
वॉशिंगटन। अंतरिक्ष की दुनिया से एक बेहद दिलचस्प और चर्चा का विषय बनी घटना सामने आई है। एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का एक बेकाबू हो चुका रॉकेट चांद की सतह से टकरा गया है। यह टक्कर इतनी तेज हुई कि, इसने वैज्ञानिकों का भी ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। बताया जा रहा है कि, करीब 4 हजार किलोग्राम वजनी इस रॉकेट के हिस्से ने लगभग 8,690 किलोमीटर प्रति घंटे की जबरदस्त रफ्तार से चांद की सतह पर दस्तक दी। हालांकि, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने साफ किया है कि, इस टक्कर से धरती को किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं है, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है।
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फाल्कन 9 रॉकेट का हिस्सा था बेकाबू
चांद से टकराने वाला यह बेकाबू टुकड़ा, असल में स्पेसएक्स के मशहूर फाल्कन 9 रॉकेट के ऊपरी हिस्से का था, जिसकी लंबाई करीब 45 फीट थी। इस रॉकेट को जनवरी 2025 में अमेरिका के फ्लोरिडा से लॉन्च किया गया था। इस मिशन का मकसद अमेरिका और जापान के दो लूनर लैंडर यानी चांद पर उतरने वाले यानों को अंतरिक्ष में भेजना था। मिशन सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद रॉकेट का यह ऊपरी हिस्सा अंतरिक्ष में बिना किसी नियंत्रण के तैरता रह गया था।

पिछले करीब 18 महीनों के दौरान इस रॉकेट के हिस्से का रास्ता धीरे-धीरे बदलता चला गया। इसके पीछे की वजह पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल बताया जा रहा है, जिसने धीरे-धीरे इसकी दिशा को प्रभावित किया। खास बात यह है कि, दुनिया भर के खगोलविदों ने उपलब्ध डेटा का बारीकी से अध्ययन करके पहले ही यह अनुमान लगा लिया था कि, यह रॉकेट भटकते हुए सीधे चांद की ओर बढ़ रहा है और आखिरकार उससे टकराएगा।
आइंस्टीन क्रेटर के पास हुई टक्कर
यह टक्कर चांद पर मौजूद ‘आइंस्टीन क्रेटर’ नामक इलाके के पास हुई। गौरतलब है कि, यह क्षेत्र चांद के उस हिस्से में स्थित है, जहां दिन के समय सूरज की रोशनी पड़ती है और जो हिस्सा पृथ्वी से भी साफ दिखाई देता है। हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार, आम टेलिस्कोप की मदद से इस टक्कर को देख पाना संभव नहीं था, क्योंकि टक्कर के दौरान उत्पन्न हुई रोशनी बेहद हल्की और मद्धिम थी, जिसे सामान्य उपकरणों से पकड़ पाना मुश्किल था।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से जुड़े जाने-माने खगोलविद डॉ. मैट बोथवेल ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, इस भीषण टक्कर के कारण निश्चित रूप से चांद की सतह से धूल का एक विशाल गुबार उठा होगा। उनके अनुमान के मुताबिक, यह धूल का गुबार करीब 100 किलोमीटर की ऊंचाई तक गया होगा और कई मिनटों तक हवा में बना रहा होगा।
जल्द सामने आएंगी तस्वीरें
दिलचस्प बात यह है कि, जिस वक्त यह टक्कर हुई, उस समय चांद का चक्कर लगा रहा कोई भी अंतरिक्ष यान सही स्थिति में मौजूद नहीं था, जिसकी वजह से इस घटना की कोई लाइव तस्वीर हासिल नहीं हो पाई। हालांकि, वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि जल्द ही इस घटना की तस्वीरें सामने आ सकेंगी।
दक्षिण कोरिया के ‘दानुरी’ नामक ऑर्बिटर और नासा के ‘लूनर रिकोनिसेंस ऑर्बिटर’ यानी LRO के आने वाले दिनों में इस टक्कर वाले स्थान के ऊपर से गुजरने की उम्मीद है, जहां से वे जरूरी तस्वीरें ले सकेंगे। इसके बाद वैज्ञानिक पुरानी और नई तस्वीरों की आपस में तुलना करके चांद की सतह पर बने नए निशान और गड्ढे की सटीक पहचान कर सकेंगे।
