अवसर देता है, तो यह भारत की सुरक्षा के लिहाज से एक गंभीर खतरा साबित हो सकता है।
अभी नहीं हुई अधिकारिक पुष्टि
हालांकि, इस पूरे मामले में एक मह त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि, तुर्की के अखबार के इस कथित दावे को छोड़ दिया जाए, तो आधिकारिक स्तर पर अब तक तुर्की सरकार की तरफ से बांग्लादेश को लेकर कोई सीधा बयान या पुष्टि नहीं की गई है। सऊदी अरब की तरफ से तारिक रहमान को निमंत्रण मिलना एक तथ्य जरूर है, लेकिन इस निमंत्रण के पीछे की असल वजह क्या है, इस पर अभी कोई निश्चित राय नहीं बनाई जा सकती।
विशेषज्ञों के अनुसार तुर्की के जिस अखबार ने यह दावा प्रकाशित किया है, उसकी विश्वसनीयता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं, क्योंकि ‘येनी शफाक’ नामक यह प्रकाशन भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए पहले से ही कुख्यात रहा है।
रिपोर्ट पर संदेह
इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर संदेह इसलिए भी गहराता है, क्योंकि इस लेख को लिखने वाले पत्रकार का नाम कहीं उजागर नहीं किया गया है। साथ ही रिपोर्ट में भारत के खिलाफ काफी आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते हुए यह दावा किया गया है कि, भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंध इस कदर बिगड़ चुके हैं कि बांग्लादेश अब तुर्की को एक वैकल्पिक साझेदार के रूप में देख सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि, यह पूरा नैरेटिव तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगान की उस महत्वाकांक्षा से मेल खाता है, जिसके तहत वे बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में तुर्की का प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं।
गौरतलब है कि ‘येनी शफाक’ कोई सामान्य तुर्की प्रकाशन नहीं है, बल्कि यह एक इस्लामिस्ट पब्लिकेशन है, जो तुर्की की मौजूदा सत्ताधारी सरकार के काफी करीब माना जाता है। हाल के दिनों में इस प्रकाशन की एक खास प्रवृत्ति रही है कि यह भारत से जुड़ी छोटी-मोटी घटनाओं को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, ताकि भारत की छवि को कमजोर करने का मौका न छूटे। यह अपने इस्लामिक एजेंडे को आगे बढ़ाने और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम करता रहा है।
सऊदी-बांग्लादेश के मजबूत रक्षा संबंध
अगर सऊदी अरब और बांग्लादेश के आपसी रिश्तों की बात करें, तो दोनों देशों के बीच लंबे समय से मजबूत संबंध रहे हैं। इन संबंधों का दायरा संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा सहयोग और आतंकवाद विरोधी अभियानों तक फैला हुआ है। हालांकि, इस बात पर गौर करना जरूरी है कि, न तो सऊदी अरब और न ही बांग्लादेश ने कभी इस साझेदारी को भारत के लिए खतरे के रूप में पेश किया है।
बताया जा रहा है कि, अगस्त 2026 में बांग्लादेश आधिकारिक तौर पर सऊदी अरब के नेतृत्व वाले 14 देशों के एक बहुराष्ट्रीय समुद्री रक्षा गठबंधन में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल हुआ है। ऐसे में यह कहना फिलहाल मुश्किल है कि, सऊदी अरब की पहल से बांग्लादेश वाकई ‘इस्लामिक नाटो’ का हिस्सा बनेगा या नहीं।
इसके अलावा यह भी सामने आया है कि, सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने हाल ही में अगस्त महीने में मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। रिपोर्टों के अनुसार तुर्की इस गठबंधन में सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने के प्रयासों में जुटा हुआ है, ताकि वह अपने वैश्विक प्रभाव का विस्तार कर सके। तुर्की के राष्ट्रपति की ओर से मिस्र को भी इस गठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया है। हालांकि, इससे पहले भी मिस्र को मनाने की कोशिशें हो चुकी हैं, जिन्हें मिस्र की ओर से नकार दिया गया था।
मजबूत हैं भारत-सऊदी के संबंध
विश्लेषकों का मानना है कि, सऊदी अरब के नजरिए से देखा जाए तो उसके भारत के साथ काफी मजबूत और सौहार्दपूर्ण संबंध हैं, इसलिए फिलहाल ऐसी कोई संभावना नहीं दिखती कि सऊदी अरब नई दिल्ली के लिए किसी तरह का खतरा बनना चाहेगा। हालांकि तुर्की को लेकर यह स्पष्ट है कि वह भारत के हितों के अनुकूल रुख नहीं रखता।

एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की की मौजूदा सरकार की विचारधारा मूल रूप से ‘पॉलिटिकल इस्लाम’ के सिद्धांतों पर आधारित है। यही वजह है कि, तुर्की दुनियाभर के विभिन्न इस्लामी संगठनों और समूहों का एक भरोसेमंद सहयोगी बनकर उभरा है, चाहे वह सोमालिया हो या गाजा।
दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखें तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में सक्रिय ‘जमात-ए-इस्लामी’ जैसे संगठनों के साथ भी तुर्की के करीबी संबंध माने जाते हैं। हालांकि अपनी सदियों पुरानी शाही और सूफी विरासत तथा यूरोप से भौगोलिक व सांस्कृतिक नजदीकी के कारण तुर्की की नीतियों में एक खास तरह की सूझबूझ और संतुलन भी देखने को मिलता है।
वैचारिक पैठ बढ़ाने की कोशिश
तुर्की बेहद सतर्कता और सूझबूझ के साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में अपनी वैचारिक पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुस्लिम समुदाय में तुर्की की लोकप्रियता पहले से ही काफी अधिक रही है और तुर्की इस लोकप्रियता का इस्तेमाल मुस्लिम पहचान को मजबूत करने के साथ-साथ अपने आर्थिक बाजार और रक्षा निर्यात को भी विस्तार देने के लिए कर रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार तुर्की, बांग्लादेश को एयर डिफेंस सिस्टम और ड्रोन जैसे सैन्य उपकरण बेचने को लेकर भी बातचीत कर रहा है। ऐसे हालात में विशेषज्ञों की राय है कि, भारत को बांग्लादेश में बदलते इन घटनाक्रमों पर करीबी नजर बनाए रखने की जरूरत है, ताकि क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों को कोई नुकसान न पहुंचे।
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