यूपी पंचायत चुनाव 2026: ओबीसी आरक्षण पेच में टल सकते हैं चुनाव, दवाब में योगी सरकार

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर ग्रामीण इलाकों में उत्सुकता और अनिश्चितता का माहौल है। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी), जिला पंचायत सदस्य, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल मई-जुलाई 2026 में समाप्त हो रहा है। पिछली बार अप्रैल-मई 2021 में हुए चुनावों के बाद इस बार भी अप्रैल-मई 2026 में मतदान की उम्मीद जगी थी, लेकिन ओबीसी आरक्षण की प्रक्रिया में आई कानूनी अड़चनों के कारण चुनावों में देरी होने के आसार प्रबल हो गये हैं।

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योगी सरकार ने हाईकोर्ट में दिया हलफनामा

योगी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को दिए हलफनामे में स्पष्ट किया है कि, समर्पित पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग का गठन किया जा रहा है। इस आयोग के गठन और उसके रैपिड सर्वे के बाद ही आरक्षण की अंतिम सूची तैयार होगी, जिसके बिना राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं कर सकता।

यूपी पंचायत चुनाव 2026

बता दें कि, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव तीन स्तरों पर होते हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर ग्राम प्रधान और सदस्यों का चुनाव होता है, जबकि क्षेत्र पंचायत (क्षेत्रीय स्तर) और जिला पंचायत (जिला स्तर) पर सदस्य और अध्यक्ष चुने जाते हैं। कुल मिलाकर लगभग 57,691 ग्राम प्रधान, हजारों ग्राम पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य, 3,200 से अधिक जिला पंचायत सदस्य, 826 ब्लॉक प्रमुख और 75 जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव होने हैं।

2027 की रणनीति के लिए अहम

ये चुनाव न केवल स्थानीय विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि राजनीतिक दलों के लिए 2027 के विधानसभा चुनावों का ‘सेमीफाइनल’ भी माने जाते हैं। उत्तर प्रदेश की विधानसभा की दो-तिहाई सीटें ग्रामीण क्षेत्रों से आती हैं, जहां पंचायत चुनावों के नतीजे जातिवार और क्षेत्रवार वोट बैंक का सटीक आंकलन देते हैं। औसतन 4 से 6 जिला पंचायत सदस्य एक विधानसभा क्षेत्र बनाते हैं, इसलिए इन चुनावों के परिणाम 2027 की रणनीति तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

2021 के पंचायत चुनावों में बीजेपी और सपा के बीच कांटे की टक्कर देखी गई थी। जिला पंचायत सदस्यों की 3,050 सीटों पर सपा ने 759, बीजेपी ने 768, बसपा ने 319, कांग्रेस ने 125, आरएलडी ने 69 और आप ने 64 सीटें जीतीं, जबकि 944 निर्दलीय चुने गए। निर्दलीयों को साथ मिलाकर बीजेपी ने 75 जिलों में से 67 में जिला पंचायत अध्यक्ष बनाए, जबकि सपा सिर्फ 5 जिलों तक सीमित रही।

ब्लॉक प्रमुख सीटों पर बीजेपी का दबदबा

ब्लॉक प्रमुख सीटों पर भी बीजेपी का दबदबा रहा। ये आंकड़े दिखाते हैं कि, पंचायत चुनावों में सत्ताधारी दल को फायदा मिलता है, क्योंकि ग्रामीण स्तर पर प्रशासनिक प्रभाव और विकास योजनाओं का लाभ अधिक दिखता है। राजनीतिक दल इन चुनावों के जरिए अपनी ताकत का जायजा लेते हैं और 2022 विधानसभा तथा 2024 लोकसभा चुनावों से तुलना कर वोटों में बढ़ोतरी या कमी का विश्लेषण करते हैं। नतीजों के आधार पर जातिवार, क्षेत्रवार रणनीति बनाई जाती है, जिससे 2027 के लिए सियासी जमीन तैयार होती है। चुनावों में देरी का मुख्य कारण ओबीसी आरक्षण की प्रक्रिया है।

