बाहुबलियों के हथियार लाइसेंस पर हाईकोर्ट सख्त, राजा भैया से बृजभूषण तक सबकी होगी जांच

 प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की सियासत में जिन नामों का जिक्र आते ही माहौल गर्म हो जाता है, जिन चेहरों के इर्द-गिर्द दशकों से बाहुबल और रसूख की कहानियां बुनी जाती रही हैं, अब उन्हीं नामों की फेहरिस्त इलाहाबाद हाईकोर्ट की मेज पर रखी है। कोर्ट का सवाल सीधा और तीखा है कि, जिन लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों की लंबी कतार है, जिनकी छवि पर समाज और कानून दोनों ने सवालिया निशान लगाए हैं, उनके हाथों में लाइसेंसी हथियार कैसे और क्यों थमाए गए?

इसे भी पढ़ें- घरेलू और वैश्विक निवेशकों के लिए पसंदीदा गंतव्य बना उत्तर प्रदेश

सभी जिलों से मांगी विस्तृत रिपोर्ट 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के हथियार लाइसेंस को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य के सभी 75 जिलों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इस आदेश के बाद जहां प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है, वहीं राजनीतिक हलकों में भी बेचैनी साफ देखी जा रही है।

AllahabadHigh Court

यह मामला जय शंकर उर्फ बैरिस्टार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य से जुड़ा है और इसकी सुनवाई जस्टिस विनोद दिवाकर की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान जब सरकारी हलफनामे की परतें उघड़ीं तो जो तस्वीर सामने आई वह किसी को भी चौंकाने के लिए काफी थी। हलफनामे के मुताबिक उत्तर प्रदेश में इस वक्त 10 लाख से अधिक हथियार लाइसेंस जारी हैं, जिनमें से 6,062 ऐसे लाइसेंसधारक हैं जिन पर दो या दो से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं यानी कानून की नजर में जो अपराधी हैं, उनके पास भी कानूनी तरीके से हथियार रखने का लाइसेंस मौजूद है।

कोर्ट ने इस खुलासे पर गहरी और गंभीर चिंता जताई और साफ कहा कि राज्य में आर्म्स एक्ट और आर्म्स रूल का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है।

किन बड़े नामों पर है कोर्ट की नजर

इस मामले में जो नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं, वे उत्तर प्रदेश की राजनीति के जाने-पहचाने चेहरे हैं। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, जो कुंडा से विधायक रहे हैं और जिनका नाम यूपी की राजनीति में बाहुबल के प्रतीक के रूप में लिया जाता है, उनके बारे में कोर्ट ने अलग से पूरी जानकारी मांगी है। इसके अलावा पूर्व सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह, पूर्व सांसद धनंजय सिंह और अब्बास अंसारी के नाम भी उस सूची में शामिल हैं जिनके बारे में कोर्ट ने विस्तृत ब्यौरा मांगा है।

कोर्ट ने सरकार से चार मुख्य बिंदुओं पर जवाब तलब किया है। पहला, इन प्रभावशाली लोगों के पास कितने हथियार लाइसेंस हैं। दूसरा, उनके खिलाफ कितने आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। तीसरा, उनके परिवार के अन्य सदस्यों के पास भी लाइसेंस हैं या नहीं। और चौथा, क्या इन्हें सरकारी सुरक्षा प्रदान की गई है। ये सवाल जितने सीधे हैं, उतने ही गहरे और असुविधाजनक भी हैं।

नोएडा से वाराणसी तक, हर जोन से मांगी रिपोर्ट

कोर्ट ने सिर्फ बड़े राजनीतिक चेहरों तक अपनी जांच को सीमित नहीं रखा है। नोएडा, मेरठ, आगरा, लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर और कानपुर जोन से तमाम कथित बाहुबलियों, गैंगस्टरों और प्रभावशाली व्यक्तियों की जानकारी मांगी गई है। मदन सिंह बद्दो, हाजी याकूब कुरैशी, विजय मिश्रा, राजन तिवारी समेत दर्जनों ऐसे नाम इस सूची में हैं जिनका यूपी के अपराध जगत और राजनीतिक गलियारों से पुराना नाता रहा है।

AllahabadHigh Court

जिन लोगों के लाइसेंस दोबारा जांचे जाएंगे उनकी सूची बेहद लंबी है और इसमें अमित कसाना, सुनील राठी, यशपाल तोमर, संजीव माहेश्वरी, अजय प्रताप सिंह उर्फ अजय सिपाही, सुधाकर सिंह, लल्लू यादव, विजय मिश्रा, अब्बास अंसारी, पिंटू सिंह, सुशील सिंह और दर्जनों अन्य नाम शामिल हैं। यह सूची इस बात का आईना है कि यूपी में हथियार लाइसेंस देने की प्रक्रिया में कितनी बड़ी चूक हुई है।

गन कल्चर पर कोर्ट ने कही यह बड़ी बात

अदालत ने इस पूरे मामले को सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा बल्कि समाज पर इसके असर को लेकर भी कड़े शब्दों में अपनी राय रखी। कोर्ट ने कहा कि, हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा करता है। तथाकथित गन कल्चर एक कानून-आधारित और शांतिपूर्ण समाज के लिए किसी भी तरह से अनुकूल नहीं है। यह टिप्पणी उस व्यापक सामाजिक समस्या की तरफ इशारा करती है, जहां हथियार रखना ताकत और रुतबे का प्रतीक बन गया है।

इससे भी गंभीर बात यह है कि, कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि, कुछ मामलों में पुलिस और प्रशासन ने जानबूझकर प्रभावशाली लोगों से जुड़ी जानकारी को छिपाया है। यह आरोप प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है, इसीलिए कोर्ट ने सभी जिलों के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत जिम्मेदारी के साथ सही और पूरी जानकारी प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। यानी अब कोई अफसर यह नहीं कह सकता कि उसे जानकारी नहीं थी या उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

क्या बदलेगा इस आदेश से

इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 26 मई को निर्धारित की गई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि, सरकार और जिला प्रशासन कोर्ट के सामने किस तरह का जवाब पेश करते हैं, जिन नामों को लेकर जानकारी मांगी गई है, उनका राजनीतिक रसूख किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासन बिना किसी दबाव के पूरी और सच्ची जानकारी देने में सक्षम होगा।

AllahabadHigh Court

कानून के जानकारों का मानना है कि, यदि कोर्ट के आदेश का पूरी ईमानदारी से पालन हो और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के लाइसेंस रद्द किए जाएं तो यह यूपी में कानून-व्यवस्था की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यूपी में बाहुबल और सत्ता के गठजोड़ की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति के कोई भी कानूनी आदेश महज कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश यूपी के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में बड़ी हलचल मचा चुका है और आने वाले दिनों में इस मामले पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।

 

इसे भी पढ़ें-   4.40 करोड़ मोबाइल ग्राहकों के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश में रिलायंस जियो लगातार नंबर वन

Related Articles

Back to top button