
नई दिल्ली। पिछले 150 सालों में मानव सभ्यता ने कई भयानक आपदाओं का सामना किया है। दो विश्व युद्धों में दस करोड़ से अधिक लोग मारे गए और 1918-19 की स्पेनिश फ्लू महामारी ने करीब पांच करोड़ जानें लीं, लेकिन इन सभी से पहले एक ऐसी वैश्विक त्रासदी आई जिसके बारे में आज भी ज्यादातर लोग अनजान हैं। 1876 से 1878 के बीच चला वैश्विक अकाल एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका महाद्वीपों में फैला जिसमें अनुमानित पांच करोड़ लोगों की मौत हो गई। यह तबाही अल नीनो नामक मौसमी घटना के कारण हुई थी।
इसे भी पढ़ें- WMO ने जारी किया रेड अलर्ट, भीषण गर्मी के साथ सूखा भी लाएगा अल नीनो
अल नीनो की चेतावनी जारी
भारतीय मौसम विभाग ने एक बार फिर अल नीनो की चेतावनी जारी की है। इस बार यह घटना भारतीय मानसून को काफी कमजोर करने वाली साबित हो सकती है। खासकर जुलाई से सितंबर तक के तीन महत्वपूर्ण महीनों में जब देश में बारिश अपने चरम पर होती है। अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक आवर्ती जलवायु घटना है।

सामान्य परिस्थितियों में पूर्वी प्रशांत यानी दक्षिण अमेरिका के पास पानी ठंडा रहता है, जबकि पश्चिमी भाग एशिया के करीब गर्म होता है। व्यापारिक हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं जो गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती रहती हैं। जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो गर्म पानी पूर्व की ओर फैलने लगता है।
मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का सतही तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। यही अल नीनो है। इसका विपरीत चरण ला नीना कहलाता है, जिसमें हवाएं मजबूत होती हैं और ठंडा पानी सतह पर आता है। इस बार का अल नीनो काफी तेजी से विकसित हो रहा है। भारतीय मौसम विभाग के रीजनल मेटियोरोलॉजिकल सेंटर चेन्नई के चीफ फोरकास्टर डी एस पाई के अनुसार इसका असर मुख्य रूप से जुलाई से सितंबर के बीच पड़ेगा जब भारत में मानसून अपने चरम पर होता है।
भयंकर पर्यावरणीय आपदा
अनुमान है कि, यह घटना फरवरी 2027 तक सक्रिय रह सकती है। वैज्ञानिक अल नीनो की ताकत को प्रशांत महासागर के एक खास क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान के आधार पर मापते हैं। यदि तापमान 0.5 से 1 डिग्री सेल्सियस ऊपर हो तो इसे कमजोर माना जाता है। 1 से 1.5 डिग्री को मध्यम 1.5 से 2 डिग्री को मजबूत और 2 डिग्री से अधिक को बहुत मजबूत या सुपर अल नीनो श्रेणी में रखा जाता है। कुछ पूर्वानुमानों के मुताबिक, मौजूदा अल नीनो 2.5 डिग्री तक पहुंच सकता है, जो रिकॉर्ड स्तर का हो सकता है।
मौसम के जानकर कहते हैं कि, इतिहास हमें सबसे बुरे परिदृश्य की तैयारी करने का सबक देता है। 1876-78 का महा-अकाल इंसानियत पर आई सबसे भयानक पर्यावरणीय आपदा थी। जर्नल ऑफ क्लाइमेट में 2018 में प्रकाशित शोध पत्र में वैज्ञानिकों ने इसे पिछले 150 वर्षों की सबसे भयंकर पर्यावरणीय आपदा बताया। उस समय उष्णकटिबंधीय प्रशांत में लंबे समय तक ठंडी स्थितियां रहीं। फिर मजबूत इंडियन ओशन डाइपोल और अटलांटिक महासागर के असामान्य गर्म पानी ने मिलकर अल नीनो को और भयंकर बना दिया।
मानसून को कमजोर करता है अल नीनो
भारत चीन ब्राजील इथियोपिया और फिलीपींस में भयंकर सूखा पड़ा। फसलें सूख गईं नदियां रुक गईं और लाखों लोग भूख से मर गए। मौतों की संख्या सिर्फ मौसम की वजह से नहीं बल्कि औपनिवेशिक नीतियों अनाज निर्यात और पारंपरिक जल संरक्षण व्यवस्थाओं के विघटन के कारण भी बढ़ी। इस आपदा ने वैश्विक असमानताओं को और गहरा किया जिसे बाद में प्रथम विश्व और तृतीय विश्व के रूप में जाना गया।

