चीन का चमत्कार: ‘मौत के रेगिस्तान’ को बनाया हरा भरा जंगल, लगा डाले इतने अरब पेड़

बीजिंग। चीन ने करीब पांच दशकों की अथक मेहनत के बाद एक ऐसा कारनामा किया है, जिसे देखकर दुनियाभर के पर्यावरण विशेषज्ञ हैरान हैं। दरअसल, ड्रैगन ने कभी ‘मौत के रेगिस्तान’ के नाम से कुख्यात रहे तकलामकन रेगिस्तान को कार्बन डाइऑक्साइड सोखने वाली उपजाऊ धरती में बदल दिया है। यह रेगिस्तान अपने विशाल रेत के टीलों, बेहद कम बारिश और बेहद कठोर परिस्थितियों के लिए जाना जाता था। माना जाता था कि, यहां किसी भी पेड़-पौधे का पनपना असंभव है, लेकिन पिछले कई दशकों में इस विशाल रेगिस्तान के किनारे धीरे-धीरे बदलते चले गए, जहां कभी सिर्फ सूखी और वीरान रेत हुआ करती थी। अब वहां हरे-भरे पेड़ और झाड़ियां लहलहा रही है।

इसे भी पढ़ें- PLA खेल रहा माइंडगेम, भारत के S-400 को तबाह कर सकता है चीनी सेना का रॉकेट?

 जलवायु संरक्षण का बड़ा हथियार

बताया जाता है कि, शुरुआत में यह परियोजना केवल रेगिस्तान के फैलाव को रोकने के मकसद से शुरू की गई थी, लेकिन धीरे-धीरे  इसने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करना शुरू किया। इसी का नतीजा है कि अब ये रेगिस्तान नहीं रहा गया है। अब ये हरा भरा जंगल हो गया है।

China

सैटेलाइट से मिली तस्वीरों में साफ तौर पर देखा गया है कि चीन ने इस इलाके को धीरे-धीरे मगर तेजी से हरे-भरे क्षेत्र में बदल डाला है। हैरानी की बात यह है कि, अब यह क्षेत्र जितनी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करता है, उससे कहीं अधिक मात्रा में उसे सोख भी रहा है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि, यह इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि, रेगिस्तान के किनारों पर बड़े स्तर पर वृक्षारोपण करने से खास परिस्थितियों में जलवायु को लेकर मापने लायक ठोस फायदे हासिल किए जा सकते हैं।

1978 में शुरू हुआ था प्रोजेक्ट

चीन के आर्थिक और सामाजिक मामलों से जुड़े विभाग की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो, देश के उत्तरी हिस्सों में लगातार बढ़ते रेगिस्तान के दायरे पर लगाम कसने के इरादे से चीन सरकार ने वर्ष 1978 में ‘थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट प्रोग्राम’ की शुरुआत की थी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आमतौर पर ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ के नाम से जाना जाता है।

यह प्रोजेक्ट देश के कई प्रांतों में फैला हुआ है और इसका मूल उद्देश्य तेज हवाओं से होने वाले भूमि कटाव को कम करना, लगातार खिसकती रेत को स्थिर करना, साथ ही खेती योग्य जमीन और आबादी वाले इलाकों को रेगिस्तान की चपेट में आने से बचाना है। इस विशाल कार्यक्रम के तहत तकलामकन रेगिस्तान सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में गिना गया।

पहले रोकी गई उड़ती रेत

रिपोर्ट में बताया गया कि चीन के वैज्ञानिकों ने सीधे रेगिस्तान के भीतरी हिस्से में जंगल उगाने की कोशिश नहीं की बल्कि एक अलग रणनीति अपनाई। उन्होंने रेगिस्तान के किनारों पर ध्यान केंद्रित किया, जहां सिंचाई की व्यवस्था के सहारे खास तौर पर चुनी गई वनस्पतियां पनप सकती थीं और उड़ती हुई रेत के खिलाफ एक सुरक्षा दीवार का काम भी कर सकती थीं। वर्षों की मेहनत के बाद यह रणनीति रेगिस्तान के कई हिस्सों के चारों ओर लगे पेड़ों, झाड़ियों और शेल्टरबेल्ट के एक विशाल नेटवर्क में बदल गई।