चांद पर पहले से मौजूद है भारी मात्रा में मलबा
इस ताजा टक्कर के बाद अब चांद पर मानव गतिविधियों से जुड़े या दुर्घटनावश वहां पहुंचे ऑब्जेक्ट्स की कुल संख्या बढ़कर करीब 3,000 हो चुकी है। इन सभी वस्तुओं का कुल वजन मिलाकर लगभग 190 टन के आसपास पहुंच गया है, जो अपने आप में एक हैरान करने वाला आंकड़ा है।

इतिहास के पन्नों में झांकें तो सितंबर 1959 में सोवियत संघ का ‘लूना 2’ यान चांद की सतह पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला मानव निर्मित ऑब्जेक्ट बना था। इसके अलावा अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अकेले अपोलो कार्यक्रम से जुड़ी करीब 796 वस्तुएं भी अभी तक चांद की सतह पर मौजूद हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, चूंकि चांद पर कोई वायुमंडल या पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद नहीं है, इसलिए वहां जमा हो रहे इस मलबे से किसी तरह के इकोसिस्टम को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। हालांकि, इसके बावजूद वैज्ञानिकों के बीच एक चिंता जरूर बनी हुई है। उनका मानना है कि, आने वाले समय में जैसे-जैसे चांद पर अंतरिक्ष यानों का आना-जाना यानी लूनर ट्रैफिक बढ़ेगा, वैसे-वैसे ऐतिहासिक महत्व रखने वाली अपोलो लैंडिंग साइट्स को नुकसान पहुंचने और नए स्पेसक्राफ्ट्स के आपस में टकराने का खतरा भी बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों के लिए क्यों खास है यह मौका
साइंस म्यूजियम की स्पेस हेड लिब्बी जैक्सन ने इस पूरी घटना को वैज्ञानिकों के लिए एक बेहद रोमांचक और दुर्लभ अवसर करार दिया है। उनका कहना है कि, इस मामले में खास बात यह है कि, रॉकेट की रफ्तार, उसका वजन और आकार जैसी तमाम जानकारियां वैज्ञानिकों के पास पहले से ही मौजूद थीं।
आमतौर पर जब कोई प्राकृतिक उल्कापिंड चांद की सतह से टकराता है, तो उस वक्त वैज्ञानिकों के पास उसकी शुरुआती जानकारी और डेटा उपलब्ध नहीं होता, लेकिन इस मामले में स्थिति अलग है। वैज्ञानिक अब इस टक्कर से बने नए गड्ढे और हवा में उड़ी धूल की परत का बारीकी से अध्ययन करके यह समझने की कोशिश करेंगे कि, आखिर अरबों साल पहले चांद और हमारे पूरे सौर मंडल का निर्माण किस तरह हुआ था।
10 अगस्त को उड़ान भरेगा रॉकेट
इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प संयोग भी सामने आया है। दरअसल, स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट का निचला हिस्सा, जिसे बूस्टर कहा जाता है, पूरी तरह रीयूजेबल यानी दोबारा इस्तेमाल होने लायक होता है और मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित लैंडिंग करके वापस धरती पर लौट आता है। गौर करने वाली बात यह है कि जिस जनवरी 2025 वाले मिशन का ऊपरी हिस्सा भटककर आखिरकार चांद से जा टकराया, उसी रॉकेट के निचले बूस्टर को 10 अगस्त को एक बार फिर लॉन्च किया जाना तय है। खास बात यह है कि यह इस बूस्टर की 18वीं उड़ान होगी।
क्या है स्पेस डैब्रिस और आइंस्टीन क्रेटर
इस पूरी घटना को समझने के लिए कुछ तकनीकी शब्दों को जानना भी जरूरी है। दरअसल, इंसानों द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए रॉकेट्स के छूटे हुए टुकड़ों, निष्क्रिय हो चुके सैटेलाइट्स और अन्य मलबे को सामूहिक रूप से ‘स्पेस डैब्रिस’ कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर, चंद्रमा के पश्चिमी किनारे पर स्थित एक विशाल गड्ढे को ‘आइंस्टीन क्रेटर’ के नाम से जाना जाता है, जिसका व्यास करीब 170 किलोमीटर है।
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