
नई दिल्ली। ओमान के पास अमेरिकी हमलों में तीन भारतीय मरीन के मारे जाने की घटना ने मोदी सरकार की विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर खुलकर हमला बोल रहा है कि, उन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे पर एक शब्द भी क्यों नहीं कहा, लेकिन केवल विपक्ष ही नहीं, सरकार से सहानुभूति रखने वाले कई लोग भी दबी जुबान में पूछ रहे हैं कि, भारत की प्रतिक्रिया इतनी नरम क्यों रही। इस घटना ने भारत-अमेरिका संबंधों में आ रहे बदलावों की चर्चा को नई तेजी दी है। सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इस मुद्दे पर भारत और चीन की प्रतिक्रियाओं के बीच स्पष्ट अंतर को रेखांकित किया।
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तीन भारतीय नाविकों की मौत का विरोध
उन्होंने लिखा कि, 8 से 11 जून के बीच अमेरिकी बलों ने विदेशी झंडे वाले तीन तेल टैंकरों पर हमले किए, जिन पर भारतीय चालक दल के सदस्य सवार थे। इनमें एमटी सेटेबेलो पर हुए हमले में तीन भारतीय नाविकों की जान चली गई। भारत ने इन घटनाओं पर नियमित कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया है, लेकिन ऐसा लगता है कि, वह इन हमलों के महत्व को कम करके आंकने की कोशिश कर रहा है।चेलानी के अनुसार, यदि मारे गए नाविक चीनी होते तो बीजिंग की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होती। चीन इसे अमेरिका की प्रत्यक्ष उकसावे की कार्रवाई मानकर बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल देता।

बीजिंग केवल निंदा तक सीमित नहीं रहता, वह अमेरिकी रक्षा कंपनियों पर प्रतिबंध लगाता, सैन्य संपर्क निलंबित करता और वॉशिंगटन के साथ व्यापक कूटनीतिक संवाद रोक देता। उन्होंने 1999 के बेलग्रेड चीनी दूतावास बमबारी का उदाहरण दिया, जिसमें तीन चीनी पत्रकार मारे गए थे। उस घटना के बाद चीन में सप्ताहों तक बड़े पैमाने पर अमेरिका-विरोधी प्रदर्शन हुए, अमेरिकी दूतावास पर पथराव किया गया और दोनों देशों के बीच संवाद लगभग ठप हो गया था।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बात
इसी माहौल में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शुक्रवार रात एक्स पर जानकारी दी कि, उनकी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बात हुई और उन्होंने तीन भारतीयों की मौत का मुद्दा उठाया। जयशंकर ने लिखा, आज शाम अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बात हुई। मैंने गल्फ में अमेरिकी नेवी के उन हमलों पर भारत की कड़ी आपत्ति दोहराई, जिनमें तीन भारतीय मारे गए थे। कमर्शियल शिपिंग के खिलाफ ऐसी जानलेवा कार्रवाई सही नहीं है।
यह बयान सरकार की ओर से अब तक का सबसे स्पष्ट सार्वजनिक रुख माना जा रहा है, लेकिन कई लोग इसे अभी भी अपर्याप्त मान रहे हैं। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने भारत की विदेश नीति को कई नई चुनौतियां दी हैं। ट्रंप पहले भी भारत को कई मुद्दों पर असहज कर चुके हैं, लेकिन मोदी सरकार ने संयम बरतने की नीति अपनाई है। जब पिछले साल ट्रंप दोबारा चुने गए, तब भारत में निराशा का माहौल नहीं था।
नवंबर में बदले से जयशंकर के सुर
नवंबर के दूसरे हफ्ते में जयशंकर ने खुद कहा था कि, ट्रंप के आने से कई देश नर्वस हैं, लेकिन भारत उनमें शामिल नहीं है। उन्होंने मोदी-ट्रंप के अच्छे व्यक्तिगत संबंधों को भारत के हित में बताया था। आदित्य बिड़ला ग्रुप स्कॉलरशिप कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि, ट्रंप के आने से चीजें शिफ्ट होंगी और भारत भी शिफ्ट कर रहा है चाहे अर्थव्यवस्था हो, कॉर्पोरेट पहुंच हो या प्रोफेशनल्स की भूमिका, लेकिन इसी हफ्ते फिनलैंड में कल्टारंटा टॉक्स में जयशंकर का स्वर थोड़ा अलग था। ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स के चीफ फॉरेन अफेयर्स कमेंटेटर गिडियन रैकमैन ने उनसे पूछा कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने उन्हें कितना हैरान किया है।
जयशंकर ने जवाब दिया कि, पहले कार्यकाल और चुनाव अभियान ने बड़े बदलावों का संकेत तो दे दिया था, लेकिन वास्तविकता में बदलावों की तीव्रता और व्यापकता किसी ने नहीं सोची थी। उन्होंने टैरिफ नीति का उदाहरण दिया। दुनिया पुरानी आदतों में जकड़ी थी और सोचती थी कि घोषणाएं सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी हैं, लेकिन इन्हें लागू किया गया। जयशंकर ने कहा कि, भारत-अमेरिका के साथ किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है, इसलिए सुरक्षा पर प्रभाव दूसरे देशों जैसे ‘नाटो सदस्यों’ जितना नहीं पड़ा। कुछ देश टैरिफ से कुछ प्रवासी नीतियों से ज्यादा प्रभावित हुए। कुल मिलाकर, दुनिया ने इन बदलावों की तीव्रता का सही अनुमान नहीं लगाया था।
