
आंध्र प्रदेश। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पिछली नाकामियों को पीछे छोड़ते हुए एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। शुक्रवार तड़के 2 बजकर 55 मिनट पर श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट ने उड़ान भरी और भारत के अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ईओएस-05 को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। यह प्रक्षेपण इसलिए भी खास है, क्योंकि यह जियोसिंक्रोनस कक्षा से काम करने वाला भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट है।
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27 घंटे की उलटी गिनती के बाद उड़ान
इस मिशन के लिए 27 घंटे लंबी उलटी गिनती चलाई गई थी। 51.7 मीटर ऊंचे और करीब 420.5 टन वजनी तीन चरणों वाले जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट ने श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से उड़ान भरकर लगभग 2,367 किलोग्राम वजनी ईओएस-05 सैटेलाइट को निर्धारित सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर कक्षा में सटीकता के साथ पहुंचा दिया।

यह जीएसएलवी रॉकेट की कुल 19वीं उड़ान रही। रॉकेट में एस139 सॉलिड कोर के साथ चार एल40एच लिक्विड स्ट्रैप-ऑन बूस्टर, जीएल40एचटी लिक्विड दूसरा चरण और स्वदेश निर्मित सीयूएस15 क्रायोजेनिक अपर स्टेज लगाया गया था। सैटेलाइट को लॉन्च के दौरान सुरक्षित रखने के लिए चार मीटर का कंपोजिट ओगीव पेलोड फेयरिंग भी इस्तेमाल किया गया।
प्रक्रिया में लगेगा कुछ समय
फिलहाल ईओएस-05 को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर कक्षा में स्थापित किया गया है। यहां से सैटेलाइट अपने ऑनबोर्ड थ्रस्टर्स यानी छोटे रॉकेट इंजनों की मदद से चरणबद्ध तरीके से अपनी अंतिम कक्षा तक पहुंचेगा। इस अंतिम कक्षा में सैटेलाइट की न्यूनतम ऊंचाई करीब 170 किलोमीटर, अधिकतम ऊंचाई लगभग 28,934 किलोमीटर और कक्षीय झुकाव 19.28 डिग्री होगा। इस प्रक्रिया में कुछ समय लगेगा, जिसके बाद सैटेलाइट पूरी तरह सक्रिय होकर अपना काम शुरू करेगा।
इसरो प्रमुख ने जताई खुशी
इस सफलता पर इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने संतोष जताते हुए कहा कि जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट ने एडवांस्ड अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट-05, यानी जियो-इमेजिंग स्टार सैटेलाइट को पूरी सटीकता के साथ उसकी निर्धारित कक्षा में स्थापित किया है। उन्होंने बताया कि एक बार यह सैटेलाइट पूरी तरह सक्रिय हो जाएगा, तो यह जियो कक्षा से काम करने वाला भारत का पहला समर्पित इमेजिंग सैटेलाइट बन जाएगा और देश को महत्वपूर्ण रणनीतिक आंकड़े उपलब्ध कराएगा।
जियोसिंक्रोनस कक्षा का फायदा
आमतौर पर पृथ्वी की निगरानी करने वाले सैटेलाइट लगातार धरती का चक्कर लगाते रहते हैं, जिस वजह से वे किसी एक इलाके पर स्थायी नजर नहीं रख पाते। इसके उलट जियोसिंक्रोनस कक्षा की खासियत यह है कि, सैटेलाइट धरती के एक ही बड़े हिस्से पर केंद्रित रहता है। ईओएस-05 इसी सिद्धांत पर काम करेगा और करीब 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई से भारत तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर लगातार नजर बनाए रखेगा। इससे मौसम की सटीक भविष्यवाणी, प्राकृतिक आपदाओं की समय रहते पहचान, कृषि और पर्यावरण की निगरानी के साथ-साथ सीमाओं और रणनीतिक इलाकों पर भी पैनी नजर रखी जा सकेगी।
GSLV को क्यों कहा जाता है ‘नॉटी बॉय’
जीएसएलवी रॉकेट का शुरुआती इतिहास बहुत शानदार नहीं रहा है। अपनी आरंभिक उड़ानों में इसे कई बार असफलता का सामना करना पड़ा था, पिछले 18 मिशनों में से 6 पूरी तरह कामयाब नहीं हो सके थे। इसी वजह से यह रॉकेट प्यार से ‘नॉटी बॉय’ के नाम से मशहूर हो गया। हालांकि, बीते वर्षों में इसकी तकनीक में लगातार सुधार किया गया है, और अब यह अपनी क्षमता साबित करते हुए भरोसेमंद प्रक्षेपण यान के तौर पर उभर रहा है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मिशन
फरवरी 2026 तक भारत के पास कुल 21 सक्रिय अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट मौजूद थे, लेकिन इनमें से अधिकांश निचली कक्षा या सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षा से काम कर रहे थे। जियोस्टेशनरी कक्षा से पृथ्वी की निगरानी के मामले में भारत की क्षमता अब तक इनसैट-3डी, इनसैट-3डीआर और इनसैट-3डीएस जैसे मौसम संबंधी सैटेलाइटों तक ही सीमित थी। ईओएस-05 के साथ भारत को पहली बार ऐसा इमेजिंग सैटेलाइट मिला है, जो खासतौर पर जियोसिंक्रोनस कक्षा से काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इससे देश की सुदूर संवेदन और निगरानी क्षमता को नई मजबूती मिलेगी।
2026 का दूसरा और महत्वपूर्ण मिशन
यह मिशन जुलाई 2025 के बाद इसरो का पहला जीएसएलवी प्रक्षेपण रहा। इससे पहले 30 जुलाई 2025 को जीएसएलवी-एफ16 रॉकेट ने नासा और इसरो के साझा मिशन निसार सैटेलाइट को 743 किलोमीटर ऊंची सूर्य-समकालिक कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया था। शुक्रवार का यह प्रक्षेपण वर्ष 2026 में इसरो का दूसरा ऑर्बिटल मिशन है। इससे पहले 12 जनवरी 2026 को पीएसएलवी-सी62 के जरिए ईओएस-एन1 समेत अन्य सैटेलाइट भेजे गए थे, लेकिन रॉकेट के तीसरे चरण में आई तकनीकी खामी के चलते वह मिशन पूरी तरह सफल नहीं हो पाया था।
नाकामियों के बाद जोरदार वापसी
बीते कुछ समय में इसरो को कई मिशनों में असफलता का सामना करना पड़ा था, जिससे संगठन पर दबाव बढ़ गया था। ऐसे में ईओएस-05 की सफल लॉन्चिंग को इसरो की जोरदार वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि, यह सैटेलाइट आपदा प्रबंधन और मौसम संबंधी सटीक जानकारी देने में गेमचेंजर साबित होगा। लगातार निगरानी की क्षमता के चलते बाढ़, चक्रवात और जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं का समय पर पता लगाना आसान होगा। वहीं सीमा सुरक्षा और रणनीतिक निगरानी में भी यह सैटेलाइट भारत की मदद करेगा।
ईओएस-05 के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। यह सैटेलाइट न केवल तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि देश की सुरक्षा, कृषि, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन क्षमताओं को भी नई ऊंचाई देने वाला साबित होगा।
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