अखिलेश यादव को क्यों सताने लगी ब्राह्मणों की चिंता, PDA में ‘पी’ का मतलब ‘पंडित’ तो पिछड़े कहां गए?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घड़ियां जैसे-जैसे नजदीक आ रही हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक पार्टियां भी कमर कस रही हैं। यहां जोड़-तोड़ और जातीय समीकरण की राजनीति फिर तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल अलग-अलग तरीकों से सभी जातियों को परिभाषित करके मतदाताओं को अपने पाले में लाने कवायद में जुट गये हैं।

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लखनऊ में दिखी हलचल

हाल ही में बिहार की बांकीपुर सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने कई दलों को अपनी रणनीतियों पर दोबारा विचार करने पर मजबूर कर दिया है। इसी बीच सूबे की राजधानी लखनऊ में भी बड़ी राजनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। यहां सपा मुखिया अखिलेश यादव ने पीडीए में ब्राह्मणों को भी एड कर लिया है।

AKHILESH YADAV

समाजवादी पार्टी के कार्यालय पर बीते दिन यानी पांच अगस्त को हुए ब्राह्मण सम्मेलन ने उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। अब तक ज्यादातर सियासी दल अपने चुनाव प्रचार को पिछड़े वर्ग की जातियों के इर्द-गिर्द केंद्रित करते रहे हैं, लेकिन हाल की एक चुनावी घटना ने इस रणनीति में बदलाव की जरूरत को उजागर कर दिया है। अब राजनीतिक दल पिछड़ी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ-साथ सवर्ण समुदाय, खासकर ब्राह्मण और ठाकुर वोट बैंक पर भी विशेष ध्यान देने लगे हैं।

बांकीपुर उपचुनाव ने बदला नजरिया

इस पूरे बदलाव के पीछे बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुआ उपचुनाव एक बड़ी वजह माना जा रहा है। इस सीट पर पिछड़ी और दलित जातियों को केंद्र में रखकर बनाई गई पारंपरिक चुनावी रणनीतियां कारगर साबित नहीं हो सकीं। दिलचस्प बात यह रही कि, यह सीट केंद्र और बिहार की सत्ताधारी पार्टी भाजपा के अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के गृह क्षेत्र में आती है, फिर भी पार्टी को यहां हार का सामना करना पड़ा।

इस उपचुनाव में पूर्व चुनावी रणनीतिकार और जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की पार्टी ने सबको चौंकाते हुए जीत हासिल की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, इस नतीजे के पीछे एक बड़ी वजह भरत तिवारी के एनकाउंटर की घटना रही, जिसके बाद ब्राह्मण समुदाय में गहरा आक्रोश देखा गया।

ब्राह्मणों को साधने में जुटी सपा

इसी नाराजगी का असर यह हुआ कि, भाजपा को अपने अध्यक्ष नितिन नवीन की परंपरागत मानी जाने वाली बांकीपुर सीट गंवानी पड़ी। इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी सीधा असर डाला है। यही वजह है कि, अब समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मण समुदाय को अपने पाले में लाने की कोशिशों में जुट गई है, जबकि पार्टी के मूल पीडीए फॉर्मूले में सवर्णों के लिए कोई खास जगह नहीं रही है।

जनेश्वर मिश्र जयंती बनी मंच

उत्तर प्रदेश में सियासी दलों के लिए अब ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण जातियों का वोट बैंक भी उतना ही अहम होता जा रहा है, जितना पिछड़ा और दलित वर्ग। इसी बदलती रणनीति के संकेत बुधवार को लखनऊ में देखने को मिले, जब समाजवादी नेता और पूर्व रेल मंत्री जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। जनेश्वर मिश्र उत्तर प्रदेश के जाने-माने ब्राह्मण नेता माने जाते थे और इस कार्यक्रम को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ब्राह्मण मतदाताओं तक पहुंचने के एक मंच के रूप में इस्तेमाल किया।

इस कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने ब्राह्मण समुदाय को अपने पक्ष में लाने की स्पष्ट कोशिश की। समाजवादी पार्टी लंबे समय से पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक की रणनीति पर आगे बढ़ती रही है, लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने पीडीए के ‘पी’ अक्षर को नए तरीके से परिभाषित करते हुए इसका अर्थ  ‘पंडित’ बताया। इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