भारत को असहज कर रहीं भारत की नीतियां
ट्रंप प्रशासन की नीतियां भारत के लिए असहज कर रही हैं। फरवरी में अमेरिकी विदेश विभाग के सहायक मंत्री समीर पॉल कपूर ने कहा था कि, अमेरिका दक्षिण एशिया में किसी एक शक्ति को अत्यधिक प्रभावशाली नहीं बनने देना चाहता। ब्रह्मा चेलानी ने इसे ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का प्रतिबिंब बताया। अमेरिका अब किसी भी देश को इतना शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहता जो उसके हितों को चुनौती दे सके। वह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखना चाहता है, भले ही वह देश उसका रणनीतिक साझेदार हो।
2017 की रणनीति के मुकाबले नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में भारत का उल्लेख बहुत कम है। इसमें केवल इतना कहा गया है कि, अमेरिका भारत के साथ व्यापारिक संबंध सुधारना चाहता है, ताकि वह इंडो-पैसिफिक सुरक्षा में योगदान दे सके। हाल ही में नई दिल्ली आए अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडाउ ने कहा, हम भारत के साथ वही गलती नहीं दोहराएंगे जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थी। इसका मतलब था कि, अमेरिका भारत को बाजार विकसित करने की छूट देकर खुद को व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं छोड़ना चाहता।
पहले जैसा रणनीतिक साझेदार नहीं रहा भारत
चेलानी का विश्लेषण है कि, अमेरिका अब भारत को रणनीतिक साझेदार के रूप में मजबूत करने के बजाय क्षेत्रीय और आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगा है, जिसे सीमित या संतुलित रखना है। अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कांति वाजपेयी ने एक अख़बार के आर्टिकल में लिखा है कि, अमेरिका अब भारत को आदर्शवादी दृष्टि से नहीं, बल्कि ठंडे लेन-देन की राजनीति से देखता है।
भारत अब बड़े बाजार, निवेश और हथियारों के ग्राहक के रूप में महत्वपूर्ण है, लेकिन पहले जैसा रणनीतिक साझेदार नहीं। पिछले 30 वर्षों में भारत ने चीन के खिलाफ संतुलन, आतंकवाद विरोध, अमेरिकी बाजार, कुशल पेशेवरों और हथियारों के लिए अमेरिका पर निर्भरता रखी। अमेरिका की दिलचस्पी भी यही थी, लेकिन अब माइग्रेशन चिंताओं ने प्रतिभाशाली भारतीयों की मांग को प्रभावित किया है।
वाजपेयी के अनुसार, यूरोप से जापान तक यूरेशिया में अमेरिका रूस, इस्लामी कट्टरपंथ और चीन जैसी चुनौतियों को नियंत्रित करना चाहता है।
फिनलैंड पैनल में की यूरोप की आलोचना
फिनलैंड पैनल में जयशंकर ने यूरोप की आलोचना भी की। जब उनसे रूस से तेल खरीदने और यूक्रेन मुद्दे पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने जवाब दिया कि, यूरोपीय देश मध्य-पूर्व से तेल खरीद रहे थे, जिससे रूसी तेल सस्ता उपलब्ध हुआ और भारत को अपनी जरूरतों के अनुसार फैसले लेने पड़े। उन्होंने कहा, काश मैं भारत के संदर्भ में यूरोपीय हथियारों के बारे में भी ऐसा कह पाता।

जयशंकर ने आरोप लगाया कि, यूरोप ऐसे हथियार बेचता है, जिनका इस्तेमाल भारत पर हमला करने के लिए किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि, भारत ने कभी यूरोप की सुरक्षा को खतरे में नहीं डाला। यह इशारा पाकिस्तान की ओर था, जिसे यूरोपीय देश हथियार बेचते रहे हैं। जनवरी में पेरिस में जयशंकर ने पोलैंड के उप प्रधानमंत्री से पाकिस्तान को सैन्य मदद न देने की अपील की थी।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठ रहे सवाल
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों में रणनीतिक गहराई कम होती दिख रही है। व्यक्तिगत संबंध और व्यापारिक हित बने हुए हैं, लेकिन पहले जैसा सामरिक उत्साह कम है।
भारत को अब अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, विविध साझेदारियों (रूस, यूरोप, मध्य-पूर्व) और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर जोर देना होगा। जयशंकर की कूटनीति संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत अब अमेरिका के लिए पहले जितना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है।
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