लगाए गए अरबों पेड़

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत तकलामकन रेगिस्तान के चारों तरफ 3,000 किलोमीटर से भी लंबा एक अटूट हरा घेरा तैयार किया जा चुका है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले करीब 50 वर्षों में इस इलाके में लगभग 66 अरब पेड़ लगाकर रेगिस्तान की चारों दिशाओं से घेराबंदी की गई है। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि किस तरह लगातार और योजनाबद्ध प्रयासों से प्रकृति के सबसे कठिन इलाकों को भी बदला जा सकता है।

China

ताजा उपग्रह आंकड़ों और वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि, रेगिस्तान के किनारों पर उगाई गई इस हरियाली ने अब उत्सर्जित होने वाली कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं ज्यादा मात्रा में इसे सोखना शुरू कर दिया है, जिससे यह क्षेत्र एक कारगर ‘कार्बन सिंक’ के रूप में उभर चुका है। यानी यह इलाका अब पर्यावरण के लिए नुकसानदायक होने के बजाय जलवायु संतुलन बनाए रखने में मददगार साबित हो रहा है।

 धरती की सतह और सूरज की रोशनी का संतुलन

विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण का असर केवल कार्बन सोखने की मात्रा तक सीमित नहीं है। पेड़-पौधे धरती की सतह और सूरज की रोशनी के बीच होने वाले आपसी संतुलन को भी काफी हद तक प्रभावित करते हैं। रेगिस्तान की खुली रेत बिना किसी रुकावट के सूरज की रोशनी को बड़ी मात्रा में परावर्तित यानी रिफ्लेक्ट कर देती है। इसके उलट, पेड़ और झाड़ियां गहरे रंग की होने के कारण सूरज की रोशनी का बहुत कम हिस्सा वापस अंतरिक्ष की ओर भेज पाती हैं। वैज्ञानिक भाषा में इस परिघटना को ‘लो एल्बिडो इफेक्ट’ कहा जाता है।

इसी वजह से जलवायु पर शोध कर रहे कुछ वैज्ञानिकों के मन में एक नया सवाल भी खड़ा हुआ है। क्या बड़े स्तर पर रेगिस्तानी इलाकों को हरा-भरा बनाने की प्रक्रिया कहीं गर्मी बढ़ाने का कारण तो नहीं बन सकती? यह सवाल अभी शोध और बहस का विषय बना हुआ है, लेकिन इसके बावजूद तकलामकन की यह उपलब्धि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक मिसाल के तौर पर देखी जा रही है।

दुनिया के लिए बड़ी सीख

तकलामकन रेगिस्तान की यह कहानी सिर्फ चीन के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण सीख बनकर सामने आई है। यह साबित करती है कि अगर दीर्घकालिक योजना, निरंतर प्रयास और वैज्ञानिक सोच के साथ काम किया जाए, तो सबसे बंजर और चुनौतीपूर्ण भूभाग को भी हरा-भरा बनाया जा सकता है।

पांच दशकों तक चली इस मुहिम ने न सिर्फ रेगिस्तान के फैलाव पर लगाम लगाई है, बल्कि इसे जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक कारगर हथियार में भी बदल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में इस मॉडल का अध्ययन कर दुनिया के अन्य रेगिस्तानी इलाकों में भी इसी तरह की परियोजनाओं को अपनाया जा सकता है, ताकि जलवायु संकट से निपटने में मदद मिल सके।

 

इसे भी पढ़ें- जर्जर हालत में जोशीमठ का प्राचीन सीता मंदिर, करोड़ों के बजट के बावजूद BKTC कर रही अनदेखी

Related Articles

Back to top button