
तेहरान। मिडिल ईस्ट की धरती इस वक्त बारूद के उस ढेर पर खड़ी है, जहां हर धमाका एक नए और भीषण युद्ध की आहट दे रहा है। इजराइल ने एक बार फिर ईरान के सत्ता गलियारों में कोहराम मचाते हुए सर्वोच्च सुरक्षा परिषद के प्रमुख अली लारिजानी को एक सटीक एयरस्ट्राइक में मार गिराया है। यह हमला ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के महज सत्रह दिन बाद हुआ है, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है।
इसे भी पढ़ें-उत्तराखंड में भी दिखा मिडिल ईस्ट संकट का असर, गहराया बिजली संकट, अघोषित कटौती शुरू
क्या कमजोर हो रहा ईरान

इजराइल डिफेंस फोर्स ने खुफिया जानकारी के आधार पर लारिजानी को उस वक्त निशाना बनाया जब वे अपनी बेटी के घर पर मौजूद थे। लारिजानी को ईरान का दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता था और वे खामेनेई के इतने करीबी थे कि पूरे देश के सैन्य समन्वय और रणनीतिक फैसलों की कमान उन्हीं के हाथों में थी।
खामेनेई के बाद लारिजानी की मौत को इजराइल अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रहा है। खुद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बड़े-बड़े दावे किए और इसे ईरान की कमर तोड़ने वाला प्रहार बताया, लेकिन युद्ध के जानकारों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के बीच अब एक बड़ा सवाल उठने लगा है। सवाल यह है कि क्या वास्तव में शीर्ष नेताओं की इन हत्याओं से ईरान कमजोर हो रहा है या फिर यह पूरी प्रक्रिया अंततः ईरान के इस्लामिक गणराज्य के लिए ही फायदेमंद साबित होने वाली है।
खत्म हो हुए कई कद्दावर नेता
इजराइल और अमेरिका ने युद्ध के शुरुआती दौर में ही अयातुल्ला खामेनेई, आईआरजीसी प्रमुख मोहम्मद पाकपुर, रक्षा सलाहकार अली शमखानी और सैन्य प्रमुख अब्दुल मोसावी जैसे कद्दावर चेहरों को खत्म कर दिया था। इसके बाद सैन्य सचिव मोहम्मद शिराजी और खुफिया प्रमुख सालेह असादी भी मारे गए। यहां तक कि, जंग के दौरान ईरान के दो रक्षा मंत्रियों, अजीज नासिरज़ादेह और माजिद इब्न अल-रेज़ा की भी हत्या की जा चुकी है, जिसके बाद अब अली लारिजानी का नाम इस सूची में जुड़ गया है। इतने बड़े झटकों के बावजूद ईरान की प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था के न चरमराने के पीछे कई गहरे कारण छिपे हैं।

जानकारों का मानना है कि, ईरान में बहुत पहले से ही एक बेहद मजबूत सक्सेसर फॉर्मूला यानी उत्तराधिकार की व्यवस्था लागू है। वरिष्ठ खामेनेई ने अपने जीवनकाल में ही इस योजना को मंजूरी दी थी, जिसके तहत हर महत्वपूर्ण पद के लिए चार उत्तराधिकारी पहले से ही तैयार और प्रशिक्षित रखे जाते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स जैसी वैश्विक मीडिया संस्थाओं का भी यह मानना है कि, भले ही इजराइल इन हत्याओं को अपनी जीत के रूप में पेश करे, लेकिन ईरान की सरकार गिरने वाली नहीं है। बल्कि यह स्थिति जंग को और अधिक लंबा खींच सकती है, जो कि असल में ईरान की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है ताकि दुश्मन को लंबे समय तक उलझाकर थकाया जा सके।
प्रशिक्षित नए लोग संभाल रहे सत्ता
नेतृत्व के इस बदलाव का एक और खतरनाक पहलू यह है कि, जिन नए लोगों को अब कमान सौंपी जा रही है, उनके बारे में इजराइल और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों के पास बहुत ही सीमित जानकारी है। इससे न केवल ईरान की भविष्य की रणनीतियों को समझना मुश्किल हो गया है, बल्कि किसी भी प्रकार के समझौते या कूटनीतिक बातचीत की संभावनाएं भी खत्म हो गई हैं।
इसका मुख्य कारण यह है कि ये नए और उभरते हुए नेता अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में कहीं अधिक कट्टरपंथी सोच रखते हैं और वे पश्चिमी देशों के प्रति किसी भी नरम रुख के सख्त खिलाफ हैं। इजरायली सैन्य खुफिया के पूर्व विशेषज्ञ डैनी सिट्रिनोविच ने भी आगाह किया है कि सिर काटने की इस रणनीति की अपनी एक सीमा होती है। आप कुछ चेहरों को तो मिटा सकते हैं, लेकिन पूरे तंत्र और विचारधारा को खत्म करना नामुमकिन है। यह कड़वाहट आने वाले वक्त में ईरान समर्थित प्रॉक्सी समूहों के जरिए इजराइल और अमेरिका के लिए और भी बड़े सुरक्षा संकट पैदा कर सकती है।
एकजुट हुई ईरान की जनता
इन हत्याओं का एक अप्रत्याशित परिणाम ईरान के आंतरिक हालातों में भी देखने को मिल रहा है। कुछ समय पहले तक जो ईरान आंतरिक विद्रोह और विरोध-प्रदर्शनों से जूझ रहा था, वह अब बाहरी हमलों के बाद पूरी तरह एकजुट नजर आ रहा है। शीर्ष नेताओं की हत्या ने जनता के बीच एक गहरी सहानुभूति पैदा कर दी है, जिससे घरेलू विरोध पूरी तरह थम चुका है।

बेअसर हो रही ट्रंप और नेतन्याहू की अपील
अब बेंजामिन नेतन्याहू या डोनाल्ड ट्रंप की अपीलों का ईरानी जनता पर कोई असर नहीं हो रहा है और वे सड़कों पर सरकार गिराने के बजाय अपने देश के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं। यहां तक कि अमेरिकी मीडिया में भी अब इन लक्षित हत्याओं की आलोचना होने लगी है, क्योंकि इससे कूटनीति के सारे रास्ते बंद होते जा रहे हैं। अंततः, इजराइल जिसे अपनी बड़ी जीत मान रहा है, वह भविष्य में एक ऐसी अंतहीन और अदृश्य लड़ाई का रूप ले सकती है जिसमें जीत और हार का फैसला करना नामुमकिन होगा।
इसे भी पढ़ें- खामेनेई की मौत के बाद महायुद्ध की ओर बढ़ा मिडिल ईस्ट, हमले जारी, भारत में भी गरमाई सियासत



