
लखनऊ। सहकार भारती की ओर से आयोजित दो दिवसीय अभ्यासवर्ग सोमवार को सीतापुर रोड स्थित एस.आर. इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में सम्पन्न हुआ। समापन सत्र में राष्ट्रधर्म के निदेशक मनोज कांत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस दो दिवसीय आयोजन में प्रदेश भर से सहकार भारती से जुड़े पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया।
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तीन सत्रों में अभ्यासवर्ग आयोजित
सहकार भारती के प्रदेश महामंत्री अरविंद दुबे ने बताया कि अंतिम दिन कुल तीन सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें सहकारिता का इतिहास, प्रकोष्ठ कार्य एवं सहकारी समितियों का गठन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। इसके साथ ही विभाग संयोजक रामकुमार दीक्षित ने विभाग के संगठनात्मक विवरण को उपस्थित कार्यकर्ताओं के समक्ष रखा। अरविंद दुबे ने अपने संबोधन में कहा कि सभी को सहकारिता के मूल्यों के साथ मिलकर चलना, कार्य करना और विमर्श करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इससे निरंतर सहयोग की भावना बढ़ती है, जिससे आत्मीयता और सहकारिता की प्रवृत्ति मज़बूत होती है। उन्होंने आगे कहा कि जब कोई व्यक्ति या संगठन ईमानदारी और मज़बूती से किसी भी दिशा में कार्य करता है, तो इससे परस्पर सहयोग और क्षमता में वृद्धि होती है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति, समाज और राष्ट्र, तीनों ही सक्षम और सामर्थ्यवान बनते हैं। दुबे ने संगठन के भीतर विभिन्न प्रकोष्ठों की कार्यशैली और समितियों के गठन को लेकर भी विशेष बल दिया।
भारतीय संस्कृति में सहकारिता का पुराना नाता: राजदत्त पांडेय
सहकार भारती के राष्ट्रीय पैक्स प्रकोष्ठ प्रमुख राजदत्त पांडेय ने सहकारिता के इतिहास विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि, भारतीय संस्कृति में मानव जीवन के विकास के साथ सहकारिता का बहुत पुराना संबंध रहा है, क्योंकि मनुष्य मूल रूप से एक सहकार प्राणी है। उन्होंने कहा कि कोई भी मनुष्य सामाजिक संबंधों का निर्वाह किए बिना सुचारू रूप से जीवन नहीं जी सकता, और व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हमेशा सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप ही होता है।
उनके अनुसार, सहकारिता के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था अपनाकर ही समाज की समस्याओं का समाधान संभव है। उन्होंने विश्व की तुलना में भारतीय संस्कृति की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया की किसी भी अन्य संस्कृति या समाज में सहकारिता जैसा भाव देखने को नहीं मिलता, जबकि यह भारतीय संस्कृति और परंपराओं में गहराई से रचा-बसा है।
1904 में बना था पहला सहकारिता कानून
राजदत्त पांडेय ने आगे बताया कि, वर्ष 1904 में देश का पहला सहकारिता कानून बनाया गया था, और आज भी महाराष्ट्र के झूले गांव में सहकारिता सोसायटी का ऐतिहासिक आंकड़ा दर्ज है। उन्होंने बताया कि आगे चलकर सहकारिता को पंचवर्षीय योजनाओं के तहत एक व्यवस्थित कार्य प्रणाली के रूप में विकसित किया गया। उन्होंने सहकारिता की एक बड़ी विशेषता बताते हुए कहा कि इसमें सभी सदस्यों को समान अधिकार प्राप्त होता है, जबकि कॉरपोरेट जगत में किसी व्यक्ति के मत का अधिकार उसकी पूंजी के अनुपात में तय होता है।
उन्होंने कहा कि, सहकारी सोसायटी की यही समानता इसे अन्य आर्थिक व्यवस्थाओं से अलग बनाती है। इसके अलावा उन्होंने सहकार भारती के पैक्स प्रकोष्ठों और विभिन्न आयामों पर भी विस्तार से बात करते हुए कहा कि किसी भी संगठन की बुनियाद को मज़बूत करने के लिए उसके प्रकोष्ठों का सशक्त होना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि प्रकोष्ठों को मज़बूत करने से ही आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक समरसता की भावना बढ़ती है।
स्वावलंबी भारत अभियान पर हुई विशेष चर्चा
अभ्यासवर्ग के सातवें सत्र में प्रदेश सम्पर्क प्रमुख अशोक कुमार शुक्ला ने ‘स्वावलंबी भारत अभियान’ विषय पर अपना संबोधन दिया। उन्होंने उपस्थित पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सहकार भारती द्वारा इस दिशा में अब तक किए गए कार्यों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि छोटे-छोटे उद्योगों को संचालित करने के लिए उचित प्रशिक्षण लिया जाना चाहिए और सरकारी योजनाओं से जुड़कर इनका लाभ उठाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए गांव-गांव तक युवाओं के साथ-साथ महिलाओं को भी स्व-उद्यम स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
‘सबको अपना मानकर चलना ही सहकारिता है’: मनोज कांत
समापन सत्र में मुख्य अतिथि मनोज कांत ने अपने संबोधन में कहा कि सबको एक साथ रखना, साथ रहना, साथ मिलकर कार्य करना और सबको अपना मानकर चलना, यही वास्तव में सहकारिता कहलाती है। उन्होंने कहा कि पूंजी के न्यायसंगत वितरण की समस्या का अब तक कोई ठोस समाधान नहीं मिल पाया है, लेकिन सहकारिता ही इस पूंजी वितरण की समस्या का व्यावहारिक समाधान बन सकती है।
उन्होंने बेरोज़गारी के मुद्दे पर भी अपनी बात रखते हुए कहा कि यह समस्या केवल आज के दौर की नहीं है, बल्कि यह बहुत पहले से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि हमारे प्राचीन इतिहास और शास्त्रों में ‘बेरोज़गार’ जैसा शब्द तक मौजूद नहीं था, लेकिन आधुनिकीकरण के साथ हमारे शब्दों और व्यवहार में भी बड़ा बदलाव आया है।
मनोज कांत ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति, भाषा और व्यवहार को अपनाने से समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, और यही वजह है कि आज के समय में सहकारिता पहले से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि सहकारिता के बने रहने से ही समाज में हमारी प्राचीन संस्कृति, अनुशासन और भारतीयता के भाव संरक्षित रह सकेंगे।
नए उद्यम स्थापित करने की बनेगी योजना
उनके अनुसार, सहकारिता के माध्यम से ही नए उद्यम स्थापित करने की योजनाएं बनेंगी, और जब उद्यम स्थापित होंगे, तभी समाज वास्तविक रूप से स्वावलंबी बन सकेगा। उन्होंने अंत में ज़ोर देकर कहा कि भविष्य में सहकारिता का कोई विकल्प नहीं है, और जो भी व्यक्ति इससे जुड़ेगा वह स्वाभाविक रूप से अनुशासित होगा तथा समय के साथ उसका यह अनुशासन और अधिक मज़बूत होता चला जाएगा, क्योंकि किसी भी समूह में बने रहने का अपना एक अनुशासन और गरिमा होती है।
कार्यक्रम के अंत में विभाग प्रमुख रामकुमार दीक्षित ने सभी उपस्थित अतिथियों, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया, जिसके साथ ही सहकार भारती का यह दो दिवसीय अभ्यासवर्ग सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
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