बुद्ध पूर्णिमा 2026: शुभ मुहूर्त में करें स्नान-दान, मिलेगा अक्षय पुण्य

समस्त विश्व को शांति, अहिंसा और करुणा का मार्ग दिखाने वाले तथागत गौतम बुद्ध का जन्मोत्सव यानी बुद्ध पूर्णिमा इस वर्ष 1 मई को पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। वैशाख मास की इस पूर्णिमा का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से भी अत्यंत गहरा है, क्योंकि यह दिन मानवता के सबसे महान शिक्षकों में से एक के जन्म, ज्ञान और निर्वाण का साक्षी है।

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स्नान और दान का है महत्व

दुनिया भर में बौद्ध धर्म को मानने वाले करोड़ों लोग इस दिन को एक पर्व के रूप में मनाते हैं, जिससे यह विश्व के सबसे बड़े आध्यात्मिक आयोजनों में से एक बन जाता है। भारत की धरती से उपजा यह धर्म आज वैश्विक शांति का आधार स्तंभ माना जाता है और इसकी प्रासंगिकता आधुनिक युग के तनावपूर्ण वातावरण में और भी अधिक बढ़ गई है।

ज्योतिषीय गणना और पंचांग के अनुसार, इस साल वैशाख पूर्णिमा की तिथि का आरंभ 30 अप्रैल की रात 9 बजकर 12 मिनट पर होगा, जो अगले दिन 1 मई की रात 10 बजकर 52 मिनट तक जारी रहेगी। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान का विशेष महत्व है। विशेष रूप से 1 मई की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के लिए समय सुबह 4 बजकर 15 मिनट से 4 बजकर 58 मिनट तक रहेगा, जबकि सामान्य स्नान और पूजा के लिए सुबह 5 बजकर 41 मिनट से 10 बजकर 39 मिनट तक का समय अत्यंत शुभ माना जा रहा है।

हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म दोनों के अनुयायियों के लिए यह तिथि समान रूप से महत्वपूर्ण है। एक तरफ बौद्ध धर्म के लोग इसे बुद्ध के मार्ग पर चलने के संकल्प के रूप में देखते हैं। वहीं दूसरी तरफ हिंदू धर्म में इस दिन भगवान विष्णु के नौवें अवतार के रूप में बुद्ध की पूजा की जाती है और भगवान सत्यनारायण के निमित्त व्रत रखा जाता है।

त्रिगुण धन्य पर्व भी कहते हैं

बुद्ध पूर्णिमा को त्रिगुण धन्य पर्व के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि महात्मा बुद्ध के जीवन की तीन सबसे बड़ी और क्रांतिकारी घटनाएं इसी एक तिथि पर घटित हुई थीं। ईसा पूर्व 563 में नेपाल के लुंबिनी वन में सिद्धार्थ गौतम के रूप में उनका जन्म वैशाख पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसके पश्चात, सत्य की खोज में भटकते हुए जब वे बोधगया पहुंचे, तो 35 वर्ष की आयु में इसी पूर्णिमा की रात उन्हें पीपल के वृक्ष के नीचे परम ज्ञान की प्राप्ति हुई।

80 वर्ष की आयु में कुशीनगर की धरती पर उन्होंने इसी तिथि को अपनी देह का त्याग किया, जिसे बौद्ध परंपरा में महापरिनिर्वाण कहा जाता है। इतिहास में ऐसी दुर्लभ घटना किसी और महापुरुष के साथ नहीं मिलती, जहां जन्म, ज्ञान और मृत्यु एक ही तिथि पर हुए हों। यही कारण है कि यह दिन आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना जाता है।

शांति यात्रा निकलती है

इस पावन अवसर पर बौद्ध धर्म के अनुयायी अपने पवित्र ग्रंथों जैसे त्रिपिटक और धम्मपद का पाठ करते हैं। मठों और विहारों में विशेष सभाएं आयोजित की जाती हैं, जिसमें बुद्ध की शिक्षाओं पर चर्चा होती है। बोधगया में स्थित उस बोधि वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है, जिसके नीचे बैठकर सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ बने थे। इस दिन लोग अपने घरों को दीपों से सजाते हैं और दीप दान की परंपरा का निर्वहन करते हैं।

इसे दिन सफेद वस्त्र धारण कर शांति यात्राएं निकाली जाती हैं और बुद्ध के शांति मंत्रों का जाप किया जाता है। दूसरी ओर, सनातन परंपरा के लोग इस दिन मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं और रात्रि के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने जीवन में सुख-शांति की कामना करते हैं। इस दिन दान-पुण्य का फल अक्षय माना जाता है, इसलिए लोग जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्र वितरित करते हैं।

 

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