
नई दिल्ली। ब्रिक्स को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सबसे बड़ी चिंता जल्द ही दूर हो जाएगी। रूस के ब्रिक्स शेरपा और उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने स्पष्ट रूप से कहा है कि, ब्रिक्स देशों का अपना साझा मुद्रा (common currency) बनाने का कोई एजेंडा नहीं है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत ब्रिक्स की प्रेसीडेंसी संभाल रहा है और ट्रंप बार-बार अमेरिकी डॉलर की सुरक्षा को लेकर चेतावनी जारी हो रही है।
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भारत में हुई बैठक
बता दें कि, बीते 9 से 11 फरवरी 2026 तक नई दिल्ली में ब्रिक्स शेरपाओं और सू-शेरपाओं की पहली बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने की थी।

इस बैठक में हिस्सा लेने वाले रूसी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख रयाबकोव ने एक बातचीत में कहा, मैं स्पष्ट कर दूं कि, हम कोई भी एक साझा मुद्रा स्थापित करने की बात नहीं कर रहे हैं। हम इसके लिए तैयार नहीं हैं और यह व्यावहारिक रूप से हमारा लक्ष्य भी नहीं है। रयाबकोव ने आगे जोड़ा कि, ब्रिक्स का फोकस अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर है।
राष्ट्रीय मुद्राओं के विस्तार पर बल
उन्होंने कहा, हमें अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं के इस्तेमाल को आगे और विस्तार देने की जरूरत है। यह किसी तरह से डॉलर को कमजोर करने का प्रयास नहीं है। उन्होंने पुतिन के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि, अगर रूस को डॉलर के इस्तेमाल से वंचित नहीं किया जाता, तो रूस अभी भी डॉलर का इस्तेमाल करता। रूस की यह चिंता यूक्रेन युद्ध के बाद लगी पश्चिमी प्रतिबंधों से उपजी है, जिसने रूसी अर्थव्यवस्था को वैश्विक बैंकिंग सिस्टम से काट दिया है।
क्या है ब्रिक्स का वर्तमान करेंसी एजेंडा
ब्रिक्स कभी भी पश्चिम-विरोधी गठबंधन नहीं रहा है, बल्कि यह बहुपक्षीयता को मजबूत करने का मंच है। रयाबकोव ने बातचीत में स्पष्ट किया कि, ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाना चाहते हैं। यह डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक कदम है, लेकिन कोई नई साझा मुद्रा नहीं बनाई जा रही। जुलाई 2025 में रियो डी जनेरियो में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ही ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम को मजबूत करना है।
कम हो सकती है डॉलर पर निर्भरता
इस सिस्टम से डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है, लेकिन रयाबकोव ने जोर दिया कि यह डॉलर के खिलाफ कोई साजिश नहीं है। ब्रिक्स का लक्ष्य पाबंदियों और दंडात्मक कार्रवाइयों से राष्ट्रीय मुद्राओं को सुरक्षित रखना है, ताकि सदस्य देश स्वतंत्र रूप से व्यापार कर सकें।
ट्रंप की चिंता की वजह
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार ब्रिक्स को अमेरिकी डॉलर के लिए खतरा बताया है। उन्होंने 2024-2025 में BRICS देशों को चेतावनी दी थी कि, अगर वे कोई नई मुद्रा बनाते हैं या डॉलर को चुनौती देते हैं, तो 100% तक टैरिफ लगाए जाएंगे। ट्रंप का मानना है कि, ब्रिक्स का मजबूत होना उनके ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ एजेंडे के लिए चुनौती है।
आपको बता दें कि, डॉलर वैश्विक व्यापार का प्रमुख माध्यम है और इसकी स्थिति कमजोर होने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। ट्रंप की ये चिंता पिछले साल यानी 2025 के ब्रिक्स सम्मेलन के बाद और बढ़ गईं, जहां डी-डॉलराइजेशन (de-dollarization) को लेकर चर्चा हुई थी और अपनी मुद्रा बनाने पर जोर दिया गया था।
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हालांकि, रूस और अन्य सदस्यों ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स का कोई एजेंडा डॉलर को ‘डिजेनरेट’ करने का नहीं है। रयाबकोव के बयान से लगता है कि, भारत की प्रेसीडेंसी में ब्रिक्स का फोकस ज्यादा व्यावहारिक और संतुलित रहेगा, जिसमें ट्रंप को खुश रखने वाला रूसी प्लान शामिल है, यानी कोई साझा मुद्रा नहीं, सिर्फ राष्ट्रीय मुद्राओं के विस्तार पर चर्चा हुई।
ब्रिक्स में शामिल देश

ब्रिक्स मूल रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (BRICS) से शुरू हुआ था। 2024-2025 में विस्तार के बाद अब ये देश भी इसके पूर्णकालिक सदस्य बन गये।
ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
जनवरी 2025 से पार्टनर देश
पिछले साल यानी 2025 में पार्टनर देश के रूप में बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान के साथ ही कुछ सूत्रों में वियतनाम भी शामिल है। यह विस्तार ब्रिक्स को वैश्विक दक्षिका मजबूत मंच बना रहा है। भारत की 2026 प्रेसीडेंसी का थीम “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” है, जिसमें सुरक्षा, आतंकवाद विरोध, ऊर्जा सुरक्षा और संस्थागत विकास पर फोकस है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए धमकी
रयाबकोव ने बातचीत में जिन चीजों को स्पष्ट किया वह ब्रिक्स की एकजुटता और व्यावहारिकता को दर्शा रहा है। रूसी प्रतिनिधिमंडल की मानें, तो ब्रिक्स का मकसद डॉलर को चुनौती देना नहीं बल्कि बहुपक्षीय व्यापार को आसान बनाना है। भारत की प्रेसीडेंसी में यह संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि भारत अमेरिका के साथ मजबूत संबंध चाहता है और साथ ही ब्रिक्स में अपनी भूमिका निभाना चाहता है।
ट्रंप की टैरिफ धमकियां वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती हैं, लेकिन ब्रिक्स का यह रुख दिखाता है कि, वह टकराव की बजाय सहयोग पर फोकस कर रहा है। आने वाले महीनों में ब्रिक्स की बैठकें और घोषणाएं यह तय करेंगी कि क्या यह ब्लॉक वाकई वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव ला पाएगा।
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