
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के संभल जिले में साल 2024 में हुई हिंसा मामले में योगी सरकार एक बार फिर से एक्शन के मूड में आ गई है। राज्य सरकार ने हिंसा के मुख्य आरोपी पर एनएसए के तहत कार्रवाई की है। यह हिंसा 24 नवंबर उस वक्त हुई थी जब कोर्ट के आदेश पर जामा मस्जिद का सर्वे करने टीम पहुंची थी। इस हिंसा में कई लोगों की जान चली गई थी और पूरे इलाके में तनाव फैल गया था। अब राज्य विधानसभा के मानसून सत्र में इस मामले से जुड़ी रिपोर्ट पेश किए जाने से ठीक पहले सरकार ने हिंसा के मुख्य आरोपी मोहम्मद वारिस के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की है।
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मो. वारिस ने ली थी दो की जान
प्रशासनिक हलकों में इसे संभल हिंसा प्रकरण में सरकार की अब तक की सबसे बड़ी और निर्णायक कार्रवाइयों में से एक माना जा रहा है। पुलिस जांच में सामने आई जानकारी के मुताबिक मोहम्मद वारिस पर हिंसा के दौरान उपद्रवियों को हथियार मुहैया कराने और दो लोगों की जान लेने का गंभीर आरोप हैं। जांच एजेंसियों ने इस पूरे मामले में वारिस को मुख्य आरोपी करार दिया है।

गौरतलब है कि, वारिस से पहले भी उसके दो अन्य सहयोगियों मुल्ला अफरोज और गुलाम के खिलाफ एनएसए के तहत कार्रवाई की जा चुकी है। ये तीनों आरोपी इस समय सलाखों के पीछे हैं और मामले की जांच एजेंसियों की निगरानी में है।
जांच में यह भी सामने आया है कि, इन तीनों आरोपियों ने कथित तौर पर शारिक साठा नाम के किसी शख्स के इशारे पर हिंसा की योजना बनाई थी। पुलिस पूछताछ में मुल्ला अफरोज और गुलाम ने इस बात को स्वीकार भी किया था कि हिंसा भड़काने में शारिक साठा की सीधी भूमिका थी।
एडवाइजरी बोर्ड की सुनवाई के बाद हुई कार्रवाई
बताया जा रहा है कि, लखनऊ स्थित एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष स्थानीय जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने इस मामले में अपना पक्ष रखा था, जिसके बाद ही मोहम्मद वारिस पर एनएसए लगाने का फैसला लिया गया। इस पूरी प्रक्रिया को कानूनी रूप से मजबूत बनाने के लिए प्रशासन ने पहले सभी जरूरी औपचारिकताएं पूरी कीं।
माना जा रहा है कि, सरकार विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले इस पूरे मामले में अपनी कार्रवाई को और पुख्ता करना चाहती है, ताकि सदन में सवाल उठने पर सरकार के पास ठोस जवाब मौजूद हो। इसके अलावा, संभल हिंसा से जुड़ी एसआईटी यानी विशेष जांच दल की रिपोर्ट भी जल्द ही विधानसभा के मानसून सत्र में पटल पर रखे जाने की तैयारी है। इस रिपोर्ट में हिंसा के कारणों, जिम्मेदार लोगों और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े विस्तृत ब्यौरे शामिल होने की उम्मीद है।
कैसे पकड़े गये तीनों आरोपी
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार सबसे पहले 19 जनवरी को शारिक साठा के कथित करीबी मुल्ला अफरोज को दस अन्य उपद्रवियों के साथ गिरफ्तार किया गया था। इसके कुछ दिन बाद, 25 जनवरी को मुख्य आरोपी मोहम्मद वारिस को हिरासत में लिया गया। वहीं, तीसरे आरोपी मोहम्मद गुलाम को 20 फरवरी 2025 को संभल के रोडवेज बस अड्डे के आसपास से गिरफ्तार किया गया। पुलिस का कहना है कि हिंसा भड़काने और उसे अंजाम तक पहुंचाने में इन तीनों की सक्रिय और सीधी भूमिका रही थी।
अंतरराज्यीय अपराध नेटवर्क का जुड़ाव
जांच के दौरान एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया। पता चला कि, मुख्य साजिशकर्ता मुल्ला अफरोज सिर्फ हिंसा की साजिश में ही शामिल नहीं था, बल्कि वह एक प्रॉपर्टी डीलर के साथ भी काम करता था और साथ ही शारिक साठा के लिए भी काम करता रहा था। जांच एजेंसियों के अनुसार, शारिक साठा के इशारे पर दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र से लग्जरी गाड़ियां चोरी की जाती थीं, जिन्हें बाद में पश्चिम बंगाल, असम और यहां तक कि नेपाल तक भेजा जाता था। इससे यह संकेत मिलता है कि, यह पूरा गिरोह सिर्फ स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में फैले एक संगठित अपराध नेटवर्क से जुड़ा हुआ था।

पूछताछ के दौरान मुल्ला अफरोज ने पुलिस को यह भी बताया कि, संभल में हुई हिंसा के पीछे शारिक साठा का ही हाथ था, जो लंबे समय से पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। आरोप है कि, उसने अपने गुर्गों को हथियार मुहैया कराकर जानबूझकर हिंसा करवाई। जांच एजेंसियों के मुताबिक शारिक साठा वर्ष 2012 से दुबई में रहकर वहीं से अपने आपराधिक नेटवर्क को संचालित कर रहा था और स्थानीय स्तर पर अपने गुर्गों के जरिए योजनाओं को अंजाम दिलवाता था।
कड़ा संदेश देने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, विधानसभा सत्र से ठीक पहले इस तरह की सख्त कार्रवाई सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह संभल हिंसा मामले में अपनी कार्रवाई को मजबूती से सामने रखना चाहती है। एक तरफ जहां विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर सकता है। वहीं सरकार यह दिखाने की कोशिश में है कि, हिंसा में शामिल किसी भी आरोपी को बख्शा नहीं जाएगा। सभी आरोपियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया के तहत सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।
एनएसए जैसे कड़े कानून के इस्तेमाल को प्रशासनिक हलकों में एक स्पष्ट संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि, सरकार सांप्रदायिक हिंसा और सार्वजनिक शांति भंग करने वाली घटनाओं के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि, इस तरह की कार्रवाइयों से भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने में मदद मिल सकती है। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि जांच और कार्रवाई पूरी तरह निष्पक्ष और कानून सम्मत तरीके से हो।
दुबई में बैठा है शारिक साठा
फिलहाल तीनों आरोपी जेल में बंद हैं और मामले की जांच जारी है। शारिक साठा, जो कथित तौर पर पूरी साजिश का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, वह अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर है। माना जा रहा है कि, वह दुबई में रहकर अपने नेटवर्क का संचालन कर रहा है। ऐसे में जांच एजेंसियों के लिए उस तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
आने वाले दिनों में जब एसआईटी की रिपोर्ट विधानसभा में पेश होगी, तब इस पूरे मामले से जुड़े और भी कई तथ्य सार्वजनिक होने की उम्मीद है। तब तक के लिए प्रशासन का पूरा फोकस मामले से जुड़े सभी दोषियों को कानून के दायरे में लाने और हिंसा की जड़ तक पहुंचने पर केंद्रित है।
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