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क्या प्लास्टिक के नोटों में होगी जानवरों की चर्बी, RBI के टेंडर दस्तावेज़ में क्या है दर्ज?

नई दिल्ली। देश में जल्द ही प्लास्टिक (पॉलिमर) करेंसी नोट चलन में आने वाले हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इसकी औपचारिक घोषणा पहले ही कर चुका है, लेकिन नोटों के बाज़ार में आने से पहले ही सोशल मीडिया पर एक दावा तेज़ी से फैल रहा है, कि प्लास्टिक के इन नोटों को बनाने में जानवरों, खासकर सुअर और गाय की चर्बी (एनिमल टैलो) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह दावा कितना सही है, इसे समझने के लिए RBI की सहायक कंपनी द्वारा जारी टेंडर दस्तावेज़ों को खंगालना ज़रूरी है।

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पहले चरण में 10 और 20 रुपये के नोट

रिज़र्व बैंक और केंद्र सरकार मिलकर देश में पॉलिमर नोटों का ट्रायल शुरू करने की तैयारी में हैं। इस योजना के पहले चरण में 10 और 20 रुपये मूल्यवर्ग के नोट प्लास्टिक सामग्री पर छापे जाने हैं।

Plastic Notes

किसी भी सरकारी परियोजना की तरह इसके लिए भी एक विधिवत प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिसके तहत छपाई का ठेका हासिल करने के लिए वैश्विक स्तर पर कंपनियों से बोलियां (टेंडर) मंगाई गई हैं। जो भी कंपनी यह टेंडर जीतेगी, उसे भारत के लिए पॉलिमर नोट छापने का काम सौंपा जाएगा।

कौन जारी करता है टेंडर?

नोट छपाई से जुड़े टेंडर जारी करने का काम भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) करती है, जो RBI की ही एक इकाई है। किसी भी टेंडर के साथ सरकार की तरफ से कुछ अनिवार्य शर्तें भी जोड़ी जाती हैं, जिनका पालन बोली लगाने वाली हर कंपनी को करना होता है। मौजूदा पॉलिमर नोट टेंडर में भी ऐसी ही कुछ शर्तें शामिल हैं, जिनमें एक शर्त जानवरों की चर्बी से संबंधित पाई गई है।

दस्तावेज़ में आठ बार आया “एनिमल टैलो”

BRBNMPL की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध टेंडर दस्तावेज़ों की जांच में सामने आया कि, इसमें कुल आठ स्थानों पर “एनिमल टैलो” (Animal Tallow) शब्द का ज़िक्र मिलता है। सामान्य भाषा में समझें तो जब गाय, भैंस या सुअर जैसे मवेशियों की त्वचा के नीचे की परत और अंगों के आसपास जमी सख्त चर्बी को पिघलाकर शुद्ध किया जाता है, तो जो गाढ़ा सफेद पदार्थ तैयार होता है, उसे टैलो कहा जाता है। पारंपरिक रूप से टैलो का इस्तेमाल साबुन, मोमबत्ती और कुछ औद्योगिक उत्पादों में चिकनाई बनाए रखने के लिए किया जाता रहा है।

दस्तावेज़ के पेज 10 पर स्पष्ट शर्तें

टेंडर दस्तावेज़ के पेज नंबर 10 पर साफ तौर पर दर्ज है कि, बोली लगाने वाली कंपनी को अपने प्लास्टिक नोट के नमूने प्रस्तुत करने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि, इन नमूनों में न तो एनिमल टैलो पाया जाए और न ही जानवरों का कोई DNA अंश मौजूद हो। दूसरे शब्दों में, RBI ने शुरुआत में ही यह शर्त रख दी है कि, यदि किसी कंपनी के नोट के नमूने में पशु चर्बी या पशु DNA की मौजूदगी पाई गई, तो उस कंपनी को टेंडर से बाहर कर दिया जाएगा।

Plastic Notes

इस आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि, भारत में आने वाले प्लास्टिक नोटों में जानवरों की चर्बी के इस्तेमाल की कोई गुंजाइश शुरुआत से ही समाप्त कर दी गई है। ऐसे में देश के किसी भी धर्म चाहे वह हिंदू हों, मुस्लिम हों या कोई अन्य समुदाय को इस मामले पर चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि RBI ने अपनी शर्तों में ही यह सुनिश्चित कर दिया है कि, नोटों में पशु चर्बी का उपयोग न हो।

आखिर यह शर्त क्यों जोड़ी गई?

सवाल उठता है कि, RBI ने अपने टेंडर में इस तरह की शर्त क्यों शामिल की, आखिर प्लास्टिक नोटों का पशु चर्बी से क्या संबंध है? इसका जवाब ब्रिटेन के अनुभव में छिपा है। वर्ष 2016-17 के आसपास जब ब्रिटेन में पॉलिमर नोट पेश किए गए थे, तब वहां नोट छापने वाली कंपनी ने नोटों की सतह को चिकना और आपस में चिपकने से बचाने के लिए एनिमल टैलो का इस्तेमाल किया था। जब यह बात सार्वजनिक हुई, तो ब्रिटेन में शाकाहारी और वीगन समुदाय ने इसका व्यापक विरोध किया। इसके बाद संबंधित कंपनी ने एनिमल टैलो के स्थान पर पाम ऑइल का इस्तेमाल शुरू किया।

इसी अंतरराष्ट्रीय अनुभव को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि भारत के लिए बनने वाले प्लास्टिक नोटों में भी पाम ऑइल या नारियल तेल जैसे वनस्पति-आधारित पदार्थों का उपयोग किया जा सकता है, ताकि नोट टिकाऊ भी बने रहें और किसी धार्मिक या सामुदायिक भावना को ठेस भी न पहुंचे।

अफवाहों से बचने की ज़रूरत

यह मामला दिखाता है कि, किसी भी बड़े नीतिगत बदलाव के दौरान अफवाहों का फैलना स्वाभाविक है, खासकर जब मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हो, लेकिन आधिकारिक दस्तावेज़ों की पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि, RBI ने शुरुआत से ही इस संभावित विवाद को टालने के लिए एहतियाती कदम उठाए हैं। टेंडर की शर्तों में पशु चर्बी और पशु DNA दोनों पर स्पष्ट प्रतिबंध होना इस बात का प्रमाण है कि नियामक संस्था इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर पहले से सजग है।

फिलहाल पॉलिमर नोट अभी ट्रायल चरण में हैं और टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही यह तय होगा कि, किस कंपनी को छपाई का ठेका मिलता है और अंतिम उत्पाद में किन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। आम जनता को किसी भी असत्यापित दावे पर भरोसा करने से पहले आधिकारिक स्रोतों से जानकारी जरूर हासिल करनी चाहिए।

 

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