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नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग तेज, देउबा का सनातन पर बड़ा ऐलान

काठमांडू। पड़ोसी देश नेपाल में एक बार फिर हिंदू राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने लगी है। देश भर में इस मुद्दे को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शेर बहादुर देउबा ने एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। देउबा ने सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान के रूप में स्थापित किए जाने की वकालत की है। उनके इस बयान के बाद हिंदू राष्ट्र की मांग करने वाले संगठनों को बड़ी ताकत मिलेगी।

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नेपाली कांग्रेस के सम्मेलन में पास हुआ प्रस्ताव

शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले नेपाली कांग्रेस गुट के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन में इस विषय पर एक अहम प्रस्ताव पास किया गया, जिसमें सनातन धर्म को देश की राष्ट्रीय पहचान के तौर पर बढ़ावा देने की बात कही गई। सम्मेलन के दौरान माहौल पूरी तरह धार्मिक रंग में रंगा नजर आया। यहां मौजूद लोगों ने “मैं हिंदू हूं” के नारे लगाए। इस पूरे घटनाक्रम को नेपाल की राजनीति में सनातन धर्म को लेकर बढ़ती स्वीकार्यता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

Nepal Hindu Nation

सम्मेलन में देउबा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है, सनातन धर्म को नेपाल की पहचान बनाया जाना चाहिए। जैसे ही उनका ये बयान आया देश का राजनीतिक पारा चढ़ गया। हालांकि, यह भी गौर करने वाली बात है कि सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में सिर्फ सनातन धर्म की ही बात नहीं की गई, बल्कि इसमें सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता, आपसी सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने पर भी विशेष जोर दिया गया है।

इसके साथ ही हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति पर आधारित परंपरागत धार्मिक मान्यताओं के संरक्षण की भी बात कही गई है, जिससे यह जाहिर होता है कि, प्रस्ताव पूरी तरह से किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नेपाल की विविध सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को भी शामिल करने की कोशिश की गई है।

संविधान में संशोधन की मांग

एक रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मुहिम अब एक बिल्कुल नए और महत्वपूर्ण चरण में दाखिल हो चुकी है। हिंदू धर्म का समर्थन करने वाले विभिन्न संगठन अब अपनी मांग को आगे बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन की प्रक्रिया को एक कारगर रास्ते के रूप में देख रहे हैं। गौरतलब है कि नेपाल सरकार खुद भी इन दिनों संविधान के अलग-अलग प्रावधानों में संशोधन को लेकर आम जनता और विभिन्न संगठनों से सुझाव इकट्ठा करने की प्रक्रिया में जुटी हुई है, जिसका फायदा उठाते हुए हिंदू राष्ट्र समर्थक संगठन अपनी बात को संवैधानिक बहस का हिस्सा बनाने में जुटे हैं।

इसी क्रम में विश्व हिंदू परिषद नेपाल की ओर से सरकार को एक लिखित प्रस्ताव सौंपा गया है। इस प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि संविधान के अनुच्छेद चार से धर्मनिरपेक्ष शब्द को पूरी तरह हटा दिया जाए। यह संगठन चाहता है कि, नेपाल को औपचारिक रूप से सनातन धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र के तौर पर घोषित किया जाए। इसके अलावा राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी यानी आरपीपी भी इस मुद्दे को लेकर सक्रिय है और वह संविधान संशोधन को लेकर होने वाली आगामी बहस में हिंदू राष्ट्र के विषय को प्रमुखता से शामिल कराना चाहती है।

 नेपाल सरकार के सामने बड़ी चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम ने बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के सामने एक नई और जटिल चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार की तरफ से गठित संविधान संशोधन कार्य-समूह ने अपनी सिफारिशों में कुल 308 अनुच्छेदों में से 245 अनुच्छेदों में बदलाव किए जाने का सुझाव दिया है, जो अपने आप में एक बड़े पैमाने का संवैधानिक फेरबदल है। हिंदू राष्ट्र का समर्थन करने वाले संगठनों ने इस व्यापक संशोधन प्रक्रिया को अपनी मांग को संवैधानिक बहस के केंद्र में लाने के एक बेहतरीन अवसर के रूप में इस्तेमाल किया है।

इसी सिलसिले में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद लिंडेन के नेतृत्व में पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में प्रधानमंत्री बालेन शाह से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान पार्टी ने अपनी मांगों को सीधे सरकार के समक्ष रखा। आरपीपी की तरफ से कहा गया है कि संविधान में होने वाले व्यापक संशोधन के दौरान नेपाल की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े विषयों पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। पार्टी का मानना है कि, यह बहस केवल संगठनों या सड़क पर सीमित न रहकर संसद के भीतर और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच भी होनी चाहिए, ताकि इस पर एक व्यापक राष्ट्रीय सहमति बनाई जा सके।

धार्मिक स्वतंत्रता पर जोर  

यह ध्यान देने वाली बात है कि, हिंदू राष्ट्र की मांग करने वाला खेमा सिर्फ सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने प्रस्तावित मॉडल में धार्मिक स्वतंत्रता को भी एक अहम स्तंभ के तौर पर शामिल करने की बात कह रहा है।

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इसका मतलब यह है कि, समर्थक संगठन एक ऐसी व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं, जिसमें सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान के तौर पर मान्यता मिले, लेकिन साथ ही अन्य धर्मों को मानने वाले नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे। यह रुख इस पूरे आंदोलन को एक व्यापक और समावेशी स्वरूप देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

2015 में अपनाया गया था धर्मनिरपेक्ष संविधान

यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि, नेपाल ने वर्ष 2015 में एक नया संविधान अपनाया था, जिसके तहत देश को औपचारिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था। इससे पहले नेपाल दुनिया का इकलौता हिंदू राष्ट्र माना जाता था, लेकिन 2006 में हुए राजनीतिक बदलावों और उसके बाद अपनाए गए संविधान ने देश के धार्मिक स्वरूप में बड़ा परिवर्तन कर दिया था। अब करीब एक दशक बाद एक बार फिर हिंदू राष्ट्र की मांग जोर पकड़ती दिख रही है, जो यह दर्शाता है कि नेपाल में धार्मिक पहचान का सवाल अब भी एक संवेदनशील और सक्रिय राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है।

क्या फैसला लेगी बालेन शाह सरकार

अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि, संविधान संशोधन की प्रक्रिया के दौरान इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया जाता है और प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार इस संवेदनशील विषय पर आखिरकार क्या फैसला लेती है। एक तरफ हिंदू राष्ट्र समर्थक संगठन और कई प्रमुख राजनीतिक दल इस मांग को जोर-शोर से उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता के समर्थक इसे मौजूदा संवैधानिक ढांचे में बदलाव के तौर पर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में संविधान संशोधन को लेकर होने वाली बहस पर पूरे नेपाल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी करीबी नजर बनी रहने की उम्मीद है।

 

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