‘प्रदर्शन का मतलब लाठीचार्ज नहीं’, SC की पुलिस को दो टूक, छात्र आंदोलन केस में कल फिर होगी सुनवाई

नई दिल्ली। देशभर में पेपर लीक के विरोध में हो रहे छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादती को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई की। मामले की सुनवाई में दौरान सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि, शांतिपूर्ण तरीके से और कानून के दायरे में रहकर प्रदर्शन करना जनता का संवैधानिक अधिकार है, उन पर सिर्फ इस आधार पर लाठीचार्ज नहीं किया जा सकता कि वे सड़क पर उतर कर विरोध जता रहा है और सरकार के समझ अपनी मांग रख रहे हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि, अगर पुलिस ने कहीं भी जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया  है, तो उसकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी ही चाहिए।

इसे भी पढ़ें- अब पेपर लीक करने वालों की खैर नहीं, 10 करोड़ जुर्माना और 10 साल तक की जेल!

इन जजों की बेंच ने की सुनवाई

पेपर लीक प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुए लाठीचार्ज मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत के अलावा जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की तीन सदस्यीय पीठ ने की। जैसे ही यह मामला अदालत के समक्ष पेश किया गया। पीठ ने तत्काल शांतिपूर्ण और कानून सम्मत प्रदर्शन के अधिकार को संविधान द्वारा पूरी तरह संरक्षित बताया। पीठ ने ये भी कहा कि, केवल विरोध-प्रदर्शन करने की वजह से पुलिस लाठीचार्ज नहीं कर सकती अगर अगर कहीं ऐसा हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

Supreme Court

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि, यह मुद्दा सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में प्रदर्शनों से निपटने के लिए एक समान और स्पष्ट पुलिस प्रोटोकॉल होना अनिवार्य है। इसके साथ ही कोर्ट ने ये भी टिप्पणी की, कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुशासन बनाए रखना उतना ही जरूरी है, जितना कि प्रदर्शन का अधिकार।

घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों ने भी दी दलील

इस सुनवाई के दौरान प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों की तरफ से पेश हुए वकील को भी अदालती कार्यवाही में हिस्सा लेने की अनुमति मिली। इस मुद्दे पर जस्टिस बागची ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि, चाहे चोट किसी पुलिसकर्मी को लगी हो या किसी छात्र को, दोनों ही स्थितियां समान रूप से गंभीर और चिंताजनक हैं।

उन्होंने सवाल किया कि, प्रदर्शन जैसी परिस्थितियों से निपटने के दौरान पुलिसकर्मियों को हेलमेट जैसे बुनियादी सुरक्षा उपकरण राज्य सरकारों की तरफ से क्यों नहीं उपलब्ध कराए गए। कोर्ट ने इस पहलू पर राज्य सरकारों से जवाब तलब करने के संकेत दिए हैं। बेंच ने   फैसला लिया कि, इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं पर मंगलवार को एक साथ सुनवाई की जाएगी।

ये हुई मांग

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं में मुख्य रूप से चार बड़ी मांगें रखी गई हैं। इसमें सबसे पहले है, 20 जुलाई को दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई जैसे कि, लाठीचार्ज और धर पकड़ की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। दूसरा, किसी भी प्रदर्शन को कंट्रोल करने के लिए सादे कपड़ों में जो पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है उस पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। तीसरा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू करने के लिए स्पष्ट और सख्त दिशानिर्देश जारी किए जाएं और चौथा, पुलिस कार्रवाई को नियंत्रित करने के लिए एक व्यवस्थित तंत्र का गठन किया जाये।

पुलिस पर लगे ये आरोप

याचिकाओं में पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया गया है कि, शिक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी और  तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद की तरफ मार्च कर रहे छात्रों पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, लाठीचार्ज किया और बड़ी संख्या में छात्रों को हिरासत में लिया। याचिकाओं में ये भी कहा गया है कि, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। सादे कपड़ों में मौजूद कुछ लोगों ने  उनके साथ मारपीट की, उनके कपड़े फाड़े। ये भी दावा किया गया है कि, इस पूरे घटनाक्रम में कम से कम 60 प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं।

मेट्रो और इंटरनेट बंद करने पर भी सवाल

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में एक और अहम मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा है कि, प्रदर्शन के दौरान मेट्रो सेवाओं को बंद करना और इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाना आम जनजीवन के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुआ। इसका असर न सिर्फ आम नागरिकों और छात्रों पर पड़ा, बल्कि मरीजों, बैंकिंग सेवाओं, टेलीमेडिसिन और वर्क फ्रॉम होम कर रहे लोगों के साथ-साथ आपातकालीन सेवाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिला।

रिटायर्ड जज की अगुवाई में जांच की मांग

याचिकाओं में यह भी मांग की गई है कि, बीएनएसएस की धारा 163 का दुरुपयोग रोकने के लिए एक स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की जाए, ताकि बिना किसी वास्तविक और निकट खतरे के बार-बार निषेधाज्ञा न लगाई जा सके। इसके साथ ही BNS की धारा 152 के इस्तेमाल पर भी सीमाएं तय की जाएं, ताकि इसका दुरुपयोग शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन, राजनीतिक असहमति या शैक्षणिक आलोचना को दबाने के लिए न किया जा सके।

इसके अलावा याचिकाओं में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले दिए गए पुलिस सुधार संबंधी निर्देशों को लागू करने और एक स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण के गठन की भी मांग की गई है। सबसे अहम मांगों में से एक यह भी है कि 20 जुलाई की घटना की गहराई से जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग या एसआईटी से कराई जाये।

साथ ही याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग रखी है कि, जिन पुलिसकर्मियों पर मारपीट और महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न में शामिल होने के आरोप हैं, उनके खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज कर उन्हें निलंबित किया जाए।

मंगलवार को  होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट के इस रुख को कानूनी और सामाजिक हलकों में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि इसमें प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर स्पष्ट रूप से जोर दिया गया है। अब सभी की निगाहें मंगलवार को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत इन तमाम याचिकाओं पर विस्तार से विचार करेगी और आगे की दिशा तय करेगी।

यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत राज्य सरकारों और दिल्ली पुलिस से किस तरह के जवाब तलब करती है, और क्या जांच के लिए किसी स्वतंत्र आयोग के गठन का रास्ता साफ होता है।

 

इसे भी पढ़ें- पीएम मोदी का ऐलान, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी पेपर लीक मामलों की जांच, जल्द होगा गठित

Related Articles

Back to top button