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गठित किया जायेगा ओबीसी आयोग 
यूपी पंचायत चुनाव 2026
 

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ अनिवार्य है। इसमें समर्पित ओबीसी आयोग का गठन, पिछड़ी जातियों की वास्तविक आबादी का समकालीन रैपिड सर्वे और कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा के अंदर रखना शामिल है। मौजूदा ओबीसी आयोग का मूल कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो गया था। सरकार ने इसे अक्टूबर 2026 तक बढ़ाया, लेकिन कानूनी रूप से यह समर्पित आयोग नहीं माना जा रहा, क्योंकि मूल तीन साल के कार्यकाल में ही सर्वे और सिफारिशें वैध होती हैं। हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल होने पर राज्य सरकार ने वकील के माध्यम से बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नया समर्पित ओबीसी आयोग गठित किया जाएगा।

कोर्ट ने ख़ारिज की सरकार की याचिका

जस्टिस राजन राय और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की बेंच ने सरकार के बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए याचिका खारिज कर दी।सरकार का कहना है कि, नया आयोग गठित होने के बाद पिछड़ों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का रैपिड सर्वे करेगा। 2011 की जनगणना में ओबीसी डेटा शामिल नहीं था, जबकि 2015 के रैपिड सर्वे के आधार पर 2021 में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू हुआ था। नया सर्वे होने पर आरक्षण प्रतिशत और सीटों का निर्धारण होगा। आयोग की रिपोर्ट आने के बाद आरक्षण अधिसूचना जारी होगी। इसके बाद यदि कोई कानूनी चुनौती नहीं आई, तो राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम घोषित करेगा।

पूरी प्रक्रिया में कम से कम 5 से 7 महीने लग सकते हैं। आयोग का गठन फरवरी-मार्च 2026 तक, सर्वे और रिपोर्ट जून-जुलाई तक, अधिसूचना और चुनाव कार्यक्रम अगस्त-सितंबर तक संभव है। इससे चुनाव अप्रैल-मई की बजाय अक्टूबर-नवंबर 2026 या इससे आगे टल सकते हैं। यदि समय पर चुनाव नहीं हुए, तो सरकार इन पदों पर प्रशासक नियुक्त कर सकती है। राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची संशोधन (SIR) पर फोकस किया है। फाइनल मतदाता सूची फरवरी 2026 तक प्रकाशित होगी।

विपक्ष सरकार पर लगा रहा आरोप

SC/ST आरक्षण पहले से जनसंख्या अनुपात में तय होता है, लेकिन ओबीसी के लिए नया फॉर्मूला जरूरी है। विपक्ष सरकार पर आरोप लगा रहा है कि देरी राजनीतिक लाभ के लिए है, जबकि सरकार का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन कर निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किए जाएंगे।

पंचायती राज मंत्री बोले

पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा है कि, चुनाव समय पर होंगे, लेकिन हकीकत में आयोग गठन और सर्वे की प्रक्रिया लंबी है। पंचायत चुनाव ग्रामीण भारत की राजनीति की नींव हैं। ये न केवल स्थानीय स्तर पर विकास और प्रशासन को मजबूत करते हैं, बल्कि बड़े चुनावों के लिए सियासी संकेत भी देते हैं। यदि चुनाव टले, तो 2027 से पहले योगी सरकार की ग्रामीण लोकप्रियता का आंकलन मुश्किल होगा। सभी दल गांवों में सक्रिय हो चुके हैं, क्योंकि जो पार्टी पंचायतों पर कब्जा जमाएगी, वही 2027 में मजबूत स्थिति में होगी। फिलहाल ओबीसी आयोग के गठन पर सबकी नजर टिकी है, जो चुनाव की तारीख तय करेगा।

 

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