
नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली, जो विकास, मेट्रो और आधुनिक इमारतों के लिए जानी जाती है, जहां हमेशा भीड़भाड़ और चहल-पहल रहती है। वहां अब एक गंभीर संकट भी दस्तक दे चुका है, जिसने हर किसी के मन में दहशत भर दी है। दरअसल, यहां लापता लोगों की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है। हाल के आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले महीने यानी जनवरी 2026 में 1777 लोग लापता हुए। वहीं, पिछले सालों में हर महीने गुमशदगी के औसतन 2,000 मामले दर्ज होते रहे हैं। ये आंकड़े पुलिस की कार्यशैली पर भी सवाल उठा रहे हैं।
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26 दिन में लापता हुए 2,884 लोग

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और दिल्ली पुलिस के आंकड़ों पर नजर डालें, तो इसी साल यानी 2026 की शुरुआत में ही जनवरी के पहले 15 दिनों में 807 लोगों के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज हुई। आंकड़ों के मुताबिक, लापता होने वालों में अधिकांश महिलाएं और बच्चे हैं। पूरे जनवरी में ये संख्या 1,777 तक पहुंच गई। बता दें कि, ये वे आंकड़े हैं जो पुलिस की फ़ाइलों में दर्ज हैं। हो सकता है कुछ ऐसे भी हों, जिनका कहीं जिक्र तक न हो।
हालांकि, कुछ रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, पिछले 36 दिनों में लगभग 2,475 से 2,884 लोग गुमशुदा हो चुके हैं, जिनमें से केवल 409 लोगों को ही पुलिस ढूढ़ पाई, जबकि करीब 83 प्रतिशत मामलों में अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है। यह आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगाते हैं।
2025 में लापता हुए थे ढाई हजार लोग
औसतन हर दिन 82 लोग और हर घंटे करीब 3 लोग लापता हो रहे हैं। इनमें बच्चों और महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है,जो चिंताजनक है। जनवरी 2026 से लेकर अब तक गायब होने वालों में 616 बच्चे और 1,372 महिलाएं हैं, जिन्हें अभी तक नहीं तलाशा जा सका।
दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की ये खबर नई नहीं है। इससे पहले भी यहां बड़ी संख्या में लोगों के गुमशुदा होने की खबरें आती रही हैं। पिछले साल यानी 2025 में कुल 24,508 लोग लापता हुए थे, जिनमें 14,870 महिलाएं थीं, यानी 60 प्रतिशत से ज्यादा। पिछले दस वर्षों में गुमशुदगी के 2.33 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें से करीब 1.8 लाख लोगों को ढूंढ कर उनके परिजनों को सौंप दिया गया, लेकिन 52,000 लोगों के परिजन अभी उनकी राह देख रहे हैं।
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पुलिस पर उठ रहे सवाल
ये लोग कब वापस अपने घर आएंगे, किसी को नहीं पता, पुलिस के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है। 2026 में भी लोगों के लापता होने का सिलसिला जारी है। जनवरी के पहले 15 दिनों में गुमशुदगी के 807 मामलों में 509 महिलाएं और लड़कियां थीं। वहीं, 191 नाबालिग बच्चे, जिनमें ज्यादातर किशोरियां शामिल हैं। पुलिस ने इनमें से कुछ को ट्रेस किया है और उन्हें ढूढ़ कर उनके परिजनों को सौंपा। उदाहरण के लिए, पहले 15 दिनों में 235 लोगों को ढूढ़ लिया गया, लेकिन 572 लोग अभी भी लापता हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामले घर से भागने, पारिवारिक विवाद, पढ़ाई का दबाव या ट्रैफिकिंग से जुड़े होते हैं, लेकिन कुछ मामलों में अपहरण या अन्य अपराध की आशंका भी जताई जा रही है। जैसे कि ऋतिक झा का मामला।
ऋतिक झा केस