एनकाउंटर के मुद्दे पर BJP को घेरा

सपा मुखिया ने अपने संबोधन में कानपुर के कुख्यात अपराधी विकास दुबे के एनकाउंटर का जिक्र करते हुए भाजपा सरकार पर ब्राह्मण समुदाय को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। उन्होंने इस मामले पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि, अगर इस घटना से जुड़ी सैटेलाइट इमेज निकाली जाए, तो यह साफ हो जाएगा कि, वास्तव में गाड़ी किसने पलटाई थी। यह बयान भाजपा सरकार पर सीधा राजनीतिक हमला माना जा रहा है, जिसके जरिए अखिलेश यादव ब्राह्मण समुदाय में मौजूद असंतोष को अपनी पार्टी की तरफ मोड़ने की कोशिश करते नजर आए।

ब्राह्मणों की सच्ची हितैषी है सपा

अखिलेश यादव ने इस मौके पर और भी कई उदाहरण दिए, जिनके जरिए उन्होंने भाजपा सरकार को ब्राह्मण विरोधी और अपनी पार्टी को ब्राह्मण हितैषी साबित करने की कोशिश की। उन्होंने प्रयागराज में शंकराचार्य के बिना स्नान किए लौटने की घटना और वहां बटुकों के साथ हुई कथित पिटाई की घटना का भी जिक्र किया, इसे उन्होंने ब्राह्मण समुदाय के अपमान से जोड़कर पेश किया।

इसके अलावा अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक और समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए मंत्री मनोज पांडेय का नाम लेते हुए यह बताने की कोशिश की कि, ये नेता वास्तव में ब्राह्मण समुदाय के सच्चे हितैषी नहीं हैं। वहीं समाजवादी पार्टी को ब्राह्मणों का असली हितैषी साबित करने के लिए उन्होंने याद दिलाया कि, पार्टी की सरकार के दौरान ही लखनऊ के लोकभवन में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जबकि भाजपा ने अटल के नाम पर कोई ठोस काम नहीं किया।

ब्राह्मणों को साध रही सपा

आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने की कोशिश में जुटी समाजवादी पार्टी अब उस ब्राह्मण समुदाय को साधने में जुट गई है, जिसका उल्लेख उसके मूल पीडीए फॉर्मूले में नहीं था। पार्टी अब तक पीडीए को पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम समुदाय के रूप में परिभाषित करती रही है, लेकिन अब पार्टी पीडीए के ‘पी’ का अर्थ ‘पंडित’ बताने लगी है, जिससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर ‘पी’ का मतलब पंडित है, तो फिर ‘पिछड़ा’ वर्ग इस फॉर्मूले में कहां खड़ा है।

Akhilesh Yadav

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि, बिहार में नवंबर 2025 में हुए विधानसभा चुनाव में भले ही प्रशांत किशोर की पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिली थी, लेकिन उसके ठीक आठ महीने बाद हुए बांकीपुर उपचुनाव में मिली जीत ने न सिर्फ सत्तापक्ष, बल्कि विपक्ष के अन्य दलों की आंखें भी खोल दी हैं। यह नतीजा भाजपा के लिए भी एक स्पष्ट चेतावनी माना जा रहा है।

बांकीपुर चुनाव ने बदली रणनीति

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब महज छह से सात महीने का ही समय शेष बचा है। ऐसे में यह समझना जरूरी हो गया है कि, प्रदेश के जातीय समीकरण उतने सीधे और सतही नहीं हैं, जितने ऊपर से नजर आ रहे हैं। किसी भी जाति की जनसंख्या का अनुपात अकेले यह तय नहीं कर सकता कि, चुनावी नतीजे किसके पक्ष में जाएंगे।

यहां गौर करने वाली बात ये है कि, राजनीतिक दल लंबे समय से सवर्ण जातियों को नजरअंदाज करते रहें या यह मानकर चलते रहे हैं कि, अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वाले इन समुदायों में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की बहुत अधिक क्षमता नहीं है, लेकिन बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने इस धारणा को काफी हद तक चुनौती दी है और अब यही वजह है कि, यूपी के सियासी दल अपनी रणनीतियों में नए सिरे से बदलाव करने पर मजबूर हो रहे हैं।

 

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