पाकिस्तान ने भारत को दी युद्ध की धमकी, बोला- पानी रोका, तो हाथ काट देंगे

इस्लामाबाद।  पाकिस्तान की ओर से सिंधु जल संधि को लेकर एक बार फिर भारत के खिलाफ तीखे बयान सामने आए हैं। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि अगर कोई पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश करेगा तो उसके हाथ काट दिए जाएंगे। उनका आरोप है कि भारत जानबूझकर पाकिस्तान को मिलने वाले पानी को रोकने की योजना बना रहा है।

इसे भी पढ़ें- FIH Pro League: भारत ने पाकिस्तान को 7-1 से रौंदा, एक गोल से पिछड़ने के बाद की धमाकेदार वापसी

पीएम मोदी पर साधा निशाना

सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार के साथ हुई एक संयुक्त प्रेस वार्ता में मलिक ने पड़ोसी देश यानी भारत के प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि मानो उनके हाथ में नल हो और वे चाहें तो पाकिस्तान की ओर पानी की एक बूंद भी न जाने दें।

Indus Water Treaty

उन्होंने दोहराया कि जो भी पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर दावा जताएगा, उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। वहीं तरार ने इस मौके पर स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि आज भी कानूनी रूप से प्रभावी मानी जाती है और भारत के पास इसे अकेले रद्द करने, स्थगित करने या इसमें संशोधन करने का अधिकार नहीं है।

इस्लामाबाद में होगा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार

पाकिस्तानी मंत्रियों ने जानकारी दी कि, इस मुद्दे पर इस्लामाबाद में मंगलवार को पहली बार एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जाएगा। इस आयोजन में दुनियाभर के कानूनी विशेषज्ञ, जल प्रबंधन से जुड़े जानकार और विभिन्न देशों के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। चर्चा का मुख्य केंद्र संधि के तकनीकी और कानूनी पहलू रहेंगे।

डॉन अखबार की रिपोर्ट के अनुसार तरार ने यह भी कहा कि, अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में पाकिस्तान के अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के पुराने बयानों का हवाला देते हुए दोहराया कि, पानी पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा जैसा है और इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा, यानी यह पाकिस्तान के लिए एक तरह की रेड लाइन है।

रक्षा मंत्री ने दी धमकी

इससे पहले 21 जून को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी इसी मुद्दे पर भारत को धमकी दी थी। एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल से बातचीत में आसिफ ने कहा था कि, यदि पाकिस्तान को ऐसा महसूस हुआ कि, उसकी जल सुरक्षा खतरे में है, तो वह भारत के खिलाफ युद्ध तक छेड़ सकता है।

उन्होंने भारत पर आरोप लगाया कि वह पानी के प्रवाह में जानबूझकर बाधा डाल रहा है और इसे एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि दिलचस्प बात यह रही कि, उन्होंने खुद स्वीकार किया कि, पिछले एक साल में इस मसले पर क्या नई घटनाएं हुई हैं, इसकी उन्हें पूरी जानकारी नहीं थी।

क्यों निलंबित हुईं संधि

गौरतलब है कि, अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी। इस हमले के बाद भारत ने सख्त कदम उठाते हुए 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था। भारत सरकार का स्पष्ट रुख रहा है कि, जब तक पाकिस्तान सीमा पार से होने वाले आतंकवाद पर ठोस और प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तब तक यह संधि बहाल नहीं होगी।

 क्या है सिंधु जल समझौता  

सिंधु नदी प्रणाली में कुल छह प्रमुख नदियां शामिल हैं, सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। इन नदियों के आसपास का क्षेत्र लगभग 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जिसमें से 47 प्रतिशत भूभाग पाकिस्तान में, 39 प्रतिशत भारत में, 8 प्रतिशत चीन में और शेष 6 प्रतिशत अफगानिस्तान में पड़ता है। इन चारों देशों को मिलाकर करीब 30 करोड़ लोग इन नदियों पर निर्भर इलाकों में रहते हैं।

Indus Water Treaty

इस जल बंटवारे का विवाद 1947 के बंटवारे से भी पहले का है, जब भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच नदी जल को लेकर तनाव शुरू हो गया था। बंटवारे के तुरंत बाद दोनों देशों के इंजीनियरों के बीच एक ‘स्टैंडस्टिल समझौता’ हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान को दो प्रमुख नहरों से पानी मिलता रहा। यह व्यवस्था 31 मार्च 1948 तक ही चली।

जैसे ही यह समझौता खत्म हुआ, भारत ने 1 अप्रैल 1948 को दोनों नहरों का पानी रोक दिया, जिसके चलते पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की करीब 17 लाख एकड़ कृषि भूमि पर खेती बर्बाद हो गई। बाद में हुए एक नए समझौते के तहत भारत फिर से पानी देने को तैयार हुआ।

1960 में हुई थी संधि

इसके बाद 1951 से लेकर 1960 तक विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे को लेकर लंबी बातचीत चली। अंततः 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे आज इंडस वाटर ट्रीटी या सिंधु जल संधि के नाम से जाना जाता है।

Indus Water Treaty

सिंधु जल संधि के निलंबन का पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ रहा है। पाकिस्तान की लगभग 90 प्रतिशत कृषि भूमि, यानी करीब 4.7 करोड़ एकड़ क्षेत्र, सिंचाई के लिए सिंधु नदी प्रणाली के पानी पर निर्भर है। पाकिस्तान की राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र का योगदान करीब 23 प्रतिशत है और देश की लगभग 68 प्रतिशत ग्रामीण आबादी की आजीविका इसी क्षेत्र पर टिकी है। ऐसे में पानी की किल्लत से न केवल आम लोगों की जिंदगी प्रभावित हो रही है, बल्कि पहले से संकट में चल रही पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था और भी कमजोर पड़ती जा रही है।

पाकिस्तान को नहीं मिल रहा पानी

इसके अलावा पाकिस्तान के मंगल और तारबेला जैसे बड़े हाइड्रोपावर बांधों को भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। इसका सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ रहा है, जिसमें 30 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट देखी जा सकती है। बिजली उत्पादन घटने का असर औद्योगिक उत्पादन और रोजगार के अवसरों पर भी पड़ना तय है, जिससे पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किलें आने वाले समय में और गहरी हो सकती हैं।

कुल मिलाकर, सिंधु जल संधि का निलंबन सिर्फ एक कूटनीतिक मसला नहीं रह गया है, बल्कि यह पाकिस्तान के लिए आर्थिक और सामाजिक स्तर पर एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, जबकि भारत का रुख आतंकवाद के मुद्दे पर ठोस कार्रवाई होने तक अडिग बना हुआ है।

 

इसे भी पढ़ें-  गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान, शाहबाज सरकार के सामने हैं ये तीन चुनौतियां

Related Articles

Back to top button