मतगणना से पहले TMC को SC से बड़ा झटका, केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती पर दखल से इनकार

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों की घड़ी जैसे-जैसे करीब आ रही है, राज्य का सियासी पारा हाई होता जा रहा है। 4 मई को होने वाली मतगणना से ठीक पहले सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) को देश की सबसे बड़ी अदालत से बड़ा झटका लगा है।  दरअसल, मतगणना केंद्रों पर केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मियों की तैनाती को चुनौती देने वाली टीएमसी की याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में कुछ भी गलत नहीं है।

इसे  भी पढ़ें- आर एन रवि ने पश्चिम बंगाल के 22वें राज्यपाल के तौर पर शपथ ली

कोर्ट ने आशंकाओं को किया खारिज

अदालत की इस टिप्पणी ने न केवल निर्वाचन आयोग के विशेषाधिकारों पर मुहर लगाई है, बल्कि उन आशंकाओं को भी खारिज कर दिया है जिनमें चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे थे। यह फैसला ममता बनर्जी की पार्टी के लिए उस वक्त आया है जब वह एक-एक वोट की गिनती को लेकर बेहद सतर्क और आक्रामक रुख अपनाए हुए है।

BENGAL Vote Counting

आपको बता दें कि, पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के भविष्य का फैसला होने में अब महज 48 घंटे बचे हैं, लेकिन इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता को लेकर कानूनी लड़ाई थमती नजर नहीं आ रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तार से सुनवाई की और अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि मतगणना ड्यूटी के लिए कर्मचारियों का चयन करना पूरी तरह से चुनाव आयोग का प्रशासनिक अधिकार है।

न्यायमूर्ति की पीठ ने कहा कि, आयोग के पास यह विकल्प सुरक्षित है कि वह राज्य सरकार के कर्मचारियों के अलावा केंद्र सरकार के कर्मचारियों के विशाल पूल का उपयोग कर सके। अदालत ने टीएमसी की उन दलीलों को प्रभावी रूप से दरकिनार कर दिया जिनमें दावा किया गया था कि, केंद्रीय कर्मचारियों की मौजूदगी से मतगणना प्रभावित हो सकती है या वे किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष में झुकाव रख सकते हैं।

कपिल सिब्बल ने मंशा पर उठाए सवाल

मामले की गहराई में जाएं तो विवाद की जड़ निर्वाचन आयोग का वह निर्देश है, जिसमें यह अनिवार्य किया गया था कि प्रत्येक मतगणना टेबल पर तैनात होने वाले सुपरवाइजर या सहायक में से कम से कम एक व्यक्ति अनिवार्य रूप से केंद्र सरकार या पीएसयू का कर्मचारी होना चाहिए। टीएमसी ने इसी निर्देश को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां से राहत न मिलने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त और स्पष्ट लहजे में कहा कि जब नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, नियुक्ति किसी भी सरकारी पूल से की जा सकती है, तो इसे नियमों के खिलाफ नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि निर्वाचन आयोग केवल एक ही स्रोत यानी केंद्र सरकार से मतगणनाकर्मियों का चयन कर सकता है और इस परिपत्र को अवैध कहना तर्कसंगत नहीं है।

सुनवाई के दौरान टीएमसी की ओर से पेश हुए देश के दिग्गज वकील कपिल सिब्बल ने अपनी दलीलों में आयोग की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए। सिब्बल ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि आयोग आखिर किन आधारों पर गड़बड़ी की आशंका जता रहा है और राज्य सरकार के कर्मचारियों पर भरोसा क्यों नहीं किया जा रहा है।

टीएमसी ने दिखाई नरमी

उन्होंने आरोप लगाया कि 13 अप्रैल को जारी किए गए परिपत्र की जानकारी पार्टी को काफी देरी से यानी 29 अप्रैल को दी गई, जो आयोग की कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा करता है। सिब्बल ने यहां तक कह दिया कि उन्हें वर्तमान परिस्थितियों में निर्वाचन आयोग से पूरी तरह निष्पक्षता की उम्मीद नहीं है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन भावनात्मक और राजनीतिक दलीलों के बजाय वैधानिक प्रावधानों पर जोर दिया और कहा कि काउंटिंग सुपरवाइजर के रूप में केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति प्रावधानों के पूर्णतः अनुकूल है।

