सिर्फ 7 रुपये से शुरू हुआ सफर, ऐसे बने नसीरुद्दीन शाह बॉलीवुड के बादशाह

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी असाधारण अभिनय क्षमता वाले कलाकारों की चर्चा होती है, नसीरुद्दीन शाह का नाम सबसे पहले लिया जाता है। फिल्मी परिवार से ताल्लुक न होने के बावजूद उन्होंने सिर्फ अपनी मेहनत और लगन के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जिसे पाना हर कलाकार का सपना होता है। हालांकि, उनका ये सफर उतना आसान नहीं था, जितना शानदार नजर आता है।

इसे भी पढ़ें- बॉलीवुड में नहीं चला सिक्का, अब बिजनेस से कमा रहीं करोड़ों, जानें कितनी अमीर हैं रिया चक्रवर्ती

संघर्ष के दिनों में एक वाकया ऐसा भी आया, जब उन्होंने अपने आदर्श और उस दौर के महानतम अभिनेता दिलीप कुमार से मार्गदर्शन मांगा, तो उन्हें अभिनय छोड़कर घर लौट जाने और पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी गई। यह किसी भी युवा सपने देखने वाले कलाकार के लिए हतोत्साहित करने वाला पल हो सकता था, लेकिन नसीर ने हार मानने के बजाय अपने रास्ते पर डटे रहना चुना और आगे चलकर यही फैसला उनके करियर की सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ।

बाराबंकी से शुरू हुआ सफर

नसीरुद्दीन शाह का जन्म 20 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ था। उनका परिवार पढ़ाई-लिखाई और स्थिर नौकरी को बेहद अहमियत देने वाला परिवार था।

Naseeruddin Shah

पिता अली मोहम्मद शाह चाहते थे कि, नसीर भी अपने भाइयों की तरह किसी सम्मानजनक पेशे में जाएं और एक सुरक्षित जिंदगी जिएं, लेकिन नसीर का रुझान बचपन से ही किताबों से ज्यादा क्रिकेट, फिल्मों और नाटकों की तरफ था। स्कूली दिनों में ही उनके भीतर अभिनय के प्रति एक गहरी दिलचस्पी पनपने लगी थी, जो आगे चलकर उनकी जिंदगी की दिशा तय करने वाली थी।

परिवार की नाराजगी के बावजूद चुना अपना रास्ता

अपने भीतर के इस जुनून को गंभीरता से आगे बढ़ाने के लिए नसीरुद्दीन शाह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद सीधे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का रुख किया। यह फैसला उनके परिवार को रास नहीं आया। पिता को उम्मीद थी कि बेटा कोई परंपरागत और सुरक्षित करियर अपनाएगा, लेकिन नसीर के मन में अब तक अभिनय को लेकर स्पष्टता आ चुकी थी।

परिवार के विरोध के बावजूद उन्होंने अपने सपने का साथ नहीं छोड़ा। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से प्रशिक्षण के बाद उन्होंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में भी दाखिला लिया, जहां उन्होंने अभिनय की बारीकियों को और गहराई से समझा और निखारा।

महज साढ़े सात रुपये में मिला था पहला काम

फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने की शुरुआती लड़ाई आसान नहीं थी। संघर्ष के उन दिनों में नसीरुद्दीन शाह ने छोटे-मोटे किरदार निभाने से शुरुआत की। साल 1967 में उन्हें पहला मौका फिल्म ‘अमन’ में मिला, जिसमें वे एक जूनियर या एक्स्ट्रा कलाकार के तौर पर नजर आए। इस काम के बदले उन्हें केवल 7.50 रुपये का पारिश्रमिक मिला था। उस वक्त वे महज सोलह साल के एक किशोर थे, जिनके सामने पूरा संघर्ष अभी बाकी था।

दिलीप कुमार की चौंकाने वाली सलाह

इसी संघर्षपूर्ण दौर में नसीरुद्दीन शाह की मुलाकात दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार से हुई। दिलीप कुमार का उनके परिवार से पहले से जान-पहचान का रिश्ता था। नसीर खुद भी उनका बहुत सम्मान करते थे। जब नसीर ने उनसे अपनी अभिनय की महत्वाकांक्षा साझा की, तो दिलीप कुमार ने उन्हें सुझाव दिया कि उन्हें वापस घर जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करनी चाहिए।

एक ऐसे कलाकार से यह सलाह सुनना, जिसे वे अपना आदर्श मानते थे, नसीर के लिए स्वाभाविक रूप से निराशाजनक और हैरान करने वाला अनुभव रहा होगा, लेकिन उन्होंने इस झटके को अपने आत्मविश्वास पर हावी नहीं होने दिया। आने वाले वर्षों में उन्होंने अपने काम के जरिए यह साबित कर दिया कि, अभिनय भी उतना ही गंभीर और सम्मानजनक पेशा हो सकता है, जितना कोई और करियर।

श्याम बेनेगल की फिल्म ने बदली तकदीर

नसीरुद्दीन शाह को असली पहचान साल 1975 में मिली, जब निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म ‘निशांत’ रिलीज हुई। इस फिल्म ने न सिर्फ नसीर को बल्कि समांतर सिनेमा की पूरी लहर को एक नई पहचान दी।

Naseeruddin Shah

इसके बाद उन्होंने ‘आक्रोश’, ‘स्पर्श’, ‘मंडी’, ‘अर्ध सत्य’, ‘मिर्च मसाला’ और ‘जाने भी दो यारों’ जैसी दमदार और यादगार फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों के जरिए उन्होंने भारतीय समांतर सिनेमा को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई और खुद को एक गंभीर, विचारशील अभिनेता के तौर पर स्थापित किया।

कमर्शियल सिनेमा में भी बनाई अलग पहचान

समय के साथ नसीरुद्दीन शाह ने खुद को सिर्फ आर्ट फिल्मों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि व्यावसायिक सिनेमा में भी अपनी अलग जगह बनाई। ‘कर्मा’, ‘मोहरा’, ‘सरफरोश’, ‘इकबाल’, ‘ए वेडनेसडे’ और ‘द डर्टी पिक्चर’ जैसी फिल्मों में उन्होंने विविध किरदार निभाए, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा ही थी कि वे नायक, खलनायक और गंभीर चरित्र भूमिकाओं में समान रूप से सहज नजर आए और हर किरदार में अपनी अलग छाप छोड़ी।

कई पुरस्कारों से नवाजे गए

नसीरुद्दीन शाह की असाधारण अदाकारी को कई बार राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया। उन्हें तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया। फिल्म ‘स्पर्श’, ‘पार’ और ‘इकबाल’ के लिए। इसके अलावा भारत सरकार ने उनके योगदान को देखते हुए साल 1987 में उन्हें पद्मश्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया, जो भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान की मान्यता है।

रंगमंच से भी गहरा नाता

फिल्मों के अलावा नसीरुद्दीन शाह का नाता रंगमंच से भी बेहद गहरा रहा है। उन्होंने अपनी थिएटर संस्था के माध्यम से मंच को लगातार समय दिया और नाट्य कला को जीवित रखने में योगदान दिया। छोटे पर्दे पर भी उनके काम को खूब सराहा गया। खासकर ‘मिर्जा गालिब’ और ‘भारत एक खोज’ जैसे धारावाहिकों में उनकी अदाकारी को दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने दिल खोलकर पसंद किया।

आज जब नसीरुद्दीन शाह की यात्रा को पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो यह साफ नजर आता है कि उनकी कामयाबी किसी संयोग का नतीजा नहीं थी।

 

इसे भी पढ़ें- बॉलीवुड न्यूज: ‘राका’ बन कर बॉक्स ऑफिस पर बवाल काटेंगे अल्लू अर्जुन, ‘पुष्पा’से भी है कनेक्शन

Related Articles

Back to top button