
लखनऊ। लखनऊ में नकली दवाओं के मामले में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे एक बड़े अंतर्राज्यीय रैकेट की परतें खुलती जा रही हैं। शुरुआती छानबीन से यह स्पष्ट हुआ है कि, नकली दवाओं का निर्माण राजस्थान में होता था, जबकि लखनऊ को इस पूरे नेटवर्क का केंद्र बनाकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में बिना किसी वैध बिल-बाउचर के इनकी सप्लाई की जाती थी।
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एजेंसियों के हाथ लगे अहम सुराग
जांच एजेंसियों के हाथ ऐसे कई सुराग लगे हैं, जो बताते हैं कि यह मामला सिर्फ नकली दवाओं की बिक्री तक सीमित नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संगठित अपराध की शक्ल ले चुका है।

पिछले सात दिनों में तीन अलग-अलग स्थानों पर नकली दवाओं से जुड़े मामले उजागर हुए हैं, जिनमें यह साफ हुआ कि राजधानी में बैठकर पूरे प्रदेश में नकली दवाओं का कारोबार फैलाया जा रहा था। इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल यही बना हुआ है कि, जानलेवा नकली दवाओं के इस धंधे के पीछे असली सरगना कब तक कानून की गिरफ्त में आएगा।
राजस्थान से संचालित हो रहा था नेटवर्क
खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की पड़ताल में यह तथ्य सामने आया है कि, इस पूरे रैकेट का ताना बाना राजस्थान से बुना जा रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस गिरोह का मुख्य सूत्रधार भूपेंद्र शर्मा नामक व्यक्ति है, जो अपने साथियों के साथ मिलकर राजस्थान में दवाएं तैयार करवाता था, फिर उन्हें उत्तर प्रदेश भेजा जाता था। इस पूरी सप्लाई चेन में लखनऊ की भूमिका सबसे अहम थी, क्योंकि यहीं से आगे कई जिलों तक माल पहुंचाया जाता था।
कागज पर नहीं होता था कारोबार
जांच में यह भी पता चला कि पूरा कारोबार बिना किसी कागजी लेनदेन के चलता था। न तो खरीद का कोई बिल होता था और न ही बिक्री का। भुगतान के लिए फोन-पे जैसे डिजिटल तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था, ताकि लेनदेन का कोई ठोस दस्तावेजी सबूत न बचे। पकड़े गए आरोपियों ने अपने बयानों में यह भी स्वीकार किया है कि, वे राजस्थान के सप्लायरों को पैसे भेजकर वहां से माल मंगवाते थे।
बसों के जरिए होती थी सप्लाई
इस पूरे नेटवर्क का एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। दवाओं की ढुलाई के लिए सरकारी रोडवेज और निजी बसों का इस्तेमाल किया जाता था। लखनऊ के अलावा प्रयागराज, वाराणसी, सीतापुर, गोंडा जैसे कई जिलों में बिना किसी दस्तावेज के खेप पहुंचाई जाती रही। इस तरीके से माल भेजे जाने से जांच एजेंसियों को शक है कि, यह सिंडिकेट काफी लंबे समय से सक्रिय रहा है और अब तक बड़ी मात्रा में नकली दवाएं बाजार में खप चुकी होंगी।
छापेमारी और बरामदगी
मामले खुलासा अमीनाबाद स्थित एक गोदाम पर पड़े छापे से हुई थी, जिसके बाद बक्शी का तालाब, गोंडा समेत कई अन्य ठिकानों पर भी कार्रवाई की गई।

अब तक जांच के लिए 27 संदिग्ध दवाओं के नमूने भेजे जा चुके हैं। इस दौरान करीब 21 लाख रुपये मूल्य की दवाएं सील की गई हैं। इसके अलावा गोंडा में हुई कार्रवाई में एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांसेज) श्रेणी में आने वाली दवाएं भी बरामद हुई हैं, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।
8 के खिलाफ मुकदमा दर्ज
एफएसडीए ने मुख्य आरोपी सहित कुल आठ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करने की सिफारिश की गई है। विभाग का स्पष्ट मानना है कि, यह केवल नकली दवाओं की बिक्री का मामला नहीं है, बल्कि जनस्वास्थ्य के साथ खुला खिलवाड़ करने वाला एक संगठित आपराधिक तंत्र है, जिसकी जड़ें कई राज्यों तक फैली हो सकती हैं।
जांच पर टिकी निगाहें
सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि, जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि, इस पूरे नेटवर्क के माध्यम से अब तक कितनी नकली दवाएं बाजार में पहुंच चुकी हैं? इन्हें किन-किन मेडिकल स्टोरों तक सप्लाई किया गया? क्या इस सिंडिकेट के तार अन्य राज्यों के लोगों से भी जुड़े हुए हैं?। लैब से नमूनों की रिपोर्ट आने के बाद इस मामले में और गिरफ्तारियां होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।
केमिस्ट एसो. ने की सराहना
लखनऊ केमिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष अमित तिवारी ने प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान का समर्थन करते हुए कहा कि एफएसडीए की टीम पहले भी सराहनीय कार्रवाई करती रही है।

अब हाल में जिन दो-तीन जगहों पर छापेमारी करके नकली दवाओं का जखीरा और उनसे जुड़े लोग पकड़े गए हैं, वह एक बेहतर कदम है। उन्होंने मांग की कि यह अभियान यहीं रुकना नहीं चाहिए, बल्कि इसे तब तक जारी रखा जाना चाहिए जब तक पूरा नेटवर्क नेस्तनाबूद न हो जाये और इसका मास्टरमाइंड पुलिस की गिरफ्त में न आ जाये।
ईमानदार दवा विक्रेता को न किया जाए परेशान
तिवारी ने आगे कहा कि जब तक बाजार से नकली दवाओं का धंधा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक न तो मरीजों को असली दवा मिलने की गारंटी होगी, न ही ईमानदारी से कारोबार करने वाले दुकानदारों को राहत मिलेगी। उन्होंने प्रशासन से यह भी अपील की कि नकली दवा बनाने और बेचने वालों के खिलाफ हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं के तहत सख्त कार्रवाई की जाए, क्योंकि यह सीधे तौर पर लोगों की जान से जुड़ा मामला है। साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित करने की मांग की कि इस अभियान की आड़ में किसी वैध और ईमानदार दवा विक्रेता को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।
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