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मेरठ की मस्जिद के नीचे मिलेंगे बौद्ध मठ के अवशेष? ASI सर्वे की मांग से हड़कंप

मेरठ में फिर उठा नया विवाद, क्या 300 साल पुरानी मस्जिद के नीचे दबा है इतिहास?

मेरठ। सहारनपुर और मुरादाबाद के बाद अब उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में भी एक ऐतिहासिक मस्जिद को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यहां शहर के कोतवाली क्षेत्र में स्थित शाही जामा मस्जिद के पुरातात्विक स्वरूप की जांच कराने की मांग उठने लगी है। इसके बाद  इलाके में हलचल तेज हो गई है।

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अधिवक्ता ने कमिश्नर और डीएम को सौंपा ज्ञापन

जिला बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता राम कुमार शर्मा ने इस संबंध में मेरठ कमिश्नर भानु चंद्र गोस्वामी और जिलाधिकारी को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में उन्होंने मस्जिद परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा सर्वे कराने और पूरे परिसर की वैज्ञानिक जांच कराने की मांग की है। मामले को गंभीरता से लेते हुए कमिश्नर ने तुरंत जिलाधिकारी को इस पूरे प्रकरण की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए हैं।

 ये है अधिवक्ता का दावा

अधिवक्ता राम कुमार शर्मा ने डीएम को सौंपे ज्ञापन में दावा किया है कि, मौजूदा समय में जिस स्थान पर शाही जामा मस्जिद खड़ी है, उसके नीचे प्राचीन काल का कोई बौद्ध मठ, विहार या अन्य पुरातात्विक संरचना मौजूद हो सकती है। उन्होंने अपने इस दावे के समर्थन में विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुराने विवरणों का हवाला देते हुए पूरे परिसर का वैज्ञानिक तरीके से परीक्षण कराए जाने की मांग रखी है।

Shahi Jama Masjid Meerut

अधिवक्ता का कहना है कि, उनका यह दावा केवल अनुमान पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कुछ ऐतिहासिक संदर्भ भी मौजूद हैं, जिनकी विशेषज्ञों के जरिए वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए।

किन ऐतिहासिक दस्तावेजों का दिया गया हवाला

ज्ञापन में सबसे पहले मेरठ जिला गजेटियर, 1904 में दर्ज ऐतिहासिक विवरणों का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा, अधिवक्ता ने प्राचीन काल में भारत की यात्रा पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में दर्ज कुछ ऐतिहासिक संकेतों को भी अपने दावे का आधार बनाया है।

ज्ञापन में यह भी बताया गया है कि, मेरठ और इसके आसपास के इलाके का संबंध ऐतिहासिक रूप से मौर्य काल और बौद्ध काल से भी रहा है। इस क्षेत्र में पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण संरचनाएं मिलने की संभावना जताई जाती रही है। अधिवक्ता का कहना है कि, इन सभी ऐतिहासिक तथ्यों और संभावनाओं की गहन विशेषज्ञ जांच होनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

प्रोफेसर के हवाले से भी उठाए गए सवाल

अपने दावे को और मजबूती देने के लिए अधिवक्ता राम कुमार शर्मा ने वरिष्ठ इतिहासकार प्रोफेसर केडी शर्मा का भी हवाला दिया है, जिन्होंने पहले कभी इस क्षेत्र में प्राचीन अलंकृत प्रस्तर स्तंभों और अन्य पुरातात्विक अवशेषों की मौजूदगी का जिक्र किया था। हालांकि, यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि, इन दावों की वास्तविकता की अभी तक किसी प्रशासनिक या पुरातात्विक जांच से पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल, यह पूरा मामला दावों और ऐतिहासिक संदर्भों तक ही सीमित है। वर्तमान मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन संरचना के होने या न होने का कोई ठोस प्रमाण अभी सामने नहीं आया है।

धार्मिक स्थलों को लेकर उठ रहे सवाल

शाही जामा मस्जिद को लेकर उठी इस ताजा मांग के बाद मेरठ में विभिन्न धार्मिक स्थलों के ऐतिहासिक स्वरूप को लेकर चर्चाओं का दौर एक बार फिर तेज हो गया है। गौरतलब है कि, हाल के दिनों में इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक मस्जिद को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई हो चुकी है। वहीं मुरादाबाद में एक जैन मंदिर से सटी मस्जिद को लेकर भी विवाद उठा था। इसके अलावा मेरठ के ही खरखौदा थाना परिसर में स्थित मदरसे और मस्जिद से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश भी पहले दिए जा चुके हैं। इन सभी घटनाक्रमों की कड़ी में अब शाही जामा मस्जिद का यह ताजा मामला जुड़ गया है।

कमिश्नर ने दिए जांच के निर्देश

अधिवक्ता के प्रार्थना-पत्र पर संज्ञान लेते हुए कमिश्नर भानु चंद्र गोस्वामी ने डीएम मेरठ को इस पूरे प्रकरण की गहनता से जांच कराने और नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।

Shahi Jama Masjid Meerut

इसके बाद अब जिला प्रशासन उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों, प्रशासनिक रिकॉर्ड और मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं की गहन समीक्षा करेगा। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि, इस मामले में आगे किस स्तर पर कार्रवाई की जानी चाहिए और क्या वास्तव में पुरातात्विक सर्वे कराए जाने की कोई ठोस आवश्यकता बनती भी है या नहीं।

अधिवक्ता बोले- मांग किसी धर्म के खिलाफ नहीं

विवाद बढ़ने के बीच अधिवक्ता राम कुमार शर्मा ने अपनी तरफ से स्पष्टीकरण भी दिया है। उन्होंने कहा है कि, उनकी यह मांग किसी विशेष धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है और इसे उस नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।  शर्मा ने कहा, उनका एकमात्र उद्देश्य ऐतिहासिक तथ्यों का वैज्ञानिक आधार पर सत्यापन कराना है। उनका कहना है कि, अगर वाकई इस स्थान पर कोई प्राचीन पुरातात्विक धरोहर मौजूद है, तो उसके संरक्षण की संभावनाओं को तलाशा जाना चाहिए, ताकि इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य आने वाली पीढ़ियों के सामने सही रूप में आ सकें।

अभी नहीं लिया गया अंतिम निर्णय

खैर ये यह पूरा मामला प्रशासनिक जांच के दायरे में है और इस बारे में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। यह देखना अहम होगा कि, जिला प्रशासन इस मामले में उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों की समीक्षा के बाद क्या रुख अपनाता है और क्या यह मामला भी अन्य समान विवादों की तरह आगे कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझता है। तब तक के लिए मेरठवासियों समेत पूरे क्षेत्र की निगाहें इस मामले में आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी रहेंगी।

 

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