
शरीर के लिए बेहद अहम माना जाने वाला विटामिन डी आमतौर पर धूप से मिलता है, लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में लोगों के पास धूप में बैठने का वक्त कम ही होता है, ऐसे में लाखों लोगों के शरीर में इसकी कमी होने लगी है। इसके अलावा बदलती जीवनशैली, घर के अंदर बीतने वाला ज्यादा समय और सही खानपान की कमी की वजह से भी विटामिन डी की कमी बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर उम्र के लोगों में देखी जा रही है। अगर इसकी कमी होती है, तो व्यक्ति को कमजोरी, हड्डियों के दर्द, मानसिक तनाव और बार-बार बीमार पड़ने जैसी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
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क्यों जरूरी है विटामिन डी
हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में कैल्शियम का अहम रोल होता है, लेकिन शरीर उस कैल्शियम को सही तरीके से सोख पाए, इसके लिए विटामिन डी होना जरूरी है। यानी सिर्फ कैल्शियम लेना काफी नहीं, उसे अवशोषित करने का काम विटामिन डी ही करता है।

इसके अलावा यह खून में कैल्शियम का संतुलन बनाए रखने और हड्डियों के लगातार निर्माण व मरम्मत में भी मदद करता है। जब त्वचा को पर्याप्त धूप नहीं मिलती या किसी मेडिकल कारण से शरीर इसे सोख नहीं पाता अथवा खानपान में इसकी मात्रा कम रहती है, तब इसकी कमी का खतरा तेजी से बढ़ता है।
विटामिन डी की कमी होने पर शरीर देता है ये संकेत
लगातार थकान और कमजोरी
सबसे पहला और सबसे आम लक्षण है ऊर्जा का स्तर अचानक गिरना। दिनभर सुस्ती और बिना किसी मेहनत के भी थकान महसूस होना।
हड्डियों और मांसपेशियों में दर्द
चूंकि कैल्शियम का अवशोषण सही ढंग से नहीं हो पाता, इसलिए हड्डियां और मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं, जिससे दर्द बढ़ता जाता है।
मूड में बदलाव
कई अध्ययन बताते हैं कि, जिन लोगों में विटामिन डी की कमी होती है, उनमें मूड स्विंग और डिप्रेशन जैसी समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती हैं।
घाव का देर से भरना
शरीर के घाव और जख्म भरने की प्रक्रिया में भी विटामिन डी का योगदान होता है। इसकी कमी में मामूली चोट भी ठीक होने में सामान्य से ज्यादा समय ले लेती है।
बार-बार संक्रमण होना
रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने लगती है, जिससे सर्दी-जुकाम और दूसरे संक्रमण बार-बार परेशान करते हैं।
बालों का तेजी से झड़ना
बालों के झड़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, मगर इनमें विटामिन डी की कमी एक प्रमुख वजह मानी जाती है।
नींद ठीक से न आना
नींद की गुणवत्ता पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। अधूरी नींद दिमाग को थका हुआ रखती है और दिनभर किसी काम में मन नहीं लगता।
बच्चों में रिकेट्स
छोटे बच्चों में यह कमी रिकेट्स नामक बीमारी की वजह बन सकती है, जिसमें हड्डियां कमजोर रहती हैं और शारीरिक विकास प्रभावित होता है।

अमेरिका के स्वास्थ्य संगठन Medlineplus के अनुसार स्तनपान करने वाले शिशुओं को भी पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिल पाता, क्योंकि मां के दूध में इसकी मात्रा सीमित होती है। ऐसे में शिशुओं को रोजाना लगभग 400 IU विटामिन डी सप्लीमेंट के रूप में देने की सलाह दी जाती है।
वयस्कों में ऑस्टियोपोरोसिस
बड़ी उम्र में यह कमी हड्डियों को भंगुर बना देती है, जिससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है और चोट लगने पर ठीक होने में भी ज्यादा वक्त लगता है।
ऐसे पूरी करें कमी
रोजाना धूप लें, सुबह की हल्की धूप विटामिन डी का सबसे प्राकृतिक स्रोत है। अगर सुबह समय न मिले तो दोपहर के समय कुछ देर धूप में बैठा जा सकता है।
खाने में ये चीजें करें शामिल
मछली
सैल्मन, ट्यूना, सार्डिन और मैकेरल जैसी मछलियां विटामिन डी से भरपूर होती हैं। हफ्ते में एक-दो बार इनका सेवन फायदेमंद रहता है।
अंडे की जर्दी
अंडे का पीला हिस्सा विटामिन डी का अच्छा स्रोत है। अगर आप अंडा खाते हैं तो डाइट में इसे जरूर शामिल करें।
मशरूम
खासकर अल्ट्रावायलेट किरणों में उगाए गए मशरूम में विटामिन डी अच्छी मात्रा में पाया जाता है।
फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ
दूध, दही, अनाज और संतरे के जूस जैसे विटामिन डी से समृद्ध किए गए खाद्य पदार्थों को रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा बनाया जा सकता है।
सप्लीमेंट केवल जरूरत पर लें

अगर धूप और भोजन के बावजूद कमी दूर नहीं हो रही, तभी डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना चाहिए। बिना सलाह के सप्लीमेंट शुरू करना नुकसानदायक हो सकता है।
नियमित व्यायाम करें
शारीरिक सक्रियता शरीर को विटामिन डी सोखने में मदद करती है, इसलिए रोजाना थोड़ा वक्त व्यायाम के लिए निकालना चाहिए।
संतुलित जीवन शैली
संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और पूरी नींद. ये तीनों मिलकर शरीर में विटामिन डी का स्तर स्वाभाविक रूप से बनाए रखने में मदद करते हैं।
ध्यान रखने वाली बात
विटामिन डी की कमी जितनी नुकसानदायक है, इसकी अधिकता भी उतनी ही हानिकारक हो सकती है, इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के सप्लीमेंट लेने से बचें। अगर कमी का शक हो तो पहले ब्लड टेस्ट करवाकर सही जानकारी लें।
किन लोगों में खतरा सबसे ज्यादा
बुजुर्ग और छोटे बच्चे
उम्र बढ़ने के साथ त्वचा की धूप से विटामिन डी बनाने की क्षमता घटती जाती है, इसलिए बुजुर्गों में यह कमी अधिक देखी जाती है। वहीं नवजात शिशुओं में भी यह आम है।
अत्यधिक वजन वाले लोग
शरीर में जरूरत से ज्यादा फैट होने पर विटामिन डी को सोखने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे मोटे व्यक्तियों में इसकी कमी ज्यादा पाई जाती है।
गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं
गर्भावस्था के दौरान विटामिन और आयरन की कमी होना आम बात है, लेकिन इसका असर मां के साथ-साथ बच्चे पर भी पड़ता है। मां में पोषण की कमी होने पर स्तनपान करने वाले शिशु को भी पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिल पाता। इसी वजह से हर गर्भवती महिला को संतुलित आहार लेने की सलाह दी जाती है।
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