
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र (JPNIC) को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य सरकार के उस फैसले पर तीखे तेवर अपना लिए है, जिसके तहत लखनऊ स्थित इस बहुचर्चित केंद्र को एक निजी समूह को लीज पर दे दिया गया है।
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि, बीजेपी सरकार सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण तेजी से कर रही है। सपा मुखिया के इस आक्रामक बयान के बाद भाजपा अब भाजपा ने भी तीखा पलटवार किया गया है। पार्टी ने आरोप लगाया कि सपा के शासनकाल में सार्वजनिक परियोजनाओं में जमकर लूट और भ्रष्टाचार हुआ करता था।
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कब रखी गई थी JPNIC की नींव
गौरतलब है कि, जेपीएनआईसी का निर्माण कार्य मुलायम सिंह यादव की सरकार में शुरू हुआ था। बाद में अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री बने तो इस परियोजना के लिए और अधिक धनराशि आवंटित की गई थी।

भाजपा नेताओं का कहना है कि, योगी आदित्यनाथ सरकार ने अब ऐसी पारदर्शी व्यवस्था लागू की है, जिसके चलते तथाकथित सैफई परिवार से जुड़े लोग अब सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग नहीं कर पाएंगे। इस बयान के जरिए भाजपा ने सीधे तौर पर सपा के शीर्ष नेतृत्व को निशाने पर लिया है।
विकास कार्यों को नहीं पचा पा रही सपा
केंद्रीय राज्य मंत्री बीएल वर्मा और भाजपा प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के आरोपों पर करारा जवाब देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अखिलेश यादव से बेहतर शायद ही कोई और जानकार हो। उन्होंने आरोप लगाया कि,सपा के शासनकाल में गरीबों के हिस्से का राशन तक चोरी कर लिया जाता था। भाजपा नेताओं का कहना है कि, अखिलेश यादव वास्तव में भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को स्वीकार करने से बच रहे हैं और इसी वजह से इस तरह के आरोप लगा रहे हैं।
भाजपा प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह ने इस पूरे मामले पर विस्तार से बोलते हुए बताया कि, जेपीएनआईसी के निर्माण पर अब तक 800 करोड़ रुपये से भी अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च की जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद यह केंद्र आज तक पूरी तरह क्रियाशील नहीं हो पाया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने जेपीएनआईसी को बेचा नहीं है, बल्कि इस पूरी संपत्ति का स्वामित्व अब भी पूरी तरह लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के पास ही सुरक्षित है।
अखिलेश यादव का बीजेपी पर हमला
इस पूरे विवाद की शुरुआत बीते बुधवार को उस समय हुई, जब अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए एक बयान दिया था। उन्होंने सवाल उठाया, क्या भाजपा वास्तव में एक सरकार है या फिर एक दुकानदार की तरह काम कर रही है? उन्होंने कहा था कि, उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार ने अपनी कैबिनेट बैठक में लखनऊ के जेपीएनआईसी को निजी हाथों में सौंपने का फैसला ले लिया है।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि, अब बस यही बचा है कि इस संपत्ति को या तो ठेके पर दे दिया जाए या फिर पूरी तरह बेच दिया जाए। अखिलेश यादव ने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि. कमीशनखोरी भाजपा सरकार के लिए एक तरह का ईंधन का काम करती है। इसी वजह से निजीकरण को ही इसका एकमात्र समाधान माना जा रहा है।
LDA के प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी
इस पूरे विवाद से पहले, बीते मंगलवार को उत्तर प्रदेश राज्य मंत्रिमंडल ने लखनऊ विकास प्राधिकरण के उस प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी दी थी, जिसके तहत जेपीएनआईसी को अगले 30 वर्षों की अवधि के लिए संचालन और रखरखाव हेतु एक निजी समूह को पट्टे पर सौंपा जाएगा।
मंजूर किए गए प्रस्ताव के मुताबिक, इस पट्टे के लिए चयनित होने वाला निजी समूह लखनऊ विकास प्राधिकरण को कुल 831 करोड़ रुपये का भुगतान करेगा। यह राशि इस पूरी डील का एक अहम आर्थिक पहलू है, जिसे सरकार अपने पक्ष में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है।
क्यों दिया गया लीज पर
जेपीएनआईसी की परियोजना पहले से ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबे और विवादास्पद इतिहास से जुड़ी रही है। यह परियोजना मूल रूप से पिछली समाजवादी पार्टी सरकार की प्रमुख योजनाओं में से एक थी।

राज्य सरकार के दावे के अनुसार, इस परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 265 करोड़ रुपये आंकी गई थी, लेकिन समय के साथ यह लागत बढ़ते-बढ़ते 800 करोड़ रुपये से भी अधिक हो गई। सरकार का कहना है कि, जेपीएनआईसी को पट्टे पर देने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह है कि, लंबे समय से अधूरे और विवादों में घिरे इस परिसर को सम्मेलनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेल गतिविधियों के एक प्रमुख और सक्रिय केंद्र के रूप में विकसित किया जा सके।
LDA बोला- बिक्री नहीं, सिर्फ पट्टा
इस पूरे विवाद के बीच लखनऊ विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने भी स्पष्टीकरण जारी करते हुए साफ किया है कि कैबिनेट की ओर से दी गई मंजूरी जेपीएनआईसी की संपत्ति की बिक्री के लिए बिल्कुल नहीं है। अधिकारियों के अनुसार, इस केंद्र को केवल संचालन और रखरखाव के उद्देश्य से 30 वर्षों की अवधि के लिए पट्टे पर दिया जा रहा है।
प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि, इस पूरी अवधि के दौरान जमीन और संपूर्ण संपत्ति का स्वामित्व पूरी तरह से एलडीए के पास ही बना रहेगा, जबकि चयनित बिडर को केवल टेंडर की निर्धारित शर्तों के अनुसार केंद्र के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी दी जाएगी।
हालांकि, इसके बावजूद अखिलेश यादव ने सरकार के इस फैसले पर लगातार सवाल उठाना जारी रखा है और इसे भाजपा सरकार की निजीकरण नीति का ही एक हिस्सा करार दिया है। उन्होंने भाजपा सरकार पर सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने का गंभीर आरोप लगाया है।
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