भारत में मानसून की 70 से 80 प्रतिशत बारिश दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है। अल नीनो इसे कमजोर कर देता है। जून 2026 के पहले दो सप्ताहों में कई राज्यों में बारिश सामान्य से 70-80 प्रतिशत कम दर्ज की गई। महाराष्ट्र मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में स्थिति चिंताजनक रही।
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार जून में भी औसत से कम बारिश होने की संभावना है। असली चुनौती जुलाई से सितंबर तक होगी। यदि बारिश 90 प्रतिशत या उससे कम रही, तो खरीफ फसलों जैसे धान मक्का सोयाबीन कपास और दालों की पैदावार में 10 से 15 प्रतिशत की कमी आ सकती है।
50 से 60 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर
भारत की लगभग 50 से 60 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। छोटे और सीमांत किसान जिनके पास सिंचाई की सुविधाएं नहीं हैं सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। सूखे से पशुपालन भी प्रभावित होगा क्योंकि चारे की कमी हो जाएगी। जलाशयों में पानी कम होने नदियों के सूखने और भूजल स्तर गिरने जैसी समस्याएं बढ़ेंगी।
मध्य प्रदेश महाराष्ट्र राजस्थान कर्नाटक आंध्र प्रदेश तेलंगाना समेत कुल 12 राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, जहां वर्षा आधारित खेती प्रमुख है। अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कम करने में सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल मददगार साबित हो सकता है। यदि हिंद महासागर का पश्चिमी भाग गर्म और पूर्वी भाग अपेक्षाकृत ठंडा रहा तो यह अल नीनो के असर को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है। तात्कालिक स्तर पर बेहतर मौसम पूर्वानुमान सैटेलाइट मॉनिटरिंग किसानों को समय पर सलाह सूखा-प्रतिरोधी बीजों का वितरण और फसल विविधीकरण जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
जल और अर्थव्यवस्था पर संकट
दीर्घकालिक रणनीति में जल संरक्षण चेक डैम वाटरशेड विकास माइक्रो इरिगेशन ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम भूजल प्रबंधन और कृषि बीमा का विस्तार शामिल होना चाहिए। 2020 की एक अध्ययन के अनुसार 1877-78 का अल नीनो 1982-83 1997-98 और 2015-16 के सुपर अल नीनो से भी अधिक तीव्र था।

जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का औसत तापमान बढ़ रहा है जिससे भविष्य के अल नीनो और भी तीव्र हो सकते हैं। अच्छी बात यह है कि आधुनिक कृषि प्रणाली बेहतर पूर्वानुमान और वैश्विक सहयोग के कारण 150 साल पहले जैसा भयानक अकाल अब आसानी से नहीं पड़ सकता। फिर भी जोखिम बरकरार है।
खाद्य सुरक्षा किसानों की आय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल संकट के रूप में चुनौतियां सामने आ सकती हैं। अल नीनो हमें याद दिलाता है कि प्रकृति कितनी शक्तिशाली है और मानव-प्रकृति का संतुलन कितना नाजुक है। 1876-78 की आपदा सिर्फ मौसम की घटना नहीं थी बल्कि अदूरदर्शी नीतियों और पर्यावरणीय अज्ञानता का परिणाम भी थी।
आज हमें इतिहास से सबक लेते हुए तैयार रहना होगा। जलवायु परिवर्तन के युग में अल नीनो जैसी घटनाएं और बार-बार तथा तीव्र हो रही हैं। बेहतर पूर्वानुमान सतत कृषि जल संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही हमें इन चुनौतियों से निपटने की ताकत दे सकते हैं। जुलाई से सितंबर 2026 के तीन महीने निर्णायक साबित होंगे।
इसे भी पढ़ें- यूपी में एक्टिव हुआ प्री-मानसून, लखनऊ समेत 20 शहरों में आया तूफ़ान, 54 जिलों में अलर्ट



