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‘कभी साइकिल पर ढोए जाते थे रॉकेट, आज मंगल तक पहुंचा भारत’: राजनाथ सिंह

लखनऊ। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शनिवार को बाबासाहेब भीमराव  अंबेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शिरकत करते हुए युवाओं का आह्वान किया कि, वे राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लें। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा का मकसद सिर्फ डिग्री प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका असली उद्देश्य ऐसे व्यक्तित्व गढ़ना है जो न्याय, समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे जैसे मूल्यों से प्रेरित होकर देश और समाज की सेवा में जुट जाए।

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आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा भारत

समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि, मौजूदा दौर में भारत न सिर्फ एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति और क्षमताओं पर गर्व करने वाले राष्ट्र के रूप में भी स्थापित हो चुका है।

Rajnath Singh

उन्होंने कहा कि, ‘मेक इन इंडिया’ अभियान जिस मुकाम तक पहुंचा है, उसके पीछे असल में देशवासियों की ‘बिलीव इन इंडिया’ यानी भारत पर भरोसे की भावना काम कर रही है। राजनाथ सिंह ने यह भी जोड़ा कि, विश्वविद्यालय महज पढ़ाई-लिखाई कराने वाली संस्थाएं भर नहीं होतीं, बल्कि ये व्यक्तित्व को तराशने और एक बेहतर समाज गढ़ने के केंद्र भी होती हैं।

संस्कार के बिना ज्ञान अधूरा

छात्रों को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि, आज जो डिग्री उन्हें मिल रही है, वह उनकी अंतिम मंजिल नहीं है, बल्कि जीवन में आगे बढ़ने और नई राहें तलाशने का एक जरिया भर है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि, यदि शिक्षा के साथ संस्कार न जुड़े हों, तो हासिल किया गया ज्ञान अधूरा ही रह जाता है। इसी तरह, अगर संस्कारों के साथ संवेदनशीलता की कमी हो, तो व्यक्तित्व भी पूर्ण नहीं माना जा सकता। राजनाथ सिंह के अनुसार, जब तक ज्ञान, संस्कार और संवेदनशीलता के साथ-साथ राष्ट्र व समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना न हो, तब तक शिक्षा अपने वास्तविक लक्ष्य से भटकी हुई मानी जाएगी।

‘हेड, हार्ट और हैंड’ का विकास जरूरी

रक्षा मंत्री ने विद्यार्थियों को समझाया कि वास्तविक शिक्षा वही है जो किसी व्यक्ति के मस्तिष्क, हृदय और हाथ  यानी सोच, संवेदना और कर्मशीलता तीनों का समान रूप से विकास करे। उन्होंने कहा कि, केवल सोचने-समझने की क्षमता विकसित करना पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यावहारिक कौशल, व्यावसायिक समझ और समस्याओं को सुलझाने की योग्यता भी उतनी ही आवश्यक है।

उन्होंने युवाओं से अपील की कि, वे केवल समस्याओं पर चर्चा करने वालों की श्रेणी में शामिल न रहें, बल्कि उनका हल खोजने वाले बनें। अपनी सफलता को केवल वेतन या पद के पैमाने से न आंकते हुए, समाज पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव के आधार पर परखने की सलाह भी उन्होंने दी।

इस दौरान रक्षा मंत्री ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के संघर्षपूर्ण जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें जीवन भर अन्याय और भेदभाव का सामना करना पड़ा, बावजूद इसके उन्होंने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। इसके बजाय उन्होंने शिक्षा को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया और इसी के बल पर सामाजिक बदलाव की नींव रखी।

‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो’ का दिया मंत्र

राजनाथ सिंह ने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने हमेशा शिक्षा के साथ-साथ चरित्र निर्माण को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना। उन्होंने विद्यार्थियों को डॉ. अंबेडकर के प्रसिद्ध तीन-शब्दीय मंत्र ‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित हो’ की याद दिलाते हुए कहा कि सामाजिक परिवर्तन कभी केवल संख्याबल या भीड़ जुटाने से नहीं आता। इसके लिए बड़े संकल्प, ईमानदारी, समर्पण और राष्ट्रसेवा की सच्ची भावना जरूरी होती है।

Rajnath Singh

अपने संबोधन के अंत में रक्षा मंत्री ने विश्वविद्यालय के सभागार में मौजूद युवाओं से अपेक्षा जताई कि यहां से निकलने वाले छात्र केवल अपने निजी भविष्य के बारे में न सोचें, बल्कि पूरे भारत के लिए बड़े सपने देखें। उन्होंने कहा कि आज जरूरत ऐसे युवाओं की है जो नौकरी मांगने वालों की कतार में खड़े होने के बजाय दूसरों को रोजगार देने वाले बनें।

अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों का जिक्र

अपने भाषण में रक्षा मंत्री ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रगति का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि, एक दौर ऐसा भी था जब देश में रॉकेट के पुर्जे साइकिल और बैलगाड़ियों पर लादकर ले जाए जाते थे, लेकिन आज वही भारत मंगल ग्रह तक अपनी पहुंच बना चुका है। उन्होंने कहा कि देश ने सौर मिशन की भी सफल शुरुआत कर दी है और अब भारत अपने निजी अंतरिक्ष स्टेशन तथा मानव अंतरिक्ष मिशन की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

राजनाथ सिंह ने याद दिलाया कि एक समय था जब कुछ विदेशी अखबार भारत के अंतरिक्ष अभियानों की खिल्ली उड़ाया करते थे, लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। उन्होंने कहा कि अब जब भारत कोई बात कहता है, तो पूरी दुनिया उसे गंभीरता से सुनती है। उनके अनुसार, भारत अब केवल दूसरों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करने वाला देश भर नहीं रह गया है, बल्कि वह खुद वैश्विक नियम तय करने की स्थिति में पहुंच चुका है।

 

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