
ढाका। बांग्लादेश की राजनीति में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है। जहां एक तरफ 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले जन-आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका था, वहीं अब तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने फरवरी 2026 के आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की है। 17 साल के लंबे निर्वासन के बाद दिसंबर 2025 में देश लौटे तारिक रहमान अब प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार बन चुके हैं। उनकी वापसी और बीएनपी की इस निर्णायक जीत ने बांग्लादेश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है।
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भारत ने दी जीत की बधाई
तारिक रहमान, जिन्हें बांग्लादेशी राजनीति का ‘राजकुमार’ या ‘डार्क प्रिंस’ कहा जाता है, पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बड़े बेटे हैं। 60 वर्षीय तारिक ने मात्र दो महीनों में बीएनपी को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा दिया। चुनाव परिणामों में बीएनपी ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया, जबकि जमात-ए-इस्लामी जैसे विरोधी दलों को बड़ा झटका लगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत, पाकिस्तान और अमेरिका समेत कई देशों ने बीएनपी की जीत पर बधाई दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को बधाई देते हुए कहा कि यह बांग्लादेश की जनता का उनके नेतृत्व पर विश्वास दर्शाता है।
निर्वासन से वापसी तक का सफर

तारिक रहमान का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 2008 में अवामी लीग सरकार के दबाव और भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग तथा 2004 के ग्रेनेड हमले जैसे गंभीर आरोपों के चलते वे लंदन चले गए थे। उन पर कई मामलों में सजा सुनाई गई थी, जिसके कारण वापसी असंभव लग रही थी, लेकिन 2024 में शेख हसीना के खिलाफ छात्रों के हिंसक प्रदर्शनों ने सब कुछ बदल दिया। हसीना देश छोड़कर भाग गईं और मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी।
25 दिसंबर को आये थे बांग्लादेश
इस सरकार ने तारिक पर लगे अधिकांश आरोप खारिज कर दिए, जिससे उनका रास्ता साफ हो गया। 25 दिसंबर 2025 को क्रिसमस के दिन तारिक अपनी पत्नी जुबैदा रहमान और बेटी जाइमा के साथ ढाका पहुंचे। हजरतशाह जलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हजारों समर्थकों ने उनका जोरदार स्वागत किया। तारिक ने जूतियां उतारकर जमीन पर पैर रखा और मिट्टी को छुआ, यह प्रतीक था कि वे अपनी जन्मभूमि से फिर जुड़ गए हैं, लेकिन खुशी के बीच दुख भी आया। उनकी मां खालिदा जिया का, जो लंबे समय से बीमार चल रही थीं, 30 दिसंबर 2025 को निधन हो गया।मां के निधन के बाद तारिक ने बीएनपी की कमान पूरी तरह संभाल ली। जनवरी 2026 में वे पार्टी के चेयरमैन बने और चुनाव प्रचार में सक्रिय हो गए।
1981 के हुई थी पिता की हत्या
तारिक रहमान का जन्म 20 नवंबर 1965 को हुआ था। उनके पिता जियाउर रहमान बांग्लादेश के छठे राष्ट्रपति और सेना प्रमुख थे, जिनकी 1981 में हत्या कर दी गई थी। मां खालिदा जिया 1991 में देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं और 2001-2006 तक फिर सत्ता में रहीं। यह परिवार बांग्लादेश की राजनीति में ‘जिया राजवंश’ के रूप में जाना जाता है। दूसरी ओर, अवामी लीग की शेख हसीना ‘मुजीब राजवंश’ की उत्तराधिकारी हैं, जिनके पिता शेख मुजीबुर रहमान बांग्लादेश के संस्थापक थे। इन दो परिवारों की राजनीतिक दुश्मनी को ‘बैटल ऑफ बेगम’ कहा जाता है।
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शेख हसीना शासन में हुआ बीएनपी का दमन
1991 से तीन दशकों तक दोनों पार्टियां बारी-बारी सत्ता में रहीं। हसीना के शासन में बीएनपी पर दमन चला, खालिदा को जेल हुई और तारिक निर्वासित रहे। फरवरी 2026 का चुनाव बांग्लादेश के लिए ऐतिहासिक रहा। ये 2024 की क्रांति के बाद पहला स्वतंत्र चुनाव है। इस चुनाव में बीएनपी ने 300 सदस्यीय संसद में 212 से अधिक सीटें जीतीं, जबकि जमात-ए-इस्लामी को 70 के आसपास मिलीं। तारिक ने ढाका-17 और बोगुरा-6 दोनों सीटों से जीत हासिल की।
बहुमत से सरकार बनाएगी बीएनपी

चुनाव के बाद बीएनपी ने घोषणा की, कि पार्टी बहुमत से सरकार बनाएगी। तारिक ने वापसी के बाद एक रैली में कहा, अब देश के लोगों को अपने बोलने और लोकतांत्रिक अधिकार वापस लेने की जरूरत है। उन्होंने मार्टिन लूथर किंग जूनियर का हवाला देते हुए कहा, मेरे पास सपना नहीं, एक योजना है। उनका लक्ष्य एक समावेशी बांग्लादेश बनाना है, जहां मुस्लिम, हिंदू, बौद्ध और ईसाई सभी सुरक्षित रहें। उन्होंने युवाओं को देश के भविष्य का मुख्य आधार बताया और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का वादा किया।
चूर हुआ इस्लामिक राष्ट्र का सपना?
बीएनपी की जीत के बाद अब ये सवाल उठने लगे हैं कि, क्या तारिक के नेतृत्व में पार्टी की पुरानी छवि… भ्रष्टाचार और राजनीतिक हिंसा के आरोपों से मुक्त हो पायेगी? कई विश्लेषक उन्हें ‘डार्क प्रिंस’ कहते हैं, लेकिन उनकी वापसी ने बीएनपी को नई ऊर्जा दी है। तारिक की वापसी से जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियों की मुश्किलें बढ़ी हैं, जो इस्लामिक राष्ट्र का सपना देखती हैं, अब चुनाव में मिली हार के बाद उसके इस सपने पर विराम लग सकता है।
अंतरिम सरकार के बाद बांग्लादेश में हुआ ये चुनाव स्थिरता लाने वाला माना जा रहा है। तारिक का फोकस लोकतंत्र, आर्थिक सुधार और युवा सशक्तिकरण पर है। यदि वे वादों पर खरे उतरे, तो बांग्लादेश एक नई दिशा में जा सकता है, लेकिन राजनीतिक दुश्मनी और क्षेत्रीय चुनौतियां अभी भी बाकी हैं, जिनसे तारिक को निपटना होगा।
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