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सवर्ण छात्रों पर ‘उल्टा भेदभाव’ का आरोप, दिल्ली में UGC हेडक्वार्टर घेराव!
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UGC नियमों से असंतुष्ट PCS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने दिया इस्तीफा
नई दिल्ली। UGC 2026: हायर एजुकेशन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। UGC के नए “हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन्स में समानता रेगुलेशन, 2026” ने राजनीतिक तूफ़ान खड़ा कर दिया है। नए नियमों के खिलाफ़ देश की राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गया है। ऊंची जाति के छात्रों ने 27 जनवरी को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन हेडक्वार्टर के बाहर विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया था। बढ़ते विवाद के बीच एकता की अपील करते हुए, स्टूडेंट ग्रुप्स ने अपने साथियों से बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर नए नियमों का विरोध दर्ज कराने की अपील की है। दिल्ली ही नहीं यूपी में भी कई जगहों पर नए यूजीसी नियमों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है।

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दायर हुई PIL

विरोध प्रदर्शन के साथ ही UGC के “हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन्स में समानता को बढ़ावा देने वाले रेगुलेशन 2026” (13 जनवरी को नोटिफ़ाई किए गए) को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) दायर की गई है। नए नियमों वाला गजट इस महीने की शुरुआत में नोटिफ़ाई किया गया था। इस नियम में यूनिवर्सिटी में जाति के आधार पर भेदभाव को दूर करने के लिए मज़बूत सिस्टम बनाने का आदेश दिया गया है, जिसका अब तेजी से विरोध शुरू हो गया है।
क्यों हो रहा विरोध
आलोचकों का कहना है कि, ये एकतरफ़ा और साफ़ नहीं है। ऐसे में इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। सरकार द्वारा जारी किये गए इस नोटिफ़िकेशन के बाद से विरोध, इस्तीफा और राजनीतिक अशांति फैल गई है। बीजेपी के अंदर भी इसका घोर विरोध हो रहा है। दरअसल, यूजीसी के नए नियमों के विरोध में एक पीसीएस अधिकारी और बीजेपी युवा विंग के एक नेता ने इस्तीफा दे दिया है। आलोचकों ने इन दो इस्तीफ़ों को इस बात का सबूत बताया है कि UGC नियमों का विरोध सिर्फ़ छात्र राजनीति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासन और राजनीति स्तर पर भी इसका विरोध हो रहा है।
किस नियम का हो रहा विरोध
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने भेदभाव की शिकायतों, ‘खासकर SC, ST और OBC स्टूडेंट्स के लिए’, को दूर करने के लिए इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटियां और 24/7 शिकायत हेल्पलाइन बनाने का आदेश दिया है। UGC का कहना है कि, इन नियमों का मकसद कैंपस में निष्पक्षता और सबको शामिल करना है। अब कुछ लोग इसी नियम की खिलाफत कर रहे हैं।
विरोधी दे रहे ये तर्क

नए नियमों का विरोध करने वालों का कहना है कि, नए नियम भेदभाव के आरोपियों के लिए सुरक्षा उपायों को साफ तौर पर नहीं बताते हैं। इनसे दोषी मानने का खतरा है, खासकर जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स और फैकल्टी के खिलाफ। नियमों का पालन न करने पर कड़ी सज़ा हो सकती है, जैसे कि मान्यता रद्द करना या फंडिंग रोकना आदि।”
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हर नागरिक की गरिमा और सुरक्षा…
भारतीय जनता पार्टी के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में न्याय, निष्पक्षता और संतुलित प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि न्याय तभी सार्थक माना जाता है, जब वह सबके लिए समान और निष्पक्ष हो।
उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा, ” वर्तमान समय में जो माहौल है, वह एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में चिंता और डर का माहौल बना रहा है। संतुलित प्रतिनिधित्व के बिना बनी कमेटियां निष्पक्ष न्याय प्रदान नहीं कर सकती हैं। ऐसी कमेटियां सिर्फ औपचारिक फैसले जारी करती हैं, जो समस्याओं को हल करने में नाकाम रहती हैं।”
संजय सिंह ने अपनी पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करते हुए लिखा, “न्याय की तलाश करते समय, हर नागरिक की गरिमा और सुरक्षा की रक्षा की जानी चाहिए। फैसले लेने की प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी आवश्यक है, ताकि किसी भी तरह की असमानता न हो।”
MLA प्रतीक भूषण ने जताई आपत्ति
यूजीसी के नए नियमों को लेकर BJP नेता ब्रज भूषण सिंह के बेटे और गोंडा के विधायक प्रतीक भूषण सिंह ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है।उन्होंने कहा, अब इतिहास के दोहरे मापदंडों की पूरी जांच होनी चाहिए, जहां विदेशी हमलावरों और औपनिवेशिक ताकतों के भयानक अत्याचारों को ‘बीती बातें’ कहकर भुला दिया जाता है, जबकि भारतीय समाज के एक हिस्से को लगातार ‘ऐतिहासिक अपराधी’ कहा जाता है और आज बदला लेने के लिए निशाना बनाया जाता है।”

किसान नेता राकेश टिकैत ने भी इस नए नियम पर विरोध जताया है। उन्होंने कहा, “इस एक्ट से देश में जातिगत तनाव और झगड़े बढ़ सकते हैं। सरकार चाहती है कि, देश जातिवाद, धार्मिक गुटों और मुकदमों में बंटा रहे। इस कानून का असर भविष्य में दिखेगा, लेकिन ऐसे कदम समाज में जाति के आधार पर दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं। ऐसे फैसले देश की एकता के लिए अच्छे नहीं हैं।”
सरकार का जवाब
केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस बात का सीधा जवाब देने से इनकार कर दिया है कि, नियमों की समीक्षा की जाएगी या फिर उन्हें रद्द किया जाएगा। उन्होंने बस इतना कहा कि, सरकार “बातचीत के लिए तैयार” है और नियमों का मकसद बराबरी को बढ़ावा देना है, न कि टकराव को, लेकिन, सलाह-मशविरे या संभावित बदलावों के लिए कोई टाइमफ्रेम तय नहीं किया गया है।
जो एक रेगुलेटरी बदलाव के तौर पर शुरू हुआ था, वह अब एक पॉलिटिकल और आइडियोलॉजिकल टकराव बन गया है, जिसमें जातिगत भेदभाव की चिंताएं, बहुत ज़्यादा दखल, सही प्रोसेस की कमी और कैंपस में पोलराइजेशन के डर से टकरा रही हैं। इस्तीफे बढ़ रहे हैं और विरोध फैल रहा है। केंद्र सरकार पर यह साफ करने का दबाव बढ़ रहा है कि UGC के नियम अपने मौजूदा रूप में रहेंगे या उन पर फिर से विचार किया जाएगा।
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