
येरुशलम। इजरायल में अगली सरकार की तस्वीर अब दो दिन में साफ हो जाएगी। राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग रविवार (8 नवंबर) को ऐलान करेंगे कि, नई सरकार कौन बनाएगा। विपक्ष के नेता गादी आइजेनकोट को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की जगह लेने के लिए बड़ी संख्या में सिफारिशें मिली हैं। राष्ट्रपति के साथ गुरुवार को हुई बातचीत में अरब दलों ने भी आइजेनकोट के नाम पर अपना समर्थन जताया है। हालांकि, गठबंधन के भीतर से उठी एक आपत्ति ने उनकी राह में बड़ा पेच फंसा दिया है।
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किसके पास कितनी ताकत
चुनाव के नतीजों ने इजरायल की राजनीति को एक बार फिर त्रिशंकु स्थिति में ला खड़ा किया है। 120 सदस्यीय संसद ‘नेसेट’ में नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि आइजेनकोट के गठबंधन के खाते में 48 सीटें आई हैं। सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत का आंकड़ा 61 सीटों का है, यानी दोनों में से कोई भी खेमा इस जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच सका।
इस पूरे समीकरण में सबसे बड़ी भूमिका अरब दलों की उभरकर सामने आई है। इन दलों ने रिकॉर्ड 19 सीटों पर जीत दर्ज की है। यही वजह है कि, सरकार गठन की किसी भी कवायद में अब उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं रह गया है।
‘किंगमेकर’ बने अरब दल
चुनाव के बाद पैदा हुए राजनीतिक गतिरोध के बीच अरब दलों ने आइजेनकोट के समर्थन का ऐलान किया है। सीटों का गणित देखें तो आइजेनकोट की 48 और अरब दलों की 19 सीटें जोड़ने पर आंकड़ा 67 पहुंचता है, जो बहुमत से कहीं ऊपर है। यानी कागज पर यह गठजोड़ नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर सकता है।

लेकिन राजनीति कागज पर खिंची रेखाओं से नहीं चलती। अगर आइजेनकोट का विपक्षी खेमा अरब दलों के साथ मिलकर काम करने को तैयार होता है, तभी वे किंगमेकर की भूमिका निभा पाएंगे। फिलहाल यह साफ नहीं है कि ऐसा होगा या नहीं।
कहां फंसा है पेंच
असली अड़चन आइजेनकोट के अपने ही गठबंधन से आई है। गठबंधन में शामिल दक्षिणपंथी पार्टी ‘इजरायल बेइतेनु’ ने साफ शब्दों में कह दिया है कि, वह ऐसी किसी भी सरकार का हिस्सा नहीं बनेगी, जो अरब पार्टियों के समर्थन पर टिकी हो।
पार्टी प्रमुख अविगडोर लिबरमैन ने इसकी वजह भी गिनाई। उनका कहना है कि अरब पार्टियों ने हमास को खुले तौर पर ‘आतंकवादी संगठन’ मानने से इनकार कर दिया है। हालांकि इस आरोप के बीच एक दूसरा पहलू भी है। अरब पार्टियों ने 7 अक्तूबर 2023 को इजरायल पर हुए हमास के हमले की कई बार निंदा की है।
इस तरह एक तरफ अरब दलों का समर्थन आइजेनकोट के लिए बहुमत की संभावना खोलता है, तो दूसरी तरफ उसी समर्थन के कारण उनके अपने गठबंधन के एक घटक के बाहर होने का खतरा खड़ा हो गया है। आइजेनकोट के सामने चुनौती इन दोनों छोरों के बीच संतुलन साधने की है।
नेतन्याहू को भी लगा बड़ा झटका
उधर, नेतन्याहू खेमे के लिए भी हालात आसान नहीं हैं। उनके लंबे समय तक सहयोगी रहे दल ‘यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म’ ने इस बार राष्ट्रपति हर्जोग से मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री पद के लिए नेतन्याहू के नाम की सिफारिश नहीं की। पार्टी ने सात सीटें जीती हैं। हालांकि पार्टी ने आइजेनकोट का भी समर्थन नहीं किया है। यानी उसने दोनों में से किसी के पक्ष में सीधे तौर पर खड़े होने से परहेज किया है। इसके बावजूद, पुराने सहयोगी का नेतन्याहू के नाम की सिफारिश न करना उनके लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
राष्ट्रपति के सामने क्या है कसौटी
नतीजे आने के बाद राष्ट्रपति हर्जोग ने बुधवार को नेसेट में सीट जीतने वाले राजनीतिक दलों के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू की थी। इजरायल में परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति आमतौर पर उस सांसद को सरकार बनाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं, जिसके पास उनकी नजर में सरकार बनाने की सबसे अच्छी संभावना होती है।
इस फैसले में विचार-विमर्श के दौरान राजनीतिक दलों की ओर से दिए गए समर्थन को भी ध्यान में रखा जाता है। खास बात यह है कि, इस पूरी प्रक्रिया का सीधा प्रसारण किया जाता है, ताकि कौन सा दल किसके साथ खड़ा है, यह जनता के सामने रहे। इसी प्रक्रिया में यह तस्वीर उभरी कि आइजेनकोट को बड़ी संख्या में सिफारिशें मिली हैं, जबकि नेतन्याहू के नाम पर यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म ने समर्थन नहीं दिया।
28 दिन में बनानी होगी सरकार
राष्ट्रपति जिस नेता को सरकार बनाने का जिम्मा सौंपते हैं, उसे गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिन का समय मिलता है। अगर राष्ट्रपति को लगता है कि, सरकार बनने की उचित संभावना है, तो वह अपने विवेक से इस अवधि को 14 दिन और बढ़ा सकते हैं। यानी अधिकतम 42 दिन तक गठबंधन की कवायद चल सकती है।
अब नजर रविवार पर
इजरायल की सियासत इस वक्त बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है। नेतन्याहू के पास 53 सीटें हैं और बहुमत के लिए उन्हें अभी और समर्थन चाहिए, जबकि पुराने सहयोगी ने भी उनके नाम की सिफारिश नहीं की। दूसरी ओर आइजेनकोट के पास अरब दलों का समर्थन तो है, पर लिबरमैन की शर्त ने उनके लिए मुश्किल खड़ी कर दी है।
अब सबकी निगाहें रविवार को होने वाले राष्ट्रपति के ऐलान पर टिकी हैं। यह फैसला तय करेगा कि सरकार बनाने की पहली कोशिश का मौका किसे मिलेगा। उसके बाद असली परीक्षा गठबंधन की गणित सुलझाने की होगी, जिसके लिए नेता के पास सीमित समय होगा।
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