अदालत में बहस के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब टीएमसी ने अपने रुख में थोड़ी नरमी दिखाई। पार्टी की ओर से यह प्रस्ताव रखा गया कि यदि आयोग केंद्रीय कर्मचारियों को नियुक्त कर रहा है, तो कम से कम यह सुनिश्चित किया जाए कि हर टेबल पर एक कर्मचारी राज्य सरकार का भी हो। इस पर अदालत ने चुनाव आयोग के उस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया जिसमें आयोग ने कहा था कि वह 13 अप्रैल के मूल परिपत्र का अक्षरशः पालन करेगा।

आयोग ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि, पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता के साथ संपन्न होगी और इसमें किसी भी दल को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के इस बयान को दर्ज करते हुए कहा कि, अब इस मामले में आगे किसी विशेष दिशा-निर्देश या नए आदेश की आवश्यकता नहीं है।

इस पूरे विवाद के पीछे टीएमसी की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि, केंद्रीय कर्मचारी भाजपा शासित केंद्र सरकार के प्रभाव में काम कर सकते हैं। पार्टी का तर्क था कि, स्थानीय परिस्थितियों से अनभिज्ञ केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती से मतगणना में भ्रम पैदा हो सकता है या जानबूझकर देरी की जा सकती है, लेकिन निर्वाचन आयोग और कलकत्ता हाई कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि यह कदम केवल चुनाव की निष्पक्षता और तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है ताकि किसी भी प्रकार के स्थानीय दबाव से बचा जा सके।

चार मई को होगी काउंटिंग

सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए कहा कि चूंकि मतगणना के दौरान हर मेज पर उम्मीदवारों के प्रतिनिधि (काउंटिंग एजेंट) मौजूद रहेंगे, इसलिए किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना न के बराबर है।

BENGAL Vote Counting

4 मई की सुबह जब ईवीएम से जनादेश निकलना शुरू होगा, तब सुरक्षा और पारदर्शिता के कड़े पहरे के बीच ये केंद्रीय कर्मचारी अपनी भूमिका निभाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने प्रशासनिक रूप से चुनाव आयोग का हाथ मजबूत किया है, वहीं राजनीतिक रूप से विपक्षी दलों को यह संदेश दिया है कि संस्थागत प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित है।

अब सबकी निगाहें मतगणना केंद्रों पर टिकी हैं, जहां सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बीच बंगाल की सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी, इसका फैसला होगा। टीएमसी के लिए यह हार केवल कानूनी नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है, क्योंकि वह बार-बार केंद्रीय संस्थाओं के हस्तक्षेप का मुद्दा उठाती रही है, जिसे अब अदालत ने प्रक्रियात्मक रूप से सही करार दे दिया है।

गेंद अब चुनाव आयोग के पाले में

सुप्रीम कोर्ट की इस बड़ी टिप्पणी ने पश्चिम बंगाल चुनाव के आखिरी चरण की कानूनी बाधाओं को दूर कर दिया है। कोई आदेश की जरूरत नहीं’ कहकर याचिका का निपटारा करना यह दर्शाता है कि अदालत निर्वाचन आयोग की तैयारियों और उसके द्वारा दिए गए आश्वासनों से संतुष्ट है।

अब गेंद पूरी तरह से चुनाव आयोग के पाले में है कि, वह किस तरह से इस ऐतिहासिक और चुनौतीपूर्ण मतगणना को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराता है। बंगाल की जनता और देशभर के राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह निर्णय लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण है, जहां नियमों की व्याख्या व्यक्तिगत आशंकाओं के ऊपर रखी गई है। 4 मई को होने वाली गिनती अब बिना किसी कानूनी संशय के आगे बढ़ेगी, जिसमें केंद्रीय और राज्य कर्मियों का सामंजस्य एक पारदर्शी नतीजे की ओर ले जाएगा।

 

इसे  भी पढ़ें- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पश्चिम बंगाल दौरे को लेकर प्रोटोकॉल विवाद, केंद्र ने मांगा स्पष्टीकरण

Related Articles

Back to top button