मिडटर्म में हार के बावजूद ट्रंप रहेंगे अमेरिका के ‘पावर सेंटर’, जानिए कैसे कायम रहेगा जलवा

संसद कर सकती है जांच, पर सीधे सरकार नहीं चला सकती, राष्ट्रपति पद के अधिकार जस के तस

वॉशिंगटन। अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है। डेमोक्रेट्स ने संसद के दोनों सदनों, यानी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, में बहुमत हासिल कर लिया है। इससे आने वाले दिनों में ट्रंप के लिए अपनी नीतियों को लागू करना आसान नहीं रहने वाला। संसद में उनके फैसलों पर सवाल उठेंगे और सरकार के कामकाज की जांच भी बढ़ सकती है।

चुनाव से पहले सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास 53-47 का बहुमत था और व्हाइट हाउस के साथ-साथ संसद के दोनों सदन भी उसके नियंत्रण में थे। ऐसे में नतीजों को राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक एसोसिएटेड प्रेस ने मंगलवार देर रात सीनेट में डेमोक्रेट्स की जीत का ऐलान किया।

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ट्रंप से स्वीकारी हार

रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप ने कहा है कि वह चुनाव नतीजों को स्वीकार करेंगे और डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवारों की हार की वजह इस बात को भी बताया कि वह खुद मतपत्र पर नहीं थे।

DONALD TRUMP

हालांकि, संसद में बहुमत बदलने का यह मतलब कतई नहीं है कि, राष्ट्रपति की ताकत भी खत्म हो गई है। अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को कई ऐसे अधिकार देता है, जिनका इस्तेमाल वह संसद में विरोध के बावजूद कर सकते हैं। विदेश नीति, सेना और सरकारी एजेंसियों से जुड़े फैसलों में राष्ट्रपति की अहम भूमिका बनी रहती है। यही वजह है कि, चुनावी झटके के बाद भी ट्रंप अमेरिकी सत्ता के सबसे बड़े पावर सेंटरों में से एक बने रहेंगे।

शक्तियों का बंटवारा

अमेरिकी संविधान में सत्ता को राष्ट्रपति, संसद और अदालतों के बीच बांटा गया है, ताकि कोई एक संस्था सारी ताकत अपने हाथ में न रख सके। संसद कानून बनाती है और सरकारी खर्च तय करती है, जबकि राष्ट्रपति कानूनों को लागू कराते हैं और सरकार का संचालन करते हैं। अदालतें यह देखती हैं कि, सरकार के फैसले कानून और संविधान के दायरे में हैं या नहीं। यही व्यवस्था तय करती है कि चुनाव में किसी पार्टी की हार या जीत के बाद भी राष्ट्रपति पद के कुछ अधिकार अपनी जगह कायम रहते हैं।

वीटो का हथियार अब भी ट्रंप के पास

ट्रंप की ताकत का एक बड़ा आधार राष्ट्रपति को मिला वीटो का अधिकार है। अगर संसद में डेमोक्रेट्स कोई ऐसा बिल पास कराते हैं, जो ट्रंप की नीतियों के खिलाफ है, तो राष्ट्रपति उसे रोक सकते हैं। इस फैसले को पलटने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है।

अमेरिका की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इतना बड़ा बहुमत जुटाना आसान नहीं है, इसलिए संसद में बहुमत होने के बावजूद डेमोक्रेट्स के लिए अपनी हर योजना को कानून की शक्ल देना मुश्किल होगा। हालांकि, कानून बनाने और सरकारी खर्च को मंजूरी देने का अधिकार संसद के पास बना रहेगा।

विदेश नीति और सेना पर राष्ट्रपति की पकड़

अमेरिका की विदेश नीति तय करने में राष्ट्रपति की भूमिका सबसे अहम होती है। वह दूसरे देशों से बातचीत करते हैं और कूटनीतिक फैसले लेते हैं। राष्ट्रपति अमेरिकी सेना के कमांडर-इन-चीफ भी होते हैं। संसद विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर सवाल उठा सकती है। वह सैन्य अभियानों की फंडिंग पर शर्तें लगा सकती है और सरकार से जवाब भी मांग सकती है, लेकिन संसद अपने आप राष्ट्रपति से विदेश नीति का पूरा नियंत्रण नहीं ले सकती। ऐसे में ट्रंप के पास कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में फैसले लेने की गुंजाइश बनी रहेगी।

सरकारी एजेंसियों के जरिए लागू होती हैं नीतियां

ट्रंप की ताकत का एक और बड़ा आधार अमेरिकी सरकार की एजेंसियां हैं। इमिग्रेशन यानी आव्रजन से जुड़े फैसलों में होमलैंड सिक्योरिटी विभाग, USCIS, विदेश मंत्रालय और श्रम विभाग की अहम भूमिका है।  ट्रंप सरकार ने कई नीतियां कार्यकारी आदेशों और सरकारी नियमों के जरिए लागू की हैं।

 

संसद में बहुमत बदलने से ये नियम अपने आप खत्म नहीं हो जाते। इन्हें बदलने के लिए नई प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है। कुछ मामलों में नए सरकारी आदेश, कानून या अदालत के फैसले की भी जरूरत पड़ सकती है।

संसद जांच कर सकती है बस

डेमोक्रेट्स अब संसद में जांच और निगरानी की अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सकते हैं। वे सरकारी अधिकारियों को सवालों के जवाब देने के लिए तलब कर सकते हैं। इमिग्रेशन नीति, हिरासत और वीजा नियमों पर जांच बैठा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर सरकारी दस्तावेज भी मांग सकते हैं। लेकिन संसद की समितियां सरकारी एजेंसियों को अपनी पसंद के मुताबिक काम करने का सीधा आदेश नहीं दे सकतीं। सरकारी विभागों को चलाने और मौजूदा कानूनों को लागू कराने की जिम्मेदारी राष्ट्रपति और उनकी सरकार की होती है।

ट्रंप के सामने बढ़ेंगी चुनौतियां

मिडटर्म चुनाव के बाद ट्रंप को संसद में पहले से कहीं ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ेगा। उनके फैसलों पर जांच बढ़ सकती है और नई नीतियां लागू करना मुश्किल हो सकता है। अदालतें भी उनके फैसलों की समीक्षा कर सकती हैं। संसद सरकारी खर्च और कानूनों के जरिए उनकी नीतियों पर रोक लगाने की कोशिश कर सकती है।

इसके बावजूद ट्रंप के पास वीटो, सरकारी एजेंसियों पर नियंत्रण और विदेश नीति से जुड़े अहम अधिकार बने रहेंगे। ये अधिकार उन्हें हर लड़ाई में जीत की गारंटी नहीं देते, लेकिन राष्ट्रपति के तौर पर उनकी ताकत जरूर कायम रखते हैं। आने वाले कुछ दिनों में संसद और व्हाइट हाउस के बीच टकराव और तालमेल, दोनों की असली परीक्षा होगी।

यानी मतलब साफ है कि, संसद में सत्ता का समीकरण बदल गया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति पद के अधिकार खत्म नहीं हुए हैं। ट्रंप के लिए आगे का कार्यकाल ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा, मगर वह अब भी वॉशिंगटन के अहम पावर सेंटर बने रहेंगे।

 

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