
चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर शुरू हुई बहस अभी थमी भी नहीं थी कि, दाल की कीमतों पर चर्चा शूरू हो गई है। आशंका जताई जा रही है कि, आम आदमी की रसोई का एक अहम हिस्सा माने जाने वाली दालों की कीमतों में आने वाले समय में बढ़ सकती है। इस खबर से न सिर्फ आम उपभोक्ताओं बल्कि सरकार की भी चिंता बढ़ा दी है। दरअसल, घरेलू स्तर पर दालों के उत्पादन में संभावित कमी और आयात में गिरावट की वजह से बाजार में आपूर्ति को लेकर दबाव बनता दिख रहा है।
इसे भी पढ़ें- लगातार चौथे महीने थोक महंगाई दर बढ़ी, सब्जियों और दालों की कीमतों में भरी उछाल
छह महीनों में दालों का कुल आयात
आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2026 के पहले छह महीनों के दौरान देश में दालों का कुल आयात 31.80 लाख टन रहा, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए 32.27 लाख टन के आयात से करीब 1.46 प्रतिशत कम है।

इसके साथ ही एक और चिंताजनक बात यह भी सामने आई है कि, इस साल खरीफ सीजन के दौरान दालों की बुवाई का रकबा भी पिछले साल की तुलना में कम रहा है। ऐसे में अगर आने वाले समय में उत्पादन भी प्रभावित होता है, तो आगामी त्योहारी सीजन के दौरान दालों की कीमतों में उछाल देखने को मिल सकता है, जिससे आम जनता की जेब पर सीधा असर पड़ सकता है।
दालों के आयात में आई गिरावट का ब्योरा
अगर बात करें दालों के आयात की, तो जनवरी से जून 2026 के बीच देश में तुअर दाल का आयात 5.05 लाख टन रहा। इस दौरान भारत को तुअर की सबसे बड़ी आपूर्ति अफ्रीकी महाद्वीप के विभिन्न देशों से प्राप्त हुई। इनमें मोजाम्बिक ने सबसे अधिक योगदान देते हुए 1.83 लाख टन से भी ज्यादा तुअर दाल की आपूर्ति की। इसके अलावा म्यांमार से करीब 1.23 लाख टन, तंजानिया से 1.01 लाख टन और सूडान से 49,049 टन दाल का आयात हुआ।
हालांकि कुल आयात के आंकड़ों में गिरावट फिलहाल बहुत मामूली नजर आ रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि, अगर घरेलू उत्पादन पर मौसम की मार पड़ती है, तो आयात में यह छोटी सी कमी भी बाजार के लिए एक बड़ी चिंता का सबब बन सकती है। ऐसी स्थिति में दालों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ना तय माना जा रहा है।
बुवाई के रकबे में भी आई गिरावट
कृषि मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों पर नजर डालें तो 14 अगस्त तक देश भर में कुल 108.14 लाख हेक्टेयर भूमि पर दलहन फसलों की बुवाई की जा चुकी है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय अवधि के दौरान यह आंकड़ा 108.49 लाख हेक्टेयर था। इस तरह देखा जाए, तो इस साल दलहन फसलों का कुल रकबा पिछले साल की तुलना में करीब 35 हजार हेक्टेयर कम दर्ज किया गया है।
अगर व्यक्तिगत फसलों की बात करें, तो अरहर दाल की बुवाई इस साल 40.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जो पिछले साल के 42.01 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 1.69 लाख हेक्टेयर कम है। इसी तरह मूंग दाल का रकबा भी घटकर 32.05 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.37 लाख हेक्टेयर कम है। वहीं अन्य दालों की बुवाई का रकबा भी 3.14 लाख हेक्टेयर रहा, जिसमें पिछले साल के मुकाबले करीब 27 हजार हेक्टेयर की कमी देखी गई है।
अल-नीनो के असर से बढ़ी चिंता
हालांकि, दालों की बुवाई का कुल रकबा भले ही करीब 108 लाख हेक्टेयर के आसपास बना हुआ है, लेकिन अब असली चिंता फसल की पैदावार को लेकर जताई जा रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, दलहन फसलों को अपने विकास के मध्य चरण में अच्छी और पर्याप्त बारिश की सख्त जरूरत होती है, लेकिन मौसम विभाग की मानें तो अगस्त के अंतिम दिनों से लेकर सितंबर महीने के बीच अल-नीनो प्रभाव के और मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे इस दौरान बारिश के सामान्य पैटर्न में गड़बड़ी आ सकती है।
अगर बारिश का यह असंतुलन वास्तव में देखने को मिलता है, तो इसका सीधा असर प्रति हेक्टेयर पैदावार पर पड़ सकता है। इस बीच एक निजी मौसम एजेंसी ने भी करीब 70 प्रतिशत सूखे की आशंका जताई है, जिसने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। ऐसे हालात में अगर मौसम प्रतिकूल बना रहता है, तो कम बुवाई रकबा और कम उत्पादकता दोनों मिलकर दालों की कुल उपलब्धता को और घटा सकते हैं, जो त्योहारी सीजन के दौरान एक बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है।
बफर स्टॉक से मिलेगी राहत
इन तमाम चिंताओं के बीच सरकार ने आम जनता को आश्वस्त करते हुए कहा है कि, फिलहाल घबराने जैसी कोई स्थिति नहीं है, क्योंकि उसके पास दालों का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार ने करीब 30 लाख टन दालों का भंडार पहले से ही तैयार कर रखा है। इस भंडार में अरहर, उड़द, मूंग, चना और मसूर जैसी प्रमुख दालें शामिल हैं।

सरकार की तरफ से यह भी कहा गया है कि, बाजार में दालों की कीमतों पर लगातार बारीकी से नजर रखी जा रही है। अगर किसी भी दाल की कीमत में असामान्य रूप से तेजी दर्ज की जाती है, तो सरकार अपने बफर स्टॉक से एक सुनियोजित रणनीति के तहत दालें बाजार में उतारेगी, ताकि कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके। इस कदम का मुख्य उद्देश्य त्योहारी सीजन के दौरान अचानक आपूर्ति की कमी को रोकना और आम उपभोक्ताओं को राहत पहुंचाना है।
बिगड़ सकता है रसोई का बजट
आंकड़ों के अनुसार, देश में हर साल कुल दलहन उत्पादन लगभग 256.83 लाख टन होता है। इसमें चना दाल की हिस्सेदारी सबसे अधिक करीब 40 प्रतिशत है। इसके अलावा अरहर दाल की हिस्सेदारी 15 से 20 प्रतिशत के बीच रहती है, जबकि उड़द और मूंग दाल मिलाकर कुल उत्पादन में करीब 8 से 10 प्रतिशत का योगदान देते हैं।
इस साल एक साथ कई कारण सामने आए हैं, जिनमें आयात में गिरावट, प्रमुख दालों के घटते बुवाई रकबे और प्रतिकूल मौसम की आशंका शामिल है। हालांकि सरकार का मानना है कि उसका बफर स्टॉक कीमतों को नियंत्रित रखने में मददगार साबित हो सकता है, लेकिन असली सवाल अब यह है कि आगामी फसल के बाजार में आने तक कुल उत्पादन का स्तर क्या रहता है और त्योहारी सीजन में बढ़ती मांग के बीच दालों की उपलब्धता किस तरह बनी रहती है। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या दालों की कीमतें आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ेंगी या सरकार की रणनीति इस संकट को टालने में कामयाब होगी।
इसे भी पढ़ें- सड़क से लेकर रसोई तक महंगाई की मार, तेल, दूध और सोना चांदी सब हुआ महंगा