इस संकट की गहराई को समझने के लिए 17 वर्षीय ऋतिक झा का मामला सबसे बेहतर उदाहरण है। दिल्ली के बुराड़ी इलाके के संत नगर निवासी ऋतिक झा JEE मेन्स की तैयारी कर रहे थे। 17 दिसंबर 2025 को मां बेबी झा ने पढ़ाई को लेकर उसे डांट दिया, जिससे नाराज होकर वह घर से निकल गया। परिवार को लगा कि वह अपना लैपटॉप लेने गया होगा, अभी आ जाएगा, लेकिन वह नहीं लौटा, परिजन इंतजार करते रहे। आज उसे लापता हुए लगभग 50 दिन हो चुके हैं, लेकिन उसका कोई अता पता नहीं है। हालांकि, परिजनों ने उसी दिन दिल्ली पुलिस में FIR दर्ज कराई, लेकिन उनका आरोप है कि, पुलिस ने शुरुआती दिनों में कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की।

CCTV फुटेज चेक करने में देरी हुई और जब परिवार ने खुद जांच शुरू की तो पता चला कि ऋतिक सफेद स्वेटर पहने ई-रिक्शा से मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन पहुंचा था। परिवार ने खुद कैमरों की फुटेज निकलवाई और पुलिस को सौंपी, लेकिन मेट्रो प्रशासन ने कहा कि फुटेज डिलीट हो चुकी है या ऑपरेटर का व्यवहार संदिग्ध था। इधर, मां बेबी झा का रो-रोकर बुरा हाल है। वे कहती हैं, हम मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री से लेकर अपहरणकर्ता से भी हाथ जोड़कर अपील कर रहे हैं, बस बेटा वापस कर दो। ऋतिक ही नहीं सुरका का भी मामला कुछ ऐसा ही है।
सुराका केस
दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के तैमूर नगर में रहने वाली 16 वर्षीय सुराका भी पिछले एक महीने से लापता है। उसके पिता अब्दुस सलाम ने FIR दर्ज कराई और खुद CCTV फुटेज निकालकर पुलिस को दी। फुटेज में सुराका हरा गमछा और काली जैकेट में दिख रहा है, लेकिन पुलिस अब तक उसे नहीं ढूंढ पाई। निराश होकर परिवार ने ऐलान किया कि, जो भी उनके बेटे के बारे में जानकारी देगा उसे बतौर इनाम 11,000 रुपये दिए जाएंगे। इन दोनों मामलों में एक समानता साफ दिखती है, परिवार खुद ‘डिटेक्टिव’ बनकर सबूत जुटा रहे हैं, जबकि पुलिस पर लापरवाही के आरोप लग रहे हैं। कई परिवारों का कहना है कि FIR के बाद भी तलाशी, पूछताछ या तकनीकी जांच में देरी होती है, जिससे महत्वपूर्ण सुराग खो जाते हैं।
1,372 महिलाओं का लापता होना चिंताजनक
दिल्ली पुलिस का कहना है कि, लापता होने के मामले पिछले वर्षों की तुलना में असामान्य रूप से नहीं बढ़े हैं। जनवरी 2026 में 1,777 मामले दर्ज हुए, जो 2024 (मासिक औसत 2,074) और 2025 (2,042) से कम हैं। पुलिस का दावा है कि 77 प्रतिशत मामलों में लोग ट्रेस हो जाते हैं और ज्यादातर मामले घरेलू विवाद या भागने से जुड़े होते हैं। ZIPNET पोर्टल पर लापता लोगों की जानकारी अपडेट की जाती है, जहां FIR नंबर, तारीख और स्टेटस चेक किया जा सकता है। फिर भी, आंकड़े और परिवारों की आपबीती सुरक्षा पर सवाल खड़े करते हैं। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार के दावों के बीच 1,372 महिलाओं का लापता होना चिंताजनक है। क्या दिल्ली सच में सुरक्षित है, या यह ‘लापतागंज’ बनती जा रही है?
क्या है समाधान
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि CCTV नेटवर्क को मजबूत करना, त्वरित जांच प्रक्रिया, जागरूकता अभियान, बच्चों के लिए ट्रैकिंग ऐप और ट्रैफिकिंग रोधी यूनिट्स को सक्रिय करना जरूरी है। परिवारों को तुरंत रिपोर्ट करने की सलाह दी जाती है, 24 घंटे इंतजार न करें।दिल्ली में लापता होने की यह समस्या सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों के दर्द की है। जब तक सिस्टम गंभीरता नहीं दिखाएगा, तब तक मांएं रोती रहेंगी और पिता दर-दर भटकते रहेंगे। क्या प्रशासन इस संकट पर तत्काल कदम उठाएगा? या फिर परिजनों को उनके हाल पर छोड़ देगा।



