
सिर दर्द हो, पेट में मरोड़ उठे या पैर में मोच आ जाए, अक्सर हम बिना सोचे-समझे एक पेन किलर की गोली उठाकर खा लेते हैं। गोली खाने के कुछ ही देर बाद हमें राहत भी महसूस होने लगती है, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि, आखिर इस छोटी सी गोली को यह कैसे पता चलता है कि दर्द शरीर के किस हिस्से में हो रहा है। जैसे की सिर में, पेट में या फिर पैर में? सच ये है कि, पेन किलर को यह बिल्कुल भी पता नहीं होता कि, शरीर के किस हिस्से में दर्द उठ रहा है, फिर भी यह करिश्माई ढंग से सही जगह राहत पहुंचा देती है। आइए समझते हैं इसके पीछे का पूरा विज्ञान।
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दिमाग तक कैसे पहुंचता है दर्द का संदेश
शरीर विज्ञान के अनुसार, जब भी शरीर के किसी हिस्से में चोट लगती है, सूजन आती है या कोई अन्य परेशानी होती है, तो उस स्थान पर मौजूद नसें तुरंत एक्टिव हो जाती हैं और दर्द से जुड़े संकेत दिमाग तक भेजना शुरू कर देती हैं। दिमाग इन संकेतों को प्राप्त कर उनका विश्लेषण करता है और हमें दर्द का एहसास कराता है। यह पूरी प्रक्रिया वास्तव में शरीर की एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली है, जो दर्द के माध्यम से हमें आगाह करती है कि, शरीर के किसी हिस्से में कुछ गड़बड़ है, ताकि हम उस अंग विशेष का ध्यान रख सकें और उसे और अधिक नुकसान से बचा सकें।
चोट या सूजन में क्यों बढ़ जाती है संवेदनशीलता
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि, जब शरीर में चोट लगती है या सूजन की समस्या होती है, तो वहां कुछ खास प्रकार के केमिकल यानी रासायनिक पदार्थ निकलने लगते हैं, जिनमें प्रोस्टाग्लैंडिन को सबसे प्रमुख माना जाता है।

ये रासायनिक पदार्थ आसपास की नसों को सामान्य से कहीं ज्यादा संवेदनशील बना देते हैं, जिसकी वजह से दर्द का संकेत बेहद तेजी से दिमाग तक पहुंच जाता है और हमें उस स्थान पर दर्द महसूस होने लगता है। यही वजह है कि ,चोट या सूजन वाली जगह को छूने से भी तकलीफ महसूस होने लगती है, क्योंकि वहां की नसें पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय हो चुकी होती हैं।
पूरे शरीर में फैलती है दवा
अब सवाल यह उठता है कि आखिर दवा को दर्द की सही जगह ढूंढने की जरूरत क्यों नहीं पड़ती। इसका जवाब समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि, जब हम पेन किलर की गोली खाते हैं, तो उसका सक्रिय तत्व सबसे पहले पेट और आंतों के जरिए अवशोषित होकर खून में मिल जाता है। इसके बाद खून का संचार तंत्र इस दवा को शरीर के हर छोटे-बड़े हिस्से तक पहुंचा देता है। यानी दवा को दर्द की सही जगह ढूंढने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती, बल्कि वह अपने आप ही रक्त प्रवाह के माध्यम से पूरे शरीर में फैल जाती है।
ज्यादातर सामान्य पेन किलर शरीर में प्रोस्टाग्लैंडिन बनने की प्रक्रिया को धीमा या कम कर देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप दर्द और सूजन दोनों में धीरे-धीरे कमी आने लगती है। आमतौर पर देखा गया है कि, पेन किलर दवा खाने के 20 से 30 मिनट के भीतर ही असर दिखाना शुरू कर देती है। इसकी वजह यह है कि, इतने समय के भीतर दवा का सक्रिय तत्व पर्याप्त मात्रा में खून में घुलकर अपना काम शुरू कर देता है।
सिर्फ दर्द वाली जगह पर ही क्यों महसूस होती है राहत
यह बेहद दिलचस्प सवाल है कि, जब दवा पूरे शरीर में फैल जाती है, तो राहत सिर्फ दर्द वाली जगह पर ही क्यों महसूस होती है, बाकी शरीर में क्यों नहीं। दरअसल इसके पीछे की वजह यह है कि, चोट या सूजन वाले हिस्से में केमिकल गतिविधि यानी रासायनिक क्रियाएं बाकी सामान्य शरीर की तुलना में कहीं ज्यादा तेज होती हैं। पेन किलर दवा शरीर में जहां भी सबसे ज्यादा रासायनिक गतिविधि होती है, वहीं सबसे प्रभावी ढंग से काम करती है। यही वजह है कि भले ही दवा खून के जरिए पूरे शरीर में घूम रही हो, लेकिन राहत का अनुभव सिर्फ उसी हिस्से में होता है जहां दर्द या सूजन मौजूद है।

डॉक्टर कहते हैं कि , अलग-अलग तरह की दवाइयां अलग-अलग तरीके से काम करती हैं। कुछ पेन किलर दवाएं सीधे तौर पर प्रोस्टाग्लैंडिन के निर्माण को कम करती हैं, तो वहीं कुछ अन्य दवाएं सीधे नसों और दिमाग पर असर डालकर दर्द के अहसास को कम करने का काम करती हैं। इसी वजह से चिकित्सक अलग-अलग प्रकार के दर्द के लिए अलग-अलग तरह की दवाइयां सुझाते हैं, क्योंकि हर तरह के दर्द के लिए एक ही पेन किलर कारगर साबित नहीं होती।
क्या सुरक्षित होता है पेन किलर खाना
इस पूरे विषय पर एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि क्या पेन किलर का सेवन हर परिस्थिति में पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय में इसका जवाब स्पष्ट रूप से नहीं है। किसी भी पेन किलर को बार-बार या जरूरत से अधिक मात्रा में लेना सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकता है, क्योंकि कुछ दवाइयां लंबे समय तक या अत्यधिक मात्रा में लिए जाने पर पेट, किडनी और लिवर जैसे महत्वपूर्ण अंगों पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं।
चूंकि यह दवा खून के माध्यम से पूरे शरीर में फैलती है और दर्द उत्पन्न करने वाले रासायनिक संकेतों या नसों व दिमाग के दर्द संकेतों को प्रभावित करके काम करती है, इसी प्रक्रिया के चलते हमें दर्द वाली जगह पर राहत महसूस होती है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इसे बिना सोचे-समझे या मनमाने ढंग से लिया जाए।
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नोट- यह सामान्य जानकारी है। किसी भी दवा के इस्तेमाल से पहले डॉक्टर या फार्मासिस्ट से सलाह जरूर लें।



