
मुंबई। महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य में जबरन और छलपूर्वक कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर लगाम कसने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 को लागू करने संबंधी अधिसूचना जारी कर दी है। गृह विभाग की तरफ से बीते 17 अगस्त को जारी की गई इस अधिसूचना में लिखा गया है कि, यह कानून आगामी 28 अगस्त 2026 से पूरे राज्य में प्रभावी हो जाएगा। संयोग से रक्षा बंधन भी इस डेट को पड़ रहा है, जिसके चलते इस कानून को महिलाओं की सुरक्षा से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
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इस वजह से लाया गया कानून
राज्य सरकार ने अधिनियम की धारा 1(2) में दी गई शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कानून के लागू होने की तिथि निर्धारित की है। इस प्रक्रिया के तहत सरकार को यह अधिकार पहले से प्राप्त था कि, वह उचित समय पर अधिसूचना के माध्यम से कानून को अमल में ला सके, और अब इस अधिकार का प्रयोग करते हुए औपचारिक रूप से इसे लागू कर दिया गया है।

सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, इस नए कानून को बनाने के पीछे मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि, राज्य में कोई भी व्यक्ति जबरदस्ती, मानसिक या शारीरिक दबाव, धोखाधड़ी, प्रलोभन अथवा किसी भी अन्य अनुचित और अवैध तरीके से किसी दूसरे व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराने के लिए बाध्य न कर सके। सरकार का कहना है कि, बीते कुछ वर्षों में ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जिनमें बहला-फुसलाकर या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाया गया। इसी प्रवृत्ति पर रोक लगाने के इरादे से यह कानून तैयार किया गया है।
कड़ी सजा का प्रावधान
नए कानून के प्रावधानों के अनुसार, यदि जांच में यह साबित होता है कि, किसी व्यक्ति ने बल प्रयोग, छल-कपट या लालच के सहारे किसी अन्य व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करवाया है, तो दोषी पाए जाने पर उसे कड़ी सजा भुगतनी होगी। कानून में इस अपराध के लिए अधिकतम सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान रखा गया है।
इतना ही नहीं, इस अपराध को गैर-जमानती श्रेणी में रखा गया है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि, आरोपी को नियमित प्रक्रिया के तहत आसानी से जमानत नहीं मिल सकेगी। कानूनी जानकारों का मानना है कि, अपराध को गैर-जमानती बनाकर सरकार ने इसे बेहद गंभीर श्रेणी में रखा है, ताकि इसका असर व्यापक रूप से दिखे और लोगों में इसका डर बना रहे।
60 दिन पहले देनी होगी सूचना
गौरतलब है कि, यह कानून केवल जबरन कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर ही रोक नहीं लगाता, बल्कि उन मामलों के लिए भी एक स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है, जिनमें कोई व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपना धर्म बदलना चाहता है। कानून में प्रावधान किया गया है कि, यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने का निर्णय लेता है, तो उसे इसके लिए निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तावित धर्म परिवर्तन से कम से कम 60 दिन पहले औपचारिक आवेदन प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा।
आवेदन प्राप्त होने के बाद संबंधित प्राधिकारी नियमों के अनुसार, आगे की प्रक्रिया पूरी करेगा, जिसके बाद ही धर्म परिवर्तन को वैधानिक मान्यता मिल सकेगी। इस प्रावधान का मकसद यह सुनिश्चित करना बताया जा रहा है कि, धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रहे और इसमें किसी प्रकार की गोपनीयता या जल्दबाजी न हो, जिससे बाद में इसे लेकर कोई कानूनी विवाद खड़ा न हो।
मां के धर्म से होगी बच्चे की पहचान
इस नए कानून का जो प्रावधान इस समय सबसे अधिक सुर्खियों में है, वह उन मामलों से संबंधित है जिनमें धोखे, छल अथवा केवल धर्म परिवर्तन कराने की नीयत से विवाह किए जाने के आरोप लगते हैं। कानून में ऐसे विवाहों की वैधानिक स्थिति और उनसे उत्पन्न होने वाले कानूनी प्रभावों को लेकर विशेष प्रावधान रखे गए हैं।
सरकार की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक, यदि जांच या अदालती प्रक्रिया में यह पाया जाता है कि, कोई विवाह वास्तव में प्रेम या पारिवारिक सहमति के बजाय केवल दूसरे पक्ष का धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से किया गया था, तो ऐसी स्थिति में उस विवाह से जन्म लेने वाली संतान की धार्मिक पहचान तय करने के लिए मां के विवाह-पूर्व मूल धर्म को आधार माना जाएगा। यानी बच्चे को कानूनी तौर पर उसी धर्म से जोड़कर देखा जाएगा, जो विवाह से पहले उसकी मां का मूल धर्म रहा होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि, यह प्रावधान इस कानून का सबसे संवेदनशील और जटिल हिस्सा है, क्योंकि इसमें विवाह की मंशा साबित करने और बच्चे की धार्मिक पहचान तय करने जैसे मुद्दे शामिल हैं, जो भविष्य में अदालतों के समक्ष कानूनी बहस का विषय बन सकते हैं।
संजय निरुपम ने किया स्वागत
इस नए कानून को लेकर राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। शिवसेना नेता संजय निरुपम ने इस कानून का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम का मूल उद्देश्य जबरदस्ती, मानसिक दबाव और लालच के जरिए कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है। निरुपम ने यह भी बताया कि यह कानून रक्षाबंधन के पावन अवसर पर लागू होने जा रहा है और इसे विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।

अपनी प्रतिक्रिया में संजय निरुपम ने आरोप लगाया कि, कई मामलों में शादी का झांसा देकर महिलाओं को बहला-फुसलाकर उनका धर्म परिवर्तन करा लिया जाता है और बाद में उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है, जिससे वे न तो अपने मूल परिवार में सम्मानजनक स्थिति में रह पाती हैं और न ही उन्हें नए परिवेश में उचित अधिकार मिल पाते हैं। उन्होंने कहा कि, यह कानून ऐसी ही परिस्थितियों में फंसी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने और उनके मूल धर्म से जुड़ी कानूनी स्थिति को स्पष्ट रूप से सुरक्षित रखने के इरादे से लाया गया है।
राज्य में तेज हुई चर्चा
निरुपम के अनुसार, इस कानून में विवाह से जन्म लेने वाली संतानों के धर्म से जुड़े जो प्रावधान शामिल किए गए हैं, वे भी इसी सोच का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस तरह के मजबूत कानूनी ढांचे के जरिए महाराष्ट्र की बेटियों और महिलाओं के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही है।
कुल मिलाकर, महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 को लेकर राज्य में विभिन्न स्तरों पर चर्चा तेज हो गई है। जहां सरकार और सत्तारूढ़ दल के नेता इसे महिला सुरक्षा और सामाजिक अनुशासन की दिशा में एक जरूरी कदम बता रहे हैं, वहीं यह देखना बाकी है कि 28 अगस्त से इसके लागू होने के बाद जमीनी स्तर पर इसका क्रियान्वयन किस तरह किया जाता है और अदालतों में इसे किस रूप में परखा जाता है।
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