
नई दिल्ली। विदेशी कच्चे तेल पर देश की निर्भरता को न्यूनतम स्तर पर लाने और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया है। खबर है कि, भारत अपने समुद्री क्षेत्रों की गहराइयों में छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के अकूत भंडारों को तलाशने जा रहा है। इस विशाल योजना के तहत भारत के अपतटीय और अल्ट्रा-डीपवॉटर क्षेत्रों में 60 गहरे समुद्री कुओं की ड्रिलिंग की जाएगी।
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विदेशी और घरेलू निजी कंपनियों को अत्यधिक जोखिम भरे इस क्षेत्र में आकर्षित करने के लिए सरकार ने ऐतिहासिक वित्तीय प्रोत्साहन का ऐलान किया है। योजना के तहत ड्रिलिंग के दौरान होने वाले भारी भरकम वित्तीय जोखिम को कम करने के लिए प्रति कुआं 650 करोड़ रूपये तक की बजटीय सहायता दी जाएगी। भारत के उड्डयन और ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है।
क्यों उठाया जा रहा जोखिम
गहरे और अति-गहरे (अल्ट्रा-डीपवॉटर) समुद्र में हाइड्रोकार्बन की खोज तकनीक, समय और पूंजी, तीनों ही दृष्टिकोण से विश्व के सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में से एक मानी जाती है।
खर्च का खतरा
समुद्र के नीचे कई किलोमीटर की गहराई तक ड्रिलिंग करने की लागत बेहद अधिक होती है।
सफलता पर शक
करोड़ों रुपये फूंकने और महीनों की मेहनत के बाद भी यह गारंटी नहीं होती कि, कुएं से व्यावसायिक रूप से लाभप्रद मात्रा में तेल या गैस का भंडार मिलेगा ही।
वैश्विक कंपनियों की झिझक
इसी भारी वित्तीय जोखिम के कारण अब तक वैश्विक स्तर की बड़ी ऊर्जा कंपनियां भारत के गहरे समुद्री ब्लॉकों में बड़े पैमाने पर बोली लगाने से हिचकिचाती रही हैं।

सरकार की इस नई प्रोत्साहन नीति से कंपनियों का आर्थिक जोखिम काफी हद तक कम हो जाएगा। जब प्रति कुआं ₹650 करोड़ तक की वित्तीय भरपाई सरकार द्वारा सुनिश्चित होगी, तो दिग्गज देशी और विदेशी कंपनियां अपनी अत्याधुनिक तकनीक और भारी निवेश के साथ भारत के अपतटीय क्षेत्रों में उतरने के लिए प्रोत्साहित होंगी।
…तो कम हो जाएगी निर्भरता
वर्तमान में भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा अन्य देशों से आयात करता है। इसके अलावा, देश की प्राकृतिक गैस की लगभग आधी मांग भी एलएनजी आयात के माध्यम से पूरी की जाती है।
विदेशी मुद्रा का भारी बोझ
हर साल कच्चे तेल और एलएनजी के आयात पर भारत को अरबों डॉलर की कीमती विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।
वैश्विक भू-राजनीति का असर
मध्य पूर्व और यूरोप में जारी भू-राजनीतिक तनावों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बेहद अस्थिर रहती हैं, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, मुद्रास्फीति और आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है।
सरकार का प्राथमिक लक्ष्य घरेलू स्तर पर अन्वेषण और उत्पादन को तेजी से बढ़ाकर आयात पर इस भारी निर्भरता को कम करना है। यदि इस अभियान के माध्यम से नए भंडार खोज लिए जाते हैं, तो भारत न केवल विदेशी मुद्रा की बचत कर सकेगा बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकटों से भी सुरक्षित रह सकेगा।
किन समुद्री इलाकों में चलेगा अभियान
विशेषज्ञों और भू-वैज्ञानिकों के अनुसार भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र में व्यापक समुद्री तट रेखा मौजूद है, जहां गहरे समुद्र की तलहटी में हाइड्रोकार्बन के प्रचुर भंडार छिपे होने की प्रबल संभावना है।
यह ‘समुद्र मंथन’ अभियान मुख्य रूप से दो प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित रहेगा
पूर्वी अपतटीय बेसिन: बंगाल की खाड़ी से सटे कृष्णा-गोदावरी बेसिन और कावेरी बेसिन के गहरे समुद्री इलाके।
पश्चिमी अपतटीय बेसिन: अरब सागर में मुंबई हाई के गहरे और अल्ट्रा-डीपवॉटर क्षेत्र।
इन क्षेत्रों में आधुनिक सिस्मिक सर्वे डेटा के आधार पर 60 संभावित लोकेशनों को चिन्हित कर ड्रिलिंग की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाएगा।
बदलेगी ऊर्जा की तस्वीर
सरकार की इस योजना का सीधा फायदा देश की महारत्न सार्वजनिक उपक्रम कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन और ऑयल इंडिया लिमिटेड के साथ-साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी निजी घरेलू कंपनियों और वैश्विक पेट्रोलियम दिग्गजों को मिलेगा।

गहरे समुद्र में खोज के लिए जिस अति-आधुनिक तकनीक, शिपिंग वेसल्स और डीपवॉटर रिग्स की आवश्यकता होती है, वे अब तक भारत में सीमित मात्रा में उपलब्ध रहे हैं। वित्तीय सहायता मिलने से कंपनियां इन उन्नत तकनीकों को आसानी से लीज पर ले सकेंगी या खरीद सकेंगी। इससे भारत के अपतटीय ब्लॉकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और खोज कार्य में तेजी आएगी।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि, यद्यपि इस योजना का परिणाम दिखने में कुछ वर्षों का समय लगेगा, फिर भी यह भारतीय ऊर्जा इतिहास का एक टर्निंग प्वाइंट सिद्ध हो सकता है।
आने वाले वर्षों में यदि इन 60 कुओं में से 20-30 प्रतिशत कुओं में भी सफलता मिलती है, तो भारत के दैनिक तेल और गैस उत्पादन में भारी उछाल आएगा। यह पहल न केवल भारत को ‘ऊर्जा आत्मनिर्भरता’ की ओर ले जाएगी, बल्कि देश में विशाल रोजगार, आधारभूत संरचना और तकनीकी विकास के नए द्वार भी खोलेगी। फिलहाल, नागरिक उड्डयन, जहाजरानी और पेट्रोलियम मंत्रालय मिलकर इस महत्वाकांक्षी परियोजना को धरातल पर उतारने की तैयारियों में जुट गए हैं।
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