
भारत में बच्चों और किशोरों में तेजी से बढ़ रहा मोटापा अब एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। हाल ही में जारी हुई वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 की रिपोर्ट में इस समस्या का फैलाव और गंभीरता सामने आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि, देश में इस समय करीब 4.1 करोड़ बच्चे ओवरवेट की समस्या से जूझ रहे हैं। यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है, लेकिन इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि, यद हालात ऐसे ही बने रहे, तो साल 2030 तक दुनिया भर में बच्चों के मोटापे के कुल मामलों में भारत की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से भी अधिक हो सकती है।
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ICMR ने पेश किया रोडमैप
बच्चों में बढ़ती इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने बच्चों के खानपान और उनके आसपास के फूड एनवायरनमेंट को बेहतर बनाने के लिए एक विस्तृत रोडमैप तैयार किया है। यह रोडमैप आईसीएमआर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन की अगुवाई वाले ‘लेट्स फिक्स आवर फूड’ कंसोर्टियम द्वारा तैयार किया गया है।

इस पॉलिसी दस्तावेज को ‘प्रायोरिटी पॉलिसी एक्शंस टू प्रमोट हेल्दियर डाइट्स एंड फूड एनवायरनमेंट्स फॉर चिल्ड्रन एंड एडोलसेंट्स इन इंडिया’ नाम दिया गया है, जिसे नीति आयोग के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास ने आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया है।
इस पूरे दस्तावेज को तैयार करने में करीब तीन वर्षों का समय लगा, जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों में विस्तृत आकलन किया गया और विभिन्न विशेषज्ञों तथा हितधारकों से सुझाव लिए गए। इस रोडमैप का मुख्य उद्देश्य बच्चों और किशोरों में बढ़ रहे मोटापे के साथ-साथ खानपान से जुड़ी डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर गैर-संचारी बीमारियों के खतरे को कम करना है।
जंक फूड विज्ञापनों पर लगे रोक
इस रोडमैप में सबसे अहम सिफारिश जंक फूड के विज्ञापनों को लेकर की गई है। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि, बच्चों और किशोरों को टारगेट करने वाले अनहेल्दी फूड विज्ञापनों पर अब कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए। खासतौर पर ज्यादा फैट, नमक और चीनी वाले एचएफएसएस (हाई फैट, शुगर एंड सॉल्ट) फूड की मार्केटिंग को लेकर अब तक चले आ रहे स्वैच्छिक नियमों की जगह सख्त कानूनी प्रतिबंध लागू करने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म, टेलीविजन और अन्य माध्यमों पर प्रसारित होने वाले ऐसे विज्ञापनों में भ्रामक हेल्थ क्लेम पर भी सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि अनहेल्दी फूड की आसान उपलब्धता, आक्रामक मार्केटिंग रणनीति और पोषण से जुड़ी सही जानकारी की कमी ही बच्चों में मोटापा बढ़ने के सबसे बड़े कारण हैं।
पैकेट में लगे न्यूट्रिशन लेबल
पॉलिसी दस्तावेज में एक और महत्वपूर्ण सिफारिश पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स की पैकेजिंग को लेकर की गई है। इसके तहत हर पैकेट के आगे के हिस्से पर आसान और स्पष्ट भाषा में न्यूट्रिशन लेबल लगाने की सिफारिश की गई है। इसका मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि माता-पिता और बच्चे किसी भी खाद्य पदार्थ को खरीदने से पहले ही आसानी से यह समझ सकें कि उसमें फैट, सोडियम या शुगर की मात्रा कहीं जरूरत से ज्यादा तो नहीं है।
इसके साथ ही बच्चों को फूड लेबल पढ़ना और समझना सिखाने के लिए डिजिटल लिटरेसी मॉड्यूल और इंटरैक्टिव ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म तैयार करने पर भी विशेष जोर दिया गया है। आईसीएमआर-एनआईएन की ओर से किशोरों को नमक और खराब फैट वाले खाद्य पदार्थों की पहचान सिखाने के लिए कॉमिक बुक जैसे रोचक माध्यमों का भी सहारा लिया जा रहा है, ताकि यह जानकारी बच्चों तक आसान और मनोरंजक तरीके से पहुंच सके।
जंक फ़ूड तक कम हो बच्चों की पहुंच
रोडमैप में स्कूलों के फूड एनवायरनमेंट को लेकर भी खास ध्यान दिया गया है। इसमें स्कूल कैंटीन और आसपास मौजूद फूड वेंडर्स को सख्ती से रेगुलेट करने की सिफारिश की गई है, ताकि बच्चों की जंक फूड तक आसान पहुंच को कम किया जा सके। इसके साथ ही फल और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों को किफायती दामों पर उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है।
गौरतलब है कि मौजूदा एफएसएसएआई (FSSAI) नियमों के तहत स्कूल परिसर और उसके गेट से 50 मीटर के दायरे में ज्यादा सैचुरेटेड फैट, ट्रांस फैट, एडेड शुगर और सोडियम वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री और विज्ञापन पर पहले से ही रोक लगी हुई है। लेकिन नए दस्तावेज में इन नियमों को और सख्ती से लागू करने, नियमित निरीक्षण करने और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत बनाने की जरूरत पर बल दिया गया है।
सामने आये चौंकाने वाले तथ्य
इसी सिलसिले में उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों में किए गए एक पायलट असेसमेंट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। इस असेसमेंट में पाया गया कि कई स्कूल कैंटीनों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स और शुगर वाले ड्रिंक्स आसानी से उपलब्ध थे, जबकि पोषण से जुड़ी सेवाएं बेहद सीमित पाई गईं। साथ ही, मौजूदा नीतियों का पालन भी कमजोर स्तर पर पाया गया।

इस समस्या से निपटने के लिए ‘न्यूट्रिशन एनवायरनमेंट असेसमेंट टूलकिट फॉर स्कूल्स’ नाम का एक विशेष टूलकिट भी तैयार किया गया है, जिसकी मदद से स्कूल अपने फूड एनवायरनमेंट का खुद आकलन कर सकते हैं और कैंटीन में हेल्दी विकल्पों को बढ़ावा देने की दिशा में ठोस कदम उठा सकते हैं।
हेल्थ टैक्स की सिफारिश
रोडमैप में एक और अहम सिफारिश यह है कि ज्यादा फैट, नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थों के साथ-साथ शुगर-स्वीटेंड बेवरेज यानी मीठे पेय पदार्थों पर हेल्थ टैक्स लगाया जाना चाहिए। इस सिफारिश के पीछे मुख्य मकसद ऐसे अनहेल्दी खाद्य पदार्थों की खपत को कम करना है। इसके साथ ही ऐसी नीतियां बनाने पर भी जोर दिया गया है, जिनकी मदद से पौष्टिक और हेल्दी खाद्य पदार्थों को आम लोगों के लिए ज्यादा किफायती बनाया जा सके।
रिपोर्ट में एक बेहद गंभीर आंकड़ा भी सामने रखा गया है, जिसके अनुसार भारत में कुल बीमारी के बोझ में अनहेल्दी डाइट यानी असंतुलित खानपान की हिस्सेदारी करीब 56.4 प्रतिशत होने का अनुमान है। यह आंकड़ा इस बात को स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि बच्चों की खाने-पीने की आदतों में शुरुआती उम्र से ही बदलाव लाना कितना जरूरी हो गया है, ताकि आने वाली पीढ़ी को मोटापे और उससे जुड़ी गंभीर बीमारियों से बचाया जा सके।
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