ईरान-अमेरिका तनाव से भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में, 140-150 रुपए प्रति ली. हो सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम

नई दिल्ली। पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच विश्व अर्थव्यवस्था उथल-पुथल का शिकार हो रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों और ईरान की प्रतिक्रिया के चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया गया है। यह जलडमरूमध्य विश्व के ऊर्जा परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण चोक पॉइंट है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है।

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भारत के लिए चिंताजनक स्थिति

भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। भारत के प्रमुख व्यापारिक एवं औद्योगिक संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने इस विकास पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

Hormuz Crisis

सीटीआई के चेयरमैन बृजेश गोयल ने कहा कि, यदि होर्मुज का रास्ता लंबे समय तक बंद रहा तो 1970 के दशक के तेल संकट के बाद सबसे बड़ा ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। इससे न केवल तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, बल्कि पूरे अर्थतंत्र पर बहु-आयामी प्रभाव पड़ेगा।

दुनिया के लिए अहम है होर्मुज

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। यह संकीर्ण जलमार्ग ओमान और ईरान के बीच स्थित है। यहां से रोजाना लाखों बैरल कच्चा तेल, LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद विश्व बाजार में पहुंचते हैं। सऊदी अरब, यूएई, इराक, कुवैत और ईरान जैसे देशों का अधिकांश तेल निर्यात इसी रास्ते होता है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए यह रूट अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश की लगभग 85 फीसदी कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी होती है, जिसमें से बड़ा हिस्सा होर्मुज से गुजरता है। सीटीआई के अनुसार, भारत का करीब 60 फीसदी कच्चा तेल और 40 फीसदी एलएनजी इसी मार्ग से आता है। यदि यह सप्लाई रुक गई तो ऊर्जा की कमी सीधे अर्थव्यवस्था की रीढ़ को प्रभावित करेगी।

तेल-संकट- सबसे बड़ा झटका

होर्मुज बंद होने से सबसे पहले और सबसे गंभीर प्रभाव तेल आपूर्ति पर पड़ेगा। इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आने वाले आयात ठप हो जाएंगे। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं और अब 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। प्रत्येक एक डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल सालाना करीब 1.5 बिलियन डॉलर बढ़ जाता है।

अगर होर्मुज बंद हुआ तो देश में पेट्रोल की कीमतें 140 से 150 रूपये प्रति लीटर और डीजल 130 रूपये प्रति लीटर से ऊपर जा सकती हैं। इससे परिवहन लागत बढ़ेगी, जो हर वस्तु की कीमत को प्रभावित करेगी। वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध हैं, जैसे सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और यूएई की फुजैराह पाइपलाइन, लेकिन इनकी क्षमता कुल मांग का सिर्फ 20 प्रतिशत ही कवर कर पाती है।

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टैंकरों को बार-बार अफ्रीका का चक्कर लगाकर लाना पड़ेगा, जिसमें 15-20 दिन अतिरिक्त लगेंगे और किराया तीन गुना बढ़ जाएगा। बीमा लागत भी युद्ध जोखिम के कारण कई गुना बढ़ सकती है। इससे न केवल आयात महंगा होगा, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला में देरी से स्टॉक आउट की स्थिति पैदा हो सकती है।

ये सेक्टर भी होंगे प्रभावित

एविएशन सेक्टर: एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमत बढ़ने से हवाई टिकट 40-50 फीसदी महंगे हो सकते हैं। इससे यात्रा और पर्यटन प्रभावित होगा।

विनिर्माण और ऑटोमोबाइल: पेंट, टायर, प्लास्टिक जैसे उत्पाद पेट्रोलियम डेरिवेटिव्स पर निर्भर हैं। मारुति, एशियन पेंट्स जैसी कंपनियों की उत्पादन लागत 25 फीसदी तक बढ़ सकती है, जिसका असर कीमतों और मुनाफे पर पड़ेगा।

कृषि और उर्वरक: एलएनजी महंगा होने से यूरिया उत्पादन प्रभावित होगा। सरकार की सब्सिडी बढ़ेगी, लेकिन किसानों की खेती लागत बढ़ने से फसलें महंगी होंगी। खाद्य सुरक्षा पर दबाव पड़ेगा।

शिपिंग और निर्यात-आयात: फ्रेट दरें 200-300 फीसदी बढ़ सकती हैं। इससे भारतीय निर्यात महंगा हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी। ट्रांसपोर्ट लागत दोगुनी होने से छोटे व्यापारी और ट्रेडर्स बुरी तरह प्रभावित होंगे।

अन्य क्षेत्र: बिजली उत्पादन, रसायन उद्योग और दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर भी असर पड़ेगा।

महंगाई ब्लास्ट

मार्च-अप्रैल 2026 में भारत की रिटेल महंगाई दर 3.4 फीसदी रही थी। फूड और बेवरेजेज में 3.71 फीसदी, पान-तंबाकू में 4.23 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई।

CTI महासचिव रमेश आहूजा और वरिष्ठ उपाध्यक्ष दीपक गर्ग के अनुसार, यदि संकट लंबा चला तो महंगाई 5 प्रतिशत से ऊपर पहुंच सकती है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जो हर वस्तु की कीमत में जुड़ जाएगी। खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ेगी, जिसका गरीब और मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। आरबीआई की मौद्रिक नीति पर दबाव बढ़ेगा और ब्याज दरों में बदलाव की संभावना है।

बढ़ेंगी ऑपरेशनल चुनौतियां 

भारत के पास लगभग 74 दिन का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व है। SPR (स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व) में विशाखापत्तनम, मंगलौर और पादुर में 5.33 मिलियन मीट्रिक टन भंडार है, जो मात्र 9 दिन की आयात जरूरत के बराबर है। लंबे संकट में यह अपर्याप्त साबित होगा।

भारतीय नौसेना अरब सागर में सक्रिय है, लेकिन युद्ध की स्थिति में ऑपरेशनल चुनौतियां बढ़ेंगी। चाबहार पोर्ट, जो भारत का ईरान के साथ महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है, भी होर्मुज के निकट होने से प्रभावित होगा। बीमा लागत 10 गुना बढ़ सकती है।

क्या हैं विकल्प

रूस से आयात: वर्तमान में 35 फीसदी तेल रूस से आ रहा है, जो होर्मुज से नहीं गुजरता, लेकिन रूस अतिरिक्त सप्लाई सीमित रूप से ही दे पाएगा।

वैकल्पिक स्रोत: अमेरिका, गुयाना, ब्राजील, अफ्रीकी देशों (अंगोला, नाइजीरिया) से आयात बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इन रूट्स में 40 दिन लगते हैं, जबकि होर्मुज रूट मात्र 5 दिन का है। इससे लागत बढ़ेगी।

करनी पड़ सकती है ईधन सरंक्षण की अपील

भारत पहले से ही 40 देशों से तेल आयात कर रहा है। हाल के वर्षों में वैकल्पिक मार्गों का उपयोग बढ़ा है, लेकिन पूर्ण रूप से निर्भरता कम करना चुनौतीपूर्ण है।

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सरकार को ईंधन संरक्षण की अपील करनी पड़ रही है। रिफाइनरी ऑपरेटिंग रेट्स समायोजित करने, स्टॉक मैनेजमेंट और डिप्लोमेसी के जरिए संकट से निपटने की कोशिशें जारी हैं।

आ सकती है मुद्रास्फीति-मंदी जैसी स्थिति 

यह संकट भारत को ऊर्जा सुरक्षा की कमजोरियों की याद दिलाता है। दीर्घकालिक समाधान में नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर, विंड) को बढ़ावा, घरेलू उत्पादन (खासकर पूर्वोत्तर और offshore क्षेत्रों) को प्रोत्साहन, रणनीतिक रिजर्व बढ़ाना और विविध आयात स्रोत शामिल हैं। सीटीआई चेयरमैन बृजेश गोयल ने सरकार से तत्काल कदम उठाने की अपील की है, जिसमें सब्सिडी प्रबंधन, कीमत नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग शामिल है।

आम नागरिकों को भी ईंधन बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग और अनावश्यक यात्रा कम करने की जरूरत है। होर्मुज संकट न केवल तेल और महंगाई का मुद्दा है, बल्कि भारत की आर्थिक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और विकास गति को चुनौती दे रहा है। यदि यह लंबा चला तो जीडीपी वृद्धि प्रभावित होगी, रुपये पर दबाव बढ़ेगा और मुद्रास्फीति-मंदी जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